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प्रचार खिडकी

शनिवार, 30 जनवरी 2010

कोशिशें अक्सर, मेरी, नाकामियां बन जाती हैं

मैं जो करता हूँ,
सब वो,मेरी ,
गलतियां कहलाती हैं।

कोशिशें अक्सर,
मेरी,
नाकामियां बन जाती हैं॥

जब भी थामता हूँ,
हाथ किसी का, उसकी,
दुश्वारियाँ बढ़ जाती हैं॥

जब बांटता हूँ,
दर्द किसी का,
रुस्वाइयां बन जाती हैं॥

मगर मैं फ़िर भी चलता रहता हूँ.

8 टिप्‍पणियां:

  1. यही होना चाहिए अजय भईया , हमें चलते रहना चाहिए ।

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  2. जीवन चलने का नाम ..
    चलते रहो सुबहो शाम!

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  3. रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के,
    काटों पे चलके साये मिलेंगे बहार के,
    ओ राही, ओ राही,
    ओ राही, ओ राही...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बस, चलते रहिये..बहुत शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  5. कोशिशें अक्सर,
    मेरी,
    नाकामियां बन जाती हैं॥
    अगर नाकामियाँ न हो तो शायद कोशिशें मर जायेंगी.
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. फिर भी चलते रहना चाहिए .......... अच्छा लिखा है ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. ajay ji
    naye baras ki shubhkamnayen
    aapaki raddi ki tokari badi bhari hai.
    bilkul apani si peeda lagati hai.
    shukriya.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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