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प्रचार खिडकी

शनिवार, 9 जनवरी 2010

होठों को मना लूंगा , पर आखों का क्या



होंठो को मना लूंगा मैं,
वे मान भी जाएंगे,
हमेशा की तरह,
शिकायत को भी ,
नहीं खुलेगें ,
और मौन रहेंगे,
एक दूसरे को ,
जकडे हुए जबरन ,







इन आखों का,
क्या ये तो ,
पलक झपकते ही ,
सब देख लेती हैं ,
और जो बंद ,
हो भी जाएं तो ,
जाते जाते सब ,
कह जाती हैं ,
मस्तिष्क को ,
जिसके बंद होने पर ,
सुना है कि,
इंसान मर जाता है ॥

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ बहुत सुंदर कविता....

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  2. आप तो ऐसे ना थे ... मियाँ...ऐसी रचनाएँ कब से लिखने लगे? ....

    सुंदर...अति सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बोलती है तुम्हारी ये आंखें
    चलो इन पे पर्दे गिरा दें...

    जय हिंद..

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक सुंदर अभिव्यक्ति..बेहद प्रभावशाली बात..सुंदर रचना..धन्यवाद अजय जी!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. अरे वाह बहुत मस्त ओर सुंदर लिखा आप ने

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच्चाई को चुप न रहने दीजिये
    इन आँखों को कहने दीजिये

    सच को बयाँ नहीं करने से वाकई इंसान मर जाता है
    बहुत खूबसूरत रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. होठ चुप रह कर भी बोलते हैं और आँखें देखती ही नहीं बहुतत कुछ कहती भी हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जो होंठ न कह सकेंगे वो आँखें कह देंगी वैसे राजीव जी ने सही कहा है । शुभकामनायें आशीर्वाद --

    उत्तर देंहटाएं
  9. waah bahut hi sundar bhavon se bhari rachna..........vaise dinesh ji ne bhi sahi kaha hai.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सही कहा आपने काश .....
    वाह .. वाह ... वाह ....

    उत्तर देंहटाएं
  11. सच को बयाँ नहीं करने से वाकई इंसान मर जाता है
    बहुत खूबसूरत रचना

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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