इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

इक दिन ,, मैं खुद को, इंसान बना लूंगा

कोशिश मेरी,
जारी है,
इक दिन ,
मैं खुद को,
इंसान बना लूंगा॥

जब्त कर लूंगा ,
सारा गुस्सा ,
और नफरत भी,
भीतर ही अपने,
अभिमान दबा दूंगा॥

तुम रख लेना,
मेरे हिस्से की,
खुशी का,
कतरा-कतरा,
तुम्हारे सारे,
ग़मों को अपना,
मेहमान बना लूंगा॥

उखड जायेंगे,
सियासतदानों के,
महल और,
मनसूबे भी,
बेबसों की,
आहों को वो,
तूफान बना दूंगा॥

तुम डरो न,
की कहीं ,
मेरे हमनाम,
बन कर,
बदनाम ना हो जाओ,
जब कहोगे,
खुद को, तुमसे,
अनजान बना लूंगा॥

बेशक मुझे,
बड़े नामों में,
कभी गिना ना जाए,
बहुत छोटी ही सही,
मगर अपनी,
पहचान बना लूंगा।

कोशिश जारी है और आगे भी रहेगी...

14 टिप्‍पणियां:

  1. उखड जायेंगे,
    सियासतदानों के,
    महल और,
    मनसूबे भी,
    बेबसों की,
    आहों को वो,
    तूफान बना दूंगा॥
    वाह क्या बात है अजय जी.बहुत खूब.

    उत्तर देंहटाएं
  2. तुम डरो न,
    की कहीं ,
    मेरे हमनाम,
    बन कर,
    बदनाम ना हो जाओ,
    जब कहोगे,
    खुद को, तुमसे,
    अनजान बना लूंगा॥
    वाह-वाह बहुत सुन्दर , आज तो छा गए गुरु ! हाँ, कोशिश जारी रहनी चाहिए !

    उत्तर देंहटाएं
  3. aapki kosis ki daad deni ajay saahab!
    aapki ye kavita aapki koshis ka naayab namuna hai.
    aisi hi koshise ek aadmi ko insaan bana sakti hain.

    उत्तर देंहटाएं
  4. रद्दी की टोकरी में, मिला माल बड़े काम का।

    उत्तर देंहटाएं
  5. नीक संकल्पक भाव, जोश सहित भावोत्तेजक रचना अजय जी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  6. जब कहोगे,
    खुद को, तुमसे,
    अनजान बना लूंगा॥

    झा जी नीक कहिन,
    जोर दार

    उत्तर देंहटाएं
  7. ब्‍लॉग का नाम बदलकर हीरों की तिजोरी कर लिया जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत हीं सार्थक एवं मनोबल बढाने वाली रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. एक अदद इंसान बनने के लिए कितनी क़वायद करनी पड़ती है न!

    उत्तर देंहटाएं
  10. तुम डरो न,
    की कहीं ,
    मेरे हमनाम,
    बन कर,
    बहुत खुब, क्या बात है रद्दी की टोकरी मै कीमती माल मिल जाता है

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह अजय भईया ,क्या बात है आज तो आप छा गये, लाजवाब प्रस्तुति, बहुत खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. तुम रख लेना,
    मेरे हिस्से की,
    खुशी का,
    कतरा-कतरा,
    तुम्हारे सारे,
    ग़मों को अपना,
    मेहमान बना लूंगा॥
    vवाह झा जी आजकल तो कमाल कर रहे हैं। बहुत सुन्दर कविता है आपकी कवितायें बहुत कम पढी हैं लगता है कविताओं मे भी अपनी पहचान बनाने की पूरी तैयारी है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत हीं सार्थक एवं मनोबल बढाने वाली रचना ।

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers