इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

शनिवार, 23 जनवरी 2010

गैरों से दुश्मनी की, कहाँ है फुरसत, हम तो अपनों से ही, उलझते जा रहे हैं।


मर रहा है ,
हर एहसास आज,
और रिश्ते भी ,
दरकते जा रहे हैं॥

अब ख़ुद पर बस नहीं,
कठपुतली , बन,
वक्त के साथ,
थिरकते जा रहे हैं॥

लगे तो रहे, ताउम्र,
पर जाने,निपटाए काम,
कि हम खुद ही ,
निपटते जा रहे हैं॥


गैरों से दुश्मनी की,
कहाँ है फुरसत,
हम तो अपनों से ही,
उलझते जा रहे हैं।

न खते-पैगाम,
न दुआ सलाम,
युग हो रहा है वैश्विक,
हम,सिमटते जा रहे हैं॥

चाहा ये कि रहे साथ सिर्फ़ मुहब्बत,
पर खुदगर्जी और नफरत भी मुझसे,
लिपटते जा रहे हैं॥

सपने पाल लिए इतने की,
भिखारियों की मानिंद,
घिसटते जा रहे हैं॥

आंखों ने रोना छोडा,
हमने भी सिल लिए लब,
जख्म ख़ुद ही अब तो ,
सिसकते जा रहे हैं॥

कैसे कोसूं अब,
इस पापी दुनिया को,
जब मुझमें भी सभी पाप,
पनपते जा रहे हैं॥

13 टिप्‍पणियां:

  1. गैरों से दुश्मनी की,
    कहाँ है फुरसत,
    हम तो अपनों से ही,
    उलझते जा रहे हैं।

    बात तो आपकी सही है, परन्तु ये हर जगह नहीं होता अजय भईया, हम तो आपके लिए हमेशा दिलो जान तैयार रखते हैं, बस एक हाँ की जरुरत है ,। रचना बढिया रही, अब बहुत हुआ दुश्मनो के लिए, अब जरा कुछ दोस्तो के लिए भी हो जाये ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. निपटते उलझते तो सदा रहे हैं हम
    इंटरनेट पर हम अब सुलझते जा रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Bade bhaia kuchh din ke liye apna dimaag udhar ya kiraye pe de do pleaseeeeeeeeeeee... 2-4 sundar se mahakavya likh kar wapas lauta denge... :)
    gahri rachna lagi..
    Jai Hind...

    उत्तर देंहटाएं
  4. और फिर गैरों में कहां इतनी हिमाकत, हमें तो अपनों ने ही मारा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आंखों ने रोना छोडा,
    हमने भी सिल लिए लब,
    जख्म ख़ुद ही अब तो ,
    सिसकते जा रहे हैं॥
    वाह क्या कहने हैं,सुंदर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  6. कैसे कोसूं अब,
    इस पापी दुनिया को,
    जब मुझमें भी सभी पाप,
    पनपते जा रहे हैं॥
    बहुत गहरी बात कह दी आप ने आज अपनी रचना मै

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रिय मिथिलेश , तुम्हें तो पहले ही कह चुका हूं कि सहोदर न सही उससे कम भी नहीं हो , और मुझमें ही कहीं हो ....अपने पराए के दायरे से बहुत उपर मेरे भाई ...रचना ऐसी ही बनी ..
    अजय कुमार झा

    उत्तर देंहटाएं
  8. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers