एक शताब्दी पहले महिला को सश्क्त करने के लिए अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की परंपरा की शुरूआत शायद इस वजह से ही हुई होगी कि जब एक शताब्दी के बाद मुड के देखेंगे और पाएंगे कि महिलाओं की स्थिति कितनी बदली इन सौ सालों में तो वो संघर्ष का इतिहास गौरवमयी और उपलब्धिपूर्ण होगा । आज रुक कर यदि सरसरी तौर पर देखा जाए तो बदलाव तो यकीनन आया है और ये परिवर्तन दिख भी रहा है । इसे सकारात्मक व नकारात्मक तर्कों पर तौलने वालों को किनारे करके इतना तो सीधा सीधा माना जा सकता है कि महिलाओं ने परिवार ,समाज ,देश , और पूरे विश्व में बहुत सारी जद्दोज़हद के बाद अपना एक मुकाम तो हासिल किया ही है । और ये सफ़र अभी जारी है , कहें कि रफ़्तार भी अब पहले से ज्यादा तेज़ है । मगर जिन शाश्वत समस्याओं पर नज़रें बार बार आकर अटक जाती हैं उनमें से पहली है समाज की नारियों के प्रति नहीं बदलने वाली मानसिकता, महिलाओं पर होने वाला दैहिक और मानसिक अत्याचार ,उनके साथ अब भी किया जा रहा दोयम दर्ज़े का व्यवहार । और ऐसा सिर्फ़ अविकसित या पिछडे देश/समाज की कहानी नहीं है बल्कि विकसित देशों में भी यही हाल है ।![]()
अमरीका जैसे सबसे विकसित देश में जहां अब तक एक भी महिला राष्ट्राध्यक्ष नहीं बन पाई है , तो वहीं भारत में तो अभी राजनीतिक जगत में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की बैसाखी का सहारा लेना भी गंवारा नहीं है सबको । जाने कितनी ही बार महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए विधेयक को संसद के पटल पर रखा गया है और हर बार उसका हश्र कुछ ऐसा ही हुआ है जैसा कि इस बार हुआ है । कारण स्पष्ट है कि बांकी का बचा ६७ प्रतिशत उन तैंतीस प्रतिशत के प्रभाव और परिणाम से पहले से ही डरा हुआ सा लगता है । लेकिन क्या सचमुच ही आज महिलाओं को किसी आरक्षण की बैसाखी की जरूरत है आगे बढने के लिए , अपना अधिकार, अपना ओहदा, अपना अस्तित्व तलाशने के लिए । आज यदि भारत में महिलाओं की स्थिति को देखें तो कतई नहीं , बिल्कुल भी नहीं । जिस देश में दशकों पहले देश की कमान इंदिरा गांधी जैसी विश्वस्तरीय नेत्री ने संभाल रखी हो , (यहां ये उल्लेख करना शायद ठीक होगा कि आज जिस विधेयक को पारित करने के लिए सभी इतनी एडी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं यदि आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो निश्चित ही इतना समय नहीं लगता ), जहां कानून, खेल, अभिनय, कला , समाज, राजनीति ...आदि हर क्षेत्र में नारी शक्ति का बोलबाला और धाक है ,ऐसे में उसे किसी भी बैसाखी की जरूरत नहीं है ।
आज यदि महिलाओं को किसी बात की जरूरत है तो वो सिर्फ़ इस बात की कि हर प्रांत, हर शहर, हर गांव,हर कस्बे, हर गली कूचे, हर परिवार ,में इंदिरा गांधी, लक्ष्मी बाई, किरन बेदी, कल्पना चावला, सायना मिर्ज़ा, नज्मा हेपतुल्लाह, लता मंगेशकर, शिवानी, और इन जैसी हजारों महिलाएं को बनाया जा सके । यदि इन तमाम नारियों को नारी शक्ति बनने के लिए किसी आरक्षण नामके बैसाखी की जरूरत नहीं पडी तो आगे भी नहीं पडेगी । आज जरूरत सिर्फ़ और सिर्फ़ इस बात की है नारी अपने भीतर की शक्ति को पहचाने , न सिर्फ़ पहचाने बल्कि उसे पूरे वेग से बाहर आने दे । बिना किसी की परवाह किए , बिना किसी बंदिश के , अब समय आ गया है कि आधी दुनिया कहलाने वाली शक्ति , विश्च की संचालक शक्ति बने । और ऐसा तो एक दिन होकर ही रहेगा ॥
प्रचार खिडकी
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मंगलवार, 9 मार्च 2010
आज महिलाओं को आरक्षण नहीं इंदिरा गांधी , किरन बेदी, और कल्पना चावला की जरूरत है
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किरन बेदी,
महिला आरक्षण विधेयक,
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