प्रचार खिडकी

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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

दैनिक महामेधा दिल्ली में प्रकाशित मेरा एक लघु आलेख .....

आज के दैनिक महामेधा दिल्ली , में प्रकाशित मेरा एक आलेख जिसे आप मेरे ब्लॉग आज का मुद्दा पर एक पोस्ट के रूप में पढ चुके हैं । चित्र को बडा करके पढने के उस पर चटका लगा दें और खुलने वाली छवि को चटका कर बडा करके आराम से पढा जा सकता है

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

दबाव में है बचपन : दैनिक आचरण सागर (मध्य प्रदेश ) में प्रकाशित मेरा एक आलेख






आलेख को पढने के लिए बस उस पर चटका लगा दें , आलेख खुद ही अलग खिडकी में खुल कर बडा हो जाएगा और आप उसे आराम से पढ सकते हैं ॥

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

दैनिक विराट वैभव , दिल्ली में प्रकाशित मेरा एक आलेख ........






आलेख पर चटका लगाने से ये अलग खिडकी में खुल जाएगा और छवि को आराम से पढा जा सकता है




गुरुवार, 23 सितंबर 2010

शॉपिंग मॉल की हसीन शाम : ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य )




व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें , और मजे से पढें ............






बुधवार, 22 सितंबर 2010

मेरे कॉलम "ब्लॉग हलचल " में , न्यायालीय फ़ैसले का ज़िक्र करती हुई , शब्द - संसद , गपशप का कोना , नेपथ्यलीला ,पंचर टायर और सवाल आपका है...ब्लॉगस की पोस्ट का ज़िक्र



दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक "अभी तक क्राईम टाईम्स "में मेरे कॉलम में "ब्लॉग हलचल " में , न्यायालीय फ़ैसले का ज़िक्र करती हुई , शब्द - संसद , गपशप का कोना , नेपथ्यलीला ,पंचर टायर और सवाल आपका है...ब्लॉगस की पोस्ट का ज़िक्र । यहां मैं मित्रों/पाठकों को बता दूं कि पिछले कुछ समय से इस कॉलम को स्थगित कर दिया था , कुछ कारणों से , किंतु अब पुन: इसे सक्रिय करने जा रहा हूं । आगामी विषय होंगे "अयोध्या पर फ़ैसला " , कशमीर प्रकरण , और राष्ट्रमंडल खेल आदि ।

पढने के लिए उस पर चटका लगा दें और अलग खुली खिडकी में आराम से पढें ।

रविवार, 19 सितंबर 2010

बुजुर्ग : अनुभवी ,अनमोल, मगर उपेक्षित : दैनिक सच कहूं सिरसा में प्रकाशित मेरा एक आलेख


आलेख को पढने के लिए उसे चटकाने पर जो पृष्ठ खुले , उसे चटका कर आराम से पढा जा सकता है .........

रविवार, 12 सितंबर 2010

ऑपरेशन वसूली ( पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य )






व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगाने से
जो छवि खुलेगी उसे आप चटका कर आराम से पढ सकते हैं

शनिवार, 11 सितंबर 2010

दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक फ़ीचर

चित्र पर क्लिक करने पर उसे चटका के बडा करके आप उसे पढ सकते हैं । ये शायद २००७ में प्रकाशित हुआ था

शनिवार, 6 मार्च 2010

बेटियां क्यों पैदा होती हैं .....???

बहुत पहले ये पोस्ट लिखी थी ...जाने आज फ़िर क्यों इसे लिखने पढने और पढाने का मन किया ........................
आप सोचेंगे कि ये क्या सवाल हुआ .फ़िर तो कोई कहेगा कि क्यों निकलता है सूरज और क्यों होती है रात, क्योंबदलते हैं दिन और महीने। हाँ , हाँ हो सकता है कि आप को ये इसी तरह का एक बेतुका सवाल लगे मगर मैं ये बातयहाँ इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से ना सिर्फ़ इस ब्लॉगजगत पर बल्कि विभिन्न माध्यमों मेंऔर बहुत से लोगों , विशेषकर महिलाओं द्वारा , ये सवाल खूब उठाया गया है, बहुत सारे तर्क-वितर्क , आकलन, विश्लेषण, आरोप खासकर पुरुषवादी मानसिकता और समाज पर हर बार उंगली उठाई जाती रही है। और कमोबेश ये कहीं ना कहीं सच तो हैं ही, मगर और भी कुछ बातें हैं जो शायद सामने नहीं आती , या कि उन्हें सामने लाया नहीं जाता।

कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-

--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसेबताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥

बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥

बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...

बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....

उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।

दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाची , मामी और ये कन्या भ्रूण हत्या करने वाली डाक्टरनियों के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है ये बहस चलती ही जारही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....


बुधवार, 6 जनवरी 2010

अब कैसे पास करें औडीशन ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )


अब कैसे पास करें औडीशन ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )
चित्र को बडा करके पढने के लिए उस पर चटका लगाएं
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