प्रचार खिडकी

कुछ ख्याल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कुछ ख्याल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 14 मार्च 2020

मैं अब भी लिखता हूँ...... और आप ??





जैसे जैसे कंप्यूटर और मोबाइल का चलन घर से लेकर दफ्तरों तक बढ़ गया है उससे किताबों को पढ़ने की रवायत तो कम हो ही गई है इसके साथ साथ जो एक आदत बिलकुल ख़त्म होती जा रही है वो है हाथों से कागज़ पर लिखना | कचहरी जैसे दफ्तर में जहाँ कंप्यूटर तकनीक बहुत पहले आ जाने के बावजूद भी अब तक हाथों से बहुत सारा लिखने की गुंजाईश बनी हुई है | अफ़सोस कि अब सहकर्मियों ,वरिष्ठ तो वरिष्ठ जो कनिष्ठ और युवा हैं वे भी यथासंभव हाथ से कुछ भी लिखने की आदत से कतराते हैं | बहुत ऐसा इसलिए भी करते हैं क्युंकि उनकी लिखावट साफ़ और स्पष्ट नहीं है |

मेरी आदत इससे ठीक उलट है | मैं आलेख पत्र आदि नियमित लिखने के साथ ही दफ्तर में भी पूरे दिन हाथ से लिखता रहता हूँ | लिखावट साफ़ और ठीक है सो महसूस किया है कि पहला ही प्रभाव सकारात्मक दिखता है और टाइपिंग कंप्यूटर से इतर हाथ की लिखावट उसे अलग कर देती है | मेरे दफ्तर में कोई भी कागज़ ,रजिस्टर ,यदि मेरी टेबल से होकर गुजरा है तो उसमें यकीनन ही मेरी लिखावट आपको कहीं न कहीं दिख जाएगी | इसी तरह जहाँ जहाँ भी मेरी नियुक्ति रही है अब तक उन तमाम विभागों ,संभागों ,में मेरी लिखावट के निशान उपलब्ध फाइलों ,रिकार्ड्स आदि पर अब भी वैसे के वैसे ही मिलते हैं |

मुझे हाथों से लिखना बेहद पसंद है और मेरी आदत भी।    ....... और आपको

शनिवार, 10 अगस्त 2013

रेत की तलवार से ...............




मत कर औकात की बात तू हाकिम , जब इत्ता सा सच सुनने का भी ,तुझमें माद्दा नहीं है ,
"रेत की तलवार से" लडने चला है ,अडिग चट्टान से , दिन तेरे पास अब ज्यादा नहीं है ॥
***********************
अबे छोडो हाकिम, साला ,पिद्दी के शोरबे सा पडोसी , तो तुमसे ठोका ना जाए ,
फ़िर ऐसा ही है तुम्हारी हिम्मत तो ,हमें भी खालिस सच कहने से रोका ना जाए
***********************
सच उगलने को यूं उकसाया न करो ,
और उगल ही दूं ,सच को , इतना भी ,दबाया न करो
***********************
नज़रों में कयामत ,होठों पे बगावत ,अपनी तो ,यही पहचान भर है
कभी पूछ बैठना हमसे हमारी हैसियत, तुममें ज़रा भी हिम्मत गर है
***********************
तुम छुप छुप के करो हमले ,हम घर घुस के मारेंगे ,
इन्हें समझाओ दुनिया वालों ,ये साले यूं न मानेंगे
***********************
मैं जानता हूं जंग के हालात बात ,हर वक्त माकूल नहीं है ,
मगर तोड के हर बार जोडते हो रिश्ता , सियासतदानों क्या ये भूल नहीं है ?
***********************
रात सपनों में आई थी जिंदगी तुम ,
सुबह गमलों में ,फ़ूल बनके उग आई हो......
***********************
मत बैठ मेरे सामने यूं ,जिंदगी , बात-बेबात के लिए ,
क्या पता कल तेरे पास वक्त हो न हो ,मुलाकात के लिए ......
***********************
सियासत सत्तानशीनों के कानों में शीशा बन कर यूं ही तुम पिघलते रहना ,
सुनकर खुद मर जाएंगे हाकिम इक दिन , सच को सच की तरह बस उगलते रहना
***********************
बिलख पडते हैं जो , हमारे कहे,लिखे बोले भर से , तो फ़िर जम के इनपर प्रहार कीजीए,
कतरा कतरा कट जाए ,कालिख सारी , कलम को सान चढाकर इतना धार दीजीए
***********************
हम सीने में आग उबालते हैं , छूने भर से वो खाक हो जाएंगे ,
किसमें हिम्मत ,ललकार दे हमें सामने से ,कलेजे चाक हो जाएंगे
***********************



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...