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सोमवार, 22 जुलाई 2019
कुछ कही अनकही
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बुधवार, 23 अप्रैल 2014
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है
हम जानते हैं तुम जिस देस के वासी हो ,
उस देश को अर्से से इस खेल का चाव है ,
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है ॥
बडे भोले हो ओ बाउजी , फ़न्ने बने फ़िरते हो ,
वो पपलू बनाए जा रहे हैं ,पप्पू सा स्वभाव है ,
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है
साला मुर्गा टंगा है उलटा अस्सी रुपए में,
एक किलो टमाटर होता सौ का भाव है ॥
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है॥
न साले घोषणा बंद करते हैं न बोलना ही ,
गरीब के मेनिफ़ेस्टो में अब भी वडा पाव है,
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है॥
बडे जिगरे वाले बनते हो लकतेजिगर बे ,ऐसा क्या ,
उत्ता तो कलेजा ही बडा नहीं,जित्ता बडा कलेजे पे घाव है ॥
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है ॥
कभी कूका करते थे मोर पपीहे बागों में, अबे होंगे ,
आजकल हर बाग में उल्लू कौवों की कांव कांव है,
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है ॥
इहां पब्लिक का लुटिया गोल है खटते पिटते,
मुदा हाकिम के थर्मामीटर में ,ताप का बढाव है ,
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है
जरा पूछ के देखिए डोरेमॉन से , यही कह है केनिची से,
बेशक जीजा हमें " एक्सीडेंटल" मिले , दीदी में ठहराव है
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है
हर किसी के पास है , किसी ने छुपा रखी है आस्तीनों में ,
तो कोई मूंछों पे टिका के एक छप्पन ,दे रहा ताव है
दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है
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रविवार, 24 नवंबर 2013
चलो लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर
कभी नहीं चली है ,मुद्दों की सियासत इस देश में ,
चलो इक दूजे पर लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर ॥
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क्यूं खिलाफ़ किया जाए किसी को, किसी का अच्छा बोलकर,
देखो जरा ऊंची गर्दन किसी की ,उसे फ़ौरन करो बदनाम फ़िर॥
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उन्हें बंदूक और बारूद की भाषा है मालूम ,बस जिन्हें ,
तुम पता नहीं क्यूं हर बार भेजते हो इश्क के पैगाम फ़िर॥
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तुम्हें पता है वो डर की ताकत जानते हैं , डराएंगे ही ,
तुम आगाज़ जब तेज़ाब सी करते हो,क्यूं सोचते हो अंजाम फ़िर ॥
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ये मत कहिए कि पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं गुनाह देश में ,
हां ये जरूर है कि जो हुआ पर्दे में ,अबकि हुआ है सरेआम फ़िर ॥
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इस देश में लडाने को बहुत से बहाने हैं सियासतदानों के पास,
देखो उसी धर्म मज़हब के नाम पर लडते हैं ,रहीम और राम फ़िर ॥
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जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर तुमने ये रियासत टिका रखी है ,
अगर यही है वो तो अभी के अभी बदल डालो इसका नाम फ़िर॥
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कभी कुहासे और ओस से भीग जाती थीं सांझ की चूनर ,
बदला रूत मगर धुंएं से हुई है धुंधली, शहर की शाम फ़िर ॥
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सोमवार, 18 जून 2012
ज़िंदगी के पन्नों पर ,बिखरे आखर .....
| चित्र , गूगल इमेज खोज इंजन के परिणाम से , साभार |
ये न पूछ मुझसे कि ये आज मुझे हुआ क्या है ,
जो ज़िंदगी ही मर्ज़ है तो बता इसकी दवा क्या है
पत्थर के इस शहर में जाने हर ईंट क्यूं पराई है
धधक रहा है कुछ भीतर , किसने ये आग लगाई है
चल माना दस्तूर अदला बदली का है , द्स्तूर निभाया ही जाए जरूरी तो नहीं
जो देते रहे ताउम्र इस ज़िदगी को ,वही ज़िंदगी से पाया भी जाए जरूरी तो नहीं
कतरों और किश्तों में बंटी जिंदगी ,तकदीर, जो तेरी यही रज़ा है ,
जो जिंदगी आसान ही होती जाए , तो ये मौत भी बेमज़ा है ...
तू अब न मुझे डराया कर जिंदगी,बता क्या नहीं अब तक खोया हूं मैं ,
गीली आंखों को भी रोने दे ज़रा, बहुत हंसती आंखों से रोया हूं मैं
ज़िन्दगी , क्यूं तुझसे कोई शिकायत करूं , इक मुझसे ही तू खफ़ा तो नहीं ,
तेरी वफ़ा पर होते रहे शुबहे , मौत मेहबूबा ही कभी हुई बेवफ़ा तो नहीं
छूटा गांव , बिछडे अपने , पकडी जो , उस रेल को कोसता हूं मैं ,
जीतने की ज़िद थी जिंदगी के खेल की , उस खेल को कोसता हूं मैं ...
जिंदगी को बहुत अच्छे से महसूसता रहा , कि इस देश का अवाम हूं मैं ,
जो यूं करता हूं ज़िक्र जिंदगी मौत का , बस इसलिए कि आदमी आम हूं मैं
जिंदगी यूं न कटेगी , इसे जीने का पहले ,दस्तूर समझ लो ,
सज़ा कबूलने में आसानी होगी ,इक बार अपना कसूर समझ लो
मत रोक मुझे , मत टोक मुझे , आज तो जी की कहने दे ,
कब तलक मुस्कुराती रहेंगी आंखे , आज अश्कों को बहने दे
मुझे नाहक ही दर्द महसूस हुआ , ये शाम ही है कुछ उदास उदास ,
जिंदगी इर्द गिर्द थी होठों के आजकल बसेरा है उसका आंखों के आसपास
दिन काट लेते हैं तपिश में जलाते खुद को ,क्यूं ये रात अच्छी नहीं लगती ,
कैसे मिलने का वादा करूं तुमसे जब खुद से मुलाकात अच्छी नहीं लगती
मुहब्बत से झूठी कोई शै नहीं ,इश्क से बडा और कोई व्यापार नहीं
जिंदगी तो हमेशा से बेवफ़ा रही है , मौत भी अपना यार नहीं ....
हर बार मैं तुझसे मिला के आंखें , मुस्कुरा दूं , ऐसा कोई करार नहीं है ,
जो तुझे मेरी कद्र नहीं , तो जा जिंदगी , मुझे भी तुझसे अब प्यार नहीं है
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