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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020
ज़िंदगी और मुहब्बत के नाम
दो पंक्तियों में लिखे हुए कुछ शब्द जो मुहब्बत और ज़िंदगी के फलसफों को समझने के लिए लिखे गए | देखिये आप भी , इन्हें मैं अनाम आदमी के नाम से अलग अलग मंचों पर साझा करता रहा हूँ | यदि प्रयास पसंद आए तो चैनल के साथी बनें |
लेबल:
कविता,
कुछ पंक्तियाँ,
दो लाईना,
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हिंदी शायरी
शनिवार, 24 सितंबर 2016
सुनो लड़कियों ,तुम यूं न मरा करो ..
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
हत्या कर दो ,
या अंग भंग ,
फुफकार उठो ,
डसो ज़हर से,
बन करैत,
बेझिझक ,
बेधड़क ,
प्रतिवाद ,
प्रतिकार ,
प्रतिघात , करा करो
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
तुम मर जाती हो ,
फिर मर जाती हो ,
मरती ही जाती हो ,
मरती ही रहती हो ,
कभी गर्भ में ,
कभी गर्त में ,
कभी नर्क में ,
दुनिया के दावानल में
तुम यूं न जरा करो ,
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
मोमबतियां जलाएंगे ,
वे सब ,
खूब जोर से ,
चीखेंगे चिल्लायेंगे ,
मगर ,
खबरदार , जो
भरम पाल बैठो ,
बीच हमारे ही ,
से कोइ हैवान ,
फिर से ,
फिर फिर ,
वही कर उठेगा ,
वो नहीं आयेंगे ,
मरते मरते तो कह दो उनसे ,
तुम यूं न गिरा करो ,
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
सोमवार, 28 सितंबर 2015
हर औरंगजेब को अब मिटा देंगे
आज गाने दे मुझको , गीत मातृवंदना के ,
मुहब्बत के नगमे, फिर कभी तुझको सुना देंगे ||
उठ बढ़ा कदम अपनी हिम्मत और विशवास से
"वो" रुदाली हैं जो , रो रो के तुझको डरा देंगे ||
उन्हें भरोसा है अपनी काबलियत पर इतना कि ,
मरने देंगे पहले , जी उठने की फिर वो दवा देंगे ||
आग लगाने की उनको आदत नहीं है मगर ,
लेस चिंगारी लबों से, धीरे धीरे उसको हवा देंगे ||
बड़ी मुद्दतों बाद उतारा है बोझ कन्धों से ,
उन्हें अब भी यकीन है ,दौर डोरेमोन का वो फिर चला देंगे ||
मनाने दो मातम , बेताजी का उनको ,
जो रूठे कभी तो , विदेशों में छुट्टी बिता लेंगे ||
गया छुपने छुपाने का वो मौसम कहीं ,
अब तो सुभाष-शास्त्री की फाईलें भी दिखा देंगे ||
उन्हें गुमां हो चला जब मिली जीत का ,
लडे आप ही अपनों में जो , वो गैरों से क्या वफ़ा देंगे ||
सुन पड़ोसी बेगैरत , तू मान भी जा ,
तिनके सी हैसियत तेरी , बाँध पतंगों में किसी दिन उड़ा देंगे ||
जयघोष ये उठा है , चहुँओर से अब ,
तुम रोओ गाओ , हर शोर को अब दबा देंगे ||
निशानियाँ गुलामी की बहुत हैं संभाली हमने ,
नाम लिख कलाम का , हर औरंगजेब को मिटा देंगे ||
मर्ज़ भांपा है ,साठ सालों तक जिन्होंने ,
तैयार रहना , ठीक करने को , वे कडवी दवा देंगे ||
रविवार, 31 मार्च 2013
ठीक है -- नहीं ठीक नहीं है
| सब ठीक है |
खौफ़नाक है मंज़र क्यूं , आज मेरे शहर का ,
वो कहते हैं , ठीक है , मगर इस देश की हालत ठीक नहीं है ॥
जंगलों में भी कहां दिखती है ऐसी हैवानियत अब,
खुद की नस्ल का शिकार करता , ये आदमजात ठीक नहीं है ॥
हर बार निपटने का वादा और अब न होने देने की बातें ,
हर बार कुछ हो जाने पर यही कहते हो , ये बात ठीक नहीं है ॥
इक तरफ़ पूजते हो माता और देवी कह -मान कर ,
मगर नारी के प्रति अब , तुम्हारे ख्यालात ठीक नहीं है ॥
कैसे कह दूं कि बसर हो रहा है जीवन चैन और सकून से ,
काले दिन भी डराते हैं मन को ,उजली ये रात ठीक नहीं है ॥
क्यूं करूं गैरों से गिले-शिकवे , और उंगली उठाऊं उनपे,
जब पाया है कि बंद कमरों में , अपनों का भी साथ ठीक नहीं है ॥
जो करता रहा है दावा , गरीबों मजलूमों के साथ होने का,
बरसों से भर रहा है जेबों को अपनी , वो "हाथ", ठीक नहीं है ॥
चलता है , जो किश्तों में मिले , ज़ख्मों का कतरा कतरा,
मगर दुखों से बांध दो रिश्ता , रंजो-गम की , बारात ठीक नहीं है ॥
हम निपट लेंगे, सुलट लेंगे, एक आध , तीन चार को भी ,
मगर धूर्तों की टोली, चोरों की पूरी जमात , ठीक नहीं है ॥
इतिहास का सबक सीखना होगा , बडे ही गौर से हाकिम ,
फ़िर किसी अंधे के हाथ हस्तिनापुर को देना , हे तात! ठीक नहीं है ॥
आप सियासती लोग हैं जो भी , खेलना खूब जानते होंगे,
अवाम क्या जाने शह-मात की भाषा , बिछाना यूं शतरंजी बिसात ठीक नहीं है ॥
लडने को गरीबी, बेकसी, बेकारी और बीमारी बहुत है ,
घसीटते रहो , भाषा, धर्म , मज़हब और जात-पात ठीक नहीं है ॥
तुम बढाने को खजाने का वजन , महंगा हर बाज़ार करो बेशक ,
मगर बोझ तले मर जाए आम आदमी ही , गरीब की छाती पर लात ठीक नहीं है ॥
तुम्हारी मजबूरी हम खूब समझते हैं , चुप रहने की , रहो खामोश ही,
मगर हमारे सैनिकों की सिरकटी लाश पर भी न छलकें , ज़ज़्बात ठीक नहीं है
करो खूब दोस्ती के वादे उनसे , और निभाते चलो टूटते बनते रिश्ते,
हर बार बारूद की खेप , मिलती जो आतंक की सौगात ठीक नहीं है ॥
सोने चांदी की कीमत अब जान से ज्यादा है , मेहबूब मेरे,
यूं सरेआम निकल जाना पहन के जेवरात , ठीक नहीं है ॥
ठीक नहीं है .....ठीक नहीं है
लेबल:
कविता,
ठीक नहीं है,
दो पंक्तियां,
बिखरे आखर
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
कुछ अनमना सा , कुछ अनकहा , कुछ अनसुना सा ...
प्लास्टिक थैला उत्पादन पर प्रतिबंध लगेगा ,
तुम देखना , इसका पैम्फ़लेट , पॉलिथिन में बंटेगा ....
हाय ! कित्ता पडा रे भारी , मैडम इटली का त्याग रे ,
दूध बन गया ज़हर समान , पेट्रोल में लग गई आग रे ...
बीच सडक पर , आज फ़िर जना एक मां ने बच्चा ,
मां तडपती सरे राह ,हाय देश , तेरा अर्थशास्त्र निकला कच्चा
अब तो ये तय है कि , जब तक ये सरकारी गाल रहेंगे ,
दिन रात इन पे पडते , जनता के चमाटों से लाल रहेंगे
काठ फ़ूस का इक रावण मिला , बताई अपने दिल की हूक ,
असली रावण राज कर रहे ,क्यों हर बार मुझको ही देते हो फ़ूंक .....
हाइटेक होगा आडवाणी का रथ ,
होता रहे , फ़िर भी मिलेगा गड्ढे वाला पथ ....
फ़ेसबुकियाओ , ऑरुकुटाओ , गुगलियाओ या ट्विट्टियाते रहो ,
कुदरत ने जब खाने वाले बख्शे हैं देश को , तुम सुबह शाम जुतियाते रहो
अबे ई खबर है , युवराज़ ने की मेट्रो और टैक्सी की सवारी ,
शुक्र मनाओ कि जनता अभी होश में , वर्ना छापते आरती कैसे गई उतारी
दादा बोले हैं कि दू हज़ार चौदह का चुनाव , युवराज की अगुवाई में ही लडा जाएगा ,
अबे एतना डिले कर दिए हो ,देखना, बियाह से पहले इनको वृद्धा पेंशन दिया जाएगा
अब जो आते हैं आंखों मे , उन्हें सपना कहूं तो कैसे कहूं
रोज़ गुजरते हैं जो बगल से अक्सर , मगर अपना कहूं तो कैसे कहूं
कहीं हो रहा कन्या पूजन , कहीं देवी का श्रंगार रे ,
वहीं हो रहा मान भी मर्दन , वहीं कोई ईलाज खर्च से रही जिंदगी हार रे ..
लो जी चार्ल्स शोभराज जी हैं एकदम्मे बेकसूर ,
बिग बॉस में उनकी कनिया proove कर देंगी जरूर .
मिलावटी पदार्थ बेचने वालों की खैर नहीं ,
तब तक कोई न बच पाए ,रहे इन्हें खरीदे बगैर नहीं
लो अबके हो लेगा ये बिग बॉस और भी मशहूर ,
तेरह गो कुल जनानी हैं , एक ठो शक्ति कपूर ....
एआईईईई पेपर लीक मामले की रिपोर्ट एचआरडी मंत्रालय ने दबाई !
जब देखो , दबने दबाने की खबर आती है , अबे इस मंत्रालय की कराओ दवाई
बहन जी ने कहा है कि अब आरक्षण का कोटा बढाया जाए,
इतना ही क्यों , हम तो कहते हैं , एक एक पत्थर का हाथी भी दिलाया जाए
गुरुवार, 2 जून 2011
हर बार ये हादसा टल जाता है ......बिखरे आखर
| चित्र , गूगल से साभार |
होते होते इश्क ये बस रह जाता है ,
हर बार ये हादसा टल जाता है ,
हम रूमानी होते हैं रुत देख के,
मौसम , बिन बताए ही बदल जाता है ....
यूं तो रूठने मनाने का है अपना मजा ,
कौन कब रूठे कब माने , किसको पता,
मेहबूबा का दिल है तो ऐसा ही होगा ,
पल में माना , फ़िर पल में ही मचल जाता है ......
हां , मौका देती है जिंदगी , सबको एक बार ,
उसके ईशारे को फ़िर भी, जो समझ न सके ,
उसकी तकदीर फ़िर दफ़न हो कर रहे,
जो समझा ईशारा , तो संभल जाता है ........
ख्वाहिशों के भी रंग हैं कितने हज़ार,
आंखें जितनी सपने भी उतने , बस ,
किसी को चांद चूमने का चाहत , और,
किसी का मन, कंकड से ही बहल जाता है ...
कोशिश हर बार करता हूं , नई नई ,
जाने कितने ही नुस्खे आजमाता हूं ,
जितना ही फ़ूंक के करता हूं ठंडा ,
कलेजा, उतना अक्सर उबल जाता है .....
मेरी बांहो को रही है तलाश हमेशा ही ,
कुछ दोस्तों का साथ भी मैंने खोया-पाया,
मुझे छोडते नहीं हैं ,यार मेरे ,अकेला कभी,
कोई न कोई तो साथ टहल जाता है ....
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
अबकि दोस्तों की दीवाली खूब अच्छी मनी....
अबकि मेरे कुछ
दोस्तों की दीपावली
बहुत अच्छी मनी,
या कि उन्होंने ,
इसे खुद ही
अच्छी तरह मनाया।
होली में कुछ
गडबड हो गई थी,
मगर इस बार ,
पर्याप्त थी बोतलें,
और चखना भी ,
बहुत स्वादिष्ट था,
इसलिये सबने,
चार चार पैग, ज्यादा चढाया।
बस इतना हुआ कि ,
जो बच्चे उनके
दिवाली मनाने को आतुर थे,
जब देखा कि ,
उनके पापा व्यस्त हैं,
मगर नसीहत थी कि
पटाखे किसी बडे के साथ चलाना,
सो क्या करते, सबने,
उन पटाखों को मेरे साथ चलाया।
क्योंकि उन्हें पता था,
कि जब अंकल को
होली के रंग पसंद आये,
तो दिवाली की रोशनी भी भायेगी.........................................
सोचता हूं...दोस्तों के पर्व कितने कमाल के होते हैं न..कितनी समानता , कितनी एकरूपता होती है...रंगों का पर्व हो या रोशनी का...भाई बहन का हो या पति पत्नि का सब एक ही जज्बे से मनाया जाता है....सब कुछ ग्लासों में ही डुबाया जाता है॥
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बच्चे,
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शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
सपनो को फ्रिज में रख छोड़ा है
मैंने सपने देखना,
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
रविवार, 8 जून 2008
स्त्री (एक कविता )
आज आपको वीरेन्द्र सारंग जी की एक कविता पढ्वाता हूँ जो मुझे बेहद पसंद है,
मैं चाहता हूँ स्त्री होना,
सुरेले स्वर के साथ कर्कश भी,
करुना के बाद थोडा क्रोध भी,
मैं स्त्री होकर चुपचाप जीवन नहीं चाहता॥
मैं उकठा पुराण में खूजूंगा अपने को,
आर्त्नादों में अर्थ,,
मुंह लगना और भैंस का जाना पानी में,
समझकर पंखा झेलूंगा उमस भरे दिन में,
स्त्री होकर॥
मैं स्त्री होकर वाद्य नहीं होना चाहता की बजता रहूँ....
बर्तन भी नहीं की मंजता रहूँ सुबह-शाम,
मैं जानता हूँ, स्त्री से जो हवा आती है, वह,
सहस्र होती... सहती हो जाती है, और भोगती रहती स्त्री,
सारे काम भरे हैं घट्ठों वाले हाथों में ,
फ़िर भी बवालेजान स्त्री, मेहेंदी रचने के बाद भी,
ओखल-जाँत, बाल-जूडे, श्रृंगार भावना से लबरेज स्त्री,
गंदे मुहावरों के लिए प्रसिद्ध स्त्री,
श्रम-सौंदर्य के स्वेद में एन वक्त पर खाती है डांट,
पुष्ट आत्मविश्वास और कमाया-धमाया मिल जाता पानी में,
स्त्री होकर मैं चाहता हूँ मुट्ठी भीचना॥
मैं जानना चाहता हूँ और स्त्री की यात्राएं,
जो सिर्फ़ वही करती है एक पुरूष के लिए,
मैं सरंक्षित करना चाहता हूँ,
स्त्री के भीतर दबे उन्चासों पवन,
मैं विशेष आत्मविश्वास के साथ स्त्री के सफर पर हूँ,
स्त्री होकर .... वाकई मैं चाहता हूँ स्त्री होना॥
सोमवार, 2 जून 2008
हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )
जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥
हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥
कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥
बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥
कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥
लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥
एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥
अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥
अजय कुमार झा
9871205767
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥
हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥
कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥
बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥
कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥
लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥
एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥
अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥
अजय कुमार झा
9871205767
बुधवार, 5 मार्च 2008
में खुद को ही प्यार करने लगा
जब लगे,
दुत्कारने,
मुझको सभी,
परित्यक्त ,
सा हर कोई,
व्यवहार करने लगा॥
खुद को,
उठाया,
गले से,
लगाया,
में खुद ,
खुद को,
ही प्यार करने लगा॥
जीता रहा,
जिस दुनिया को,
अपने,
सीने से लगाए,
मुझे अपने से,
दूर जब ये,
संसार करने लगा॥
खुद को,
सम्भाला,
संवारा-सराहा,
स्नेह से,
पुचकारा,
खुद को ही,
लाड करने लगा॥
उसने इतना,
दिया नहीं मौका,
कि उसे,
कह पाता,
मैं बेवफा,
तो खुद ,
आईने में,
अपने अक्स से,
मोहब्बत का,
इजहार करने लगा।
क्या करता सोचा चलो कोई तो होना ही चाहिए प्यार करने वाला तो मैं खुद ही क्यों ना
दुत्कारने,
मुझको सभी,
परित्यक्त ,
सा हर कोई,
व्यवहार करने लगा॥
खुद को,
उठाया,
गले से,
लगाया,
में खुद ,
खुद को,
ही प्यार करने लगा॥
जीता रहा,
जिस दुनिया को,
अपने,
सीने से लगाए,
मुझे अपने से,
दूर जब ये,
संसार करने लगा॥
खुद को,
सम्भाला,
संवारा-सराहा,
स्नेह से,
पुचकारा,
खुद को ही,
लाड करने लगा॥
उसने इतना,
दिया नहीं मौका,
कि उसे,
कह पाता,
मैं बेवफा,
तो खुद ,
आईने में,
अपने अक्स से,
मोहब्बत का,
इजहार करने लगा।
क्या करता सोचा चलो कोई तो होना ही चाहिए प्यार करने वाला तो मैं खुद ही क्यों ना
गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008
अतीत की एक खिड़की (कविता )
अतीत की,
इक झरोखा ,
जबसे,
अपने अन्दर,
खोला है॥
आँगन के,
हर कोने पे,
टंगा हुआ,
बस,
खुशियों का,
झोला है॥
तोतों के,
झुंड मिले,
तितलियों की,
टोली भी,
बरसों बाद ,
सुन पाया,
मैं कोयल की,
बोली भी॥
आम चढा ,
अमरुद चढा ,
नापे कई,
नदी नाले भी,
बन्दर संग ,
मिला मदारी,
मिल गए ,
जादू वाले भी॥
नानी से फ़िर,
सुनी कहानी,
दादी ने ,
लाड दुलार किया,
गली में मिल गयी,
निम्मो रानी,
जिससे मैंने , प्यार,
पहली बार किया॥
बारिश पडी टू,
नाचे छमछम,
हवा चली और,
उडी पतंग,
मिली दिवाली,
फुल्झाध्यिओं सी,
इन्द्रधनुष से,
होली के रंग॥
फ़िर इक,
हल्का सा,
झोंका आया,
खुली आँख और,
कुछ नहीं पाया॥
काश , कभी,
वो छोटी खिड़की,
यूं न बंद होने पाती,
ख़ुद खोलता,
मैं उसको,
रोज ये जवानी,
बचपन से ,
जा कर मिल आती॥
अफ़सोस की ये खिड़की सिर्फ़ तभी खुलती है जब मैं गहरी नींद में होता हूँ.
इक झरोखा ,
जबसे,
अपने अन्दर,
खोला है॥
आँगन के,
हर कोने पे,
टंगा हुआ,
बस,
खुशियों का,
झोला है॥
तोतों के,
झुंड मिले,
तितलियों की,
टोली भी,
बरसों बाद ,
सुन पाया,
मैं कोयल की,
बोली भी॥
आम चढा ,
अमरुद चढा ,
नापे कई,
नदी नाले भी,
बन्दर संग ,
मिला मदारी,
मिल गए ,
जादू वाले भी॥
नानी से फ़िर,
सुनी कहानी,
दादी ने ,
लाड दुलार किया,
गली में मिल गयी,
निम्मो रानी,
जिससे मैंने , प्यार,
पहली बार किया॥
बारिश पडी टू,
नाचे छमछम,
हवा चली और,
उडी पतंग,
मिली दिवाली,
फुल्झाध्यिओं सी,
इन्द्रधनुष से,
होली के रंग॥
फ़िर इक,
हल्का सा,
झोंका आया,
खुली आँख और,
कुछ नहीं पाया॥
काश , कभी,
वो छोटी खिड़की,
यूं न बंद होने पाती,
ख़ुद खोलता,
मैं उसको,
रोज ये जवानी,
बचपन से ,
जा कर मिल आती॥
अफ़सोस की ये खिड़की सिर्फ़ तभी खुलती है जब मैं गहरी नींद में होता हूँ.
बुधवार, 27 फ़रवरी 2008
खुद को इक दिन इंसान बना लूंगा (कविता)
कोशिश मेरी,
जारी है,
इक दिन ,
मैं खुद को,
इंसान बना लूंगा॥
जब्त कर लूंगा ,
सारा गुस्सा ,
और नफरत भी,
भीतर ही अपने,
अभिमान दबा दूंगा॥
तुम रख लेना,
मेरे हिस्से की,
खुशी का,
कतरा-कतरा,
तुम्हारे सारे,
ग़मों को अपना,
मेहमान बना लूंगा॥
उखड जायेंगे,
सियासत्दाओनोन् के,
महल और,
मनसूबे भी,
बेबसों की,
आहों को वो,
तूफान बना दूंगा॥
तुम दरो न,
की कहीं ,
मेरे हमनाम,
बन कर,
बदनाम ना हो जाओ,
जब कहोगे,
खुद को, तुमसे,
अनजान बना लूंगा॥
बेशक मुझे,
बड़े नामों में,
कभी गिना ना जाए,
बहुत छोटी ही सही,
मगर अपनी,
पहचान बना लूंगा।
कोशिश जारी है और आगे भी रहेगी...
जारी है,
इक दिन ,
मैं खुद को,
इंसान बना लूंगा॥
जब्त कर लूंगा ,
सारा गुस्सा ,
और नफरत भी,
भीतर ही अपने,
अभिमान दबा दूंगा॥
तुम रख लेना,
मेरे हिस्से की,
खुशी का,
कतरा-कतरा,
तुम्हारे सारे,
ग़मों को अपना,
मेहमान बना लूंगा॥
उखड जायेंगे,
सियासत्दाओनोन् के,
महल और,
मनसूबे भी,
बेबसों की,
आहों को वो,
तूफान बना दूंगा॥
तुम दरो न,
की कहीं ,
मेरे हमनाम,
बन कर,
बदनाम ना हो जाओ,
जब कहोगे,
खुद को, तुमसे,
अनजान बना लूंगा॥
बेशक मुझे,
बड़े नामों में,
कभी गिना ना जाए,
बहुत छोटी ही सही,
मगर अपनी,
पहचान बना लूंगा।
कोशिश जारी है और आगे भी रहेगी...
बुधवार, 13 फ़रवरी 2008
दरकते रिश्ते (एक कविता )
मर रहा है ,
हर एहसास आज,
और रिश्ते भी ,
दरकते जा रहे हैं॥
अब ख़ुद पर बस नहीं,
कठपुतली , बन वक्त के साथ,
थिरकते जा रहे हैं॥
लगे तो रहे, ताउम्र, पर जाने,
निपटाए काम की, हम ही ,
निपटते जा रहे हैं॥
gairon से दुश्मनी की,
कहाँ है फुरसत,
हम तो अपनों से ही,
उलझते जा रहे हैं।
न खाते-पैगाम, न दुआ सलाम,
युग हो रहा है वैश्विक, हम,
सिमटते जा रहे हैं॥
चाहता हूँ की रहे साथ सिर्फ़ मोहाब्बत,
पर खुदगर्जी और नफरत भी मुझसे,
लिपटते जा रहे हैं॥
सपने पाल लिए इतने की,
भिखारियों की मानिंद,
घिसटते जा रहे हैं॥
आंखों ने रोना छोडा,
हमने भी सिल लिए लैब,
जख्म ख़ुद ही अब तो ,
सिसकते जा रहे हैं॥
कैसे कोसुं अब,
इस पापी दुनिया को,
जब मुझमें भी सभी पाप,
पनपते जा रहे हैं॥
हर एहसास आज,
और रिश्ते भी ,
दरकते जा रहे हैं॥
अब ख़ुद पर बस नहीं,
कठपुतली , बन वक्त के साथ,
थिरकते जा रहे हैं॥
लगे तो रहे, ताउम्र, पर जाने,
निपटाए काम की, हम ही ,
निपटते जा रहे हैं॥
gairon से दुश्मनी की,
कहाँ है फुरसत,
हम तो अपनों से ही,
उलझते जा रहे हैं।
न खाते-पैगाम, न दुआ सलाम,
युग हो रहा है वैश्विक, हम,
सिमटते जा रहे हैं॥
चाहता हूँ की रहे साथ सिर्फ़ मोहाब्बत,
पर खुदगर्जी और नफरत भी मुझसे,
लिपटते जा रहे हैं॥
सपने पाल लिए इतने की,
भिखारियों की मानिंद,
घिसटते जा रहे हैं॥
आंखों ने रोना छोडा,
हमने भी सिल लिए लैब,
जख्म ख़ुद ही अब तो ,
सिसकते जा रहे हैं॥
कैसे कोसुं अब,
इस पापी दुनिया को,
जब मुझमें भी सभी पाप,
पनपते जा रहे हैं॥
शनिवार, 9 फ़रवरी 2008
आदमियों की भीड़ में इंसान नहीं मिलता
यहाँ आदमियों की,
भीड़ है,
पर कोई,
इंसान नहीं मिलता..
सबसे निश्छल,
सबसे निष्पाप,
ऐसा कोई,
नादाँ नहीं मिलता॥
बेईमानों की,
पहुंच ऊंची है,
रुत्बेदार कोई,
ईमान नहीं मिलता॥
पंख मिलते ही,
उड़ जाते हैं परिंदे घरों से,
माँ-बाप की लाठी सा,
संतान नहीं मिलता॥
हर तरफ शोर है,
कहीं रोने का, कहीं गाने का,
शहर का कोई कोना,
सुनसान नहीं मिलता॥
यूं तो धनकुबेरों की,
फेहरिस्त है बहुत लम्बी,
पर गरीबों को अपना कहे जो,
धनवान नहीं मिलता॥
भीड़ है,
पर कोई,
इंसान नहीं मिलता..
सबसे निश्छल,
सबसे निष्पाप,
ऐसा कोई,
नादाँ नहीं मिलता॥
बेईमानों की,
पहुंच ऊंची है,
रुत्बेदार कोई,
ईमान नहीं मिलता॥
पंख मिलते ही,
उड़ जाते हैं परिंदे घरों से,
माँ-बाप की लाठी सा,
संतान नहीं मिलता॥
हर तरफ शोर है,
कहीं रोने का, कहीं गाने का,
शहर का कोई कोना,
सुनसान नहीं मिलता॥
यूं तो धनकुबेरों की,
फेहरिस्त है बहुत लम्बी,
पर गरीबों को अपना कहे जो,
धनवान नहीं मिलता॥
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008
दर्द संभालता हूँ मैं ( एक कविता )
हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
बुधवार, 6 फ़रवरी 2008
वो लड़कपन के दिन (एक कविता )
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
सोमवार, 21 जनवरी 2008
कुछ उजड़ा हुआ सा
पेड़ के पत्ते,
से लिपटे,
ओस की बूँद ,
के आरपार,
जो की,
देखने की कोशिश,
इक इन्द्रधनुष,
मिला,
छितरा हुआ सा।
खुद में समा,
जब खुद को ,
टटोला,
अपने को,
तलाशा,
तो पाया,
इक पुलंदा,
बिल्कुल ,
बिखरा हुआ सा॥
बहुत बार ,
सजाया-संवारा,
वो आशियाना,
मगर,
हर बार ,
तुम बिन ,
लगा वो,
घरौंदा,
उजड़ा हुआ सा॥
अजय कुमार झा
फोन 9871205767
से लिपटे,
ओस की बूँद ,
के आरपार,
जो की,
देखने की कोशिश,
इक इन्द्रधनुष,
मिला,
छितरा हुआ सा।
खुद में समा,
जब खुद को ,
टटोला,
अपने को,
तलाशा,
तो पाया,
इक पुलंदा,
बिल्कुल ,
बिखरा हुआ सा॥
बहुत बार ,
सजाया-संवारा,
वो आशियाना,
मगर,
हर बार ,
तुम बिन ,
लगा वो,
घरौंदा,
उजड़ा हुआ सा॥
अजय कुमार झा
फोन 9871205767
रविवार, 20 जनवरी 2008
एक शीर्षकहीन कविता
यूं तो हम,
गर्दिशों की रेत से भी,
इक बुलंद इमारत'
खादी करने का,
माद्दा रखते हैं।
पर क्या करें '
कि मजबूर हैं हम,
लोग उम्मीद तो '
हमसे ,इससे भी '
ज्यादा रखते हैं॥
वो जानते हैं कि ,
मैं तोड़ देता हूँ,
सभी कसमें, और वादे,
फिर भी ,जाने क्यों'
हर बार मुझसे इक,
नया वादा रखते हैं॥
उन्हें शक है ,
मेरी मयकशी का,
इसलिए क्यों ना पीना हो,
पूरा मयखाना भी,
मगर हर बार,
जाम हम ,
अपना आधा रखते हैं..
गर्दिशों की रेत से भी,
इक बुलंद इमारत'
खादी करने का,
माद्दा रखते हैं।
पर क्या करें '
कि मजबूर हैं हम,
लोग उम्मीद तो '
हमसे ,इससे भी '
ज्यादा रखते हैं॥
वो जानते हैं कि ,
मैं तोड़ देता हूँ,
सभी कसमें, और वादे,
फिर भी ,जाने क्यों'
हर बार मुझसे इक,
नया वादा रखते हैं॥
उन्हें शक है ,
मेरी मयकशी का,
इसलिए क्यों ना पीना हो,
पूरा मयखाना भी,
मगर हर बार,
जाम हम ,
अपना आधा रखते हैं..
शनिवार, 3 नवंबर 2007
सड़क तुम क्यों नहीं चलती
उस दिन अचानक ,
चलते,चलते,
पूछ बैठा,
काली पक्की सड़क से,
तुम क्यों नहीं चलती,
या कि क्यों नहीं चली जाती,
कहीं और,
वो हमेशा कि तरह,
दृढ ,और सख्त , बोली,
जो मैं चली जाऊं ,
कहीं और, तो,
तुम भी चले जाओगे,
कहीं से कहीं,
और फिर ,
कौन देगा,
उन, कच्ची पगडंडियों को ,
सहारा,
और,
टूट जायेगी आस
उन लाल ईंटों से,
बनी सड़कों की , जो,
बनना चाहती हैं ,
मुझ सी,
सख्त और श्याम॥
झोलटनमाँ
चलते,चलते,
पूछ बैठा,
काली पक्की सड़क से,
तुम क्यों नहीं चलती,
या कि क्यों नहीं चली जाती,
कहीं और,
वो हमेशा कि तरह,
दृढ ,और सख्त , बोली,
जो मैं चली जाऊं ,
कहीं और, तो,
तुम भी चले जाओगे,
कहीं से कहीं,
और फिर ,
कौन देगा,
उन, कच्ची पगडंडियों को ,
सहारा,
और,
टूट जायेगी आस
उन लाल ईंटों से,
बनी सड़कों की , जो,
बनना चाहती हैं ,
मुझ सी,
सख्त और श्याम॥
झोलटनमाँ
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