कल देर रात को अनुज समान मित्र
शिवम मिश्रा जी का फ़ोन आया । उन्होंने याद दिलाया कि आज यानि तेरह अप्रैल वही दिन है जब जालियांवाला बाग नरसंहार हुआ था और चूंकि मैं हाल ही में वहां सपरिवार गया हुआ था इसलिए अपने अनुभव को साझा करने के लिए आज के दिन से उपयुक्त और क्या हो सकता है । मैंने उन्हें ये कहते हुए धन्यवाद दिया कि हिंदी ब्लॉगजगत को इस बात के लिए अवश्य ही गर्व होगा कि वे ऐसे कुछ गिने चुने ब्लॉगरों में से एक हैं जो हमेशा ही अपने विचारों , अपने लेखों और पोस्टों से न सिर्फ़ देशभक्ति का जज़्बा जगाए रखते हैं बल्कि मुझ जैसे बहुत से ब्लॉगर मित्रों /सखाओं को आज के दिन भी कृतघ्न बने रहने से बचा लेते हैं ।
जालियांवाला बाग से मेरा परिचय इतना पुराना है कि बस एक धुंधली सी याद ही थी । पिताजी की फ़ौज की नौकरी के दौरान फ़िरोज़पुर में नियुक्ति के समय ही हम सपरिवार जालियांवाला बाग गए थे । मुझे सिर्फ़ एक ही चीज़ याद थी और वो था , शहीदी कुंआं जो तब सिर्फ़ एक कुंआ ही था , बिल्कुल खुला और कुंए जैसा । इसलिए पिछले वर्ष जब अमृतसर का कार्यक्रम बना तो मैं ये सोच के रोमांचित और उत्तेजित हो गया कि इतिहास एक बार अपने आपको फ़िर से दोहरा रहा था शायद । मेरा पुत्र भी लगभग उसी समय उस पावन स्थल के दर्शन करने जा रहा था जिसके मैंने शायद इसी उम्र में किए थे । पत्नी का गृह राज्य पंजाब होने के बावजूद अभी तक वो भी इसे देखने से वंचित थी सो ये और भी पक्का हो गया ।
इससे पहले कि जालियांवाला बाग में प्रवेश करूं कुछ बातें जो तब और अब भी मेरे दिमाग में घूम रही थीं वो कुछ इस तरह की थीं । हमें अपने देश पर बलिदान होने वालों को अपनी स्मृति में बसाए रखने , ताउम्र उनकी कृतज्ञता मानने और इस तरह की तमाम भावनाओं को नि:संदेह पश्चिमी देशों से सीखना चाहिए तो आज भी इन मामलों में हमसे कहीं आगे और अनुकरणीय हैं । आज देश के कर्णधारों और निर्लज्जता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुके उन तमाम राजनेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है जो सुना है कि भगत सिंह , सुखदेव को भी आज की जाति धर्म , भाषा की छिछली राजनीति में घसीटने में लगे हैं ।
मुझे जालियांवाला बाग के अंदर जाते समय एक बात और जो ध्यान आई वो ये कि ब्रितानी सरकार जो पूरे विश्व को सभ्यता और संस्कार उसकी महारानी सालों के बाद भी जब उस जालियांवाला बाग में आती है या उस साम्राज्य का युवराज उस स्थल को देखने आता है तो शर्मिंदगी और माफ़ी की जगह पर यदि ये कह कर निकल जाता है कि वहां उस दिन नरसंहार में मरने और घायल लोगों की संख्या को बढा चढा कर बताया दिखाया गया है तो या तो तो भारत सरकार को उसे धक्के मार के निकाल देना चाहिए थी या खुद भी उस दिन शर्म से डूब मरना चाहिए था । लेकिन सरकार तो राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के बहाने अब भी उनके तलुवे चाटने का कोई मौका नहीं चूकती । ऐसी स्थिति में तो यही विकल्प बचता है कि अगर हम वाकई चाहते हैं कि हमारी आने वाली नस्लें भी इतनी ही संवेदनहीन न हो जाएं तो यकीनन उन्हें ये बताते रहना होगा कि ये और देश भर में इन जैसे तमाम स्थलों का भारत को ऋणी रहना चाहिए चिर काल तक क्योंकि ये आजादी उन्हीं के बलिदानों के कारण मिली है ।
कुछ यादों के पन्ने से ..................
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| मुख्य द्वार |
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| सूचना पट्टिकाएं |
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| अंदर घुसते ही सामने बना हुआ छोटा सा आश्रय स्थल |
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| भीतर का अहाता जिसे अब सीमेंटेड कर दिया गया है |
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| जालियां वाला बाग द्वार के साथ ही बना संग्राहलय |
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| अमर ज्योति |
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| शहीदों को समर्पित ज्योति की लौ |
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| अंखंड अमर ज्योति |
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| अमर ज्योति के नीचे शिलापट्ट |
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| विश्राम स्थल |
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| दूर चमकता शहीद स्तंभ |
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| शहीद स्तंभ |
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| जालियांवाला बाग ....का बाग |
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| बाग का मनोहारी दृश्य |
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| संग्रहालय से लेकर शहीदी कुएं तक जाने के लिए बना आकर्षक कॉरीडोर |
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संग्रहालय में लगे चित्र जिनके लिए लिखा था कि चित्र खींचना मना है मगर जब तक मुझे टोका गया तक मोबाईल अपनी आदत के अनुसार काम कर चुका था
हालांकि मुझे तब और तब से लेकर अब तक ये नहीं समझ में आया कि आखिर किस वजह से या किन वजहों से ऐसा कहा गया कि हमें अपने ही शहीदों और उनकी तस्वीरों , उनसे जुडी जानकारियों समाचार पत्रों की छवियों की तस्वीर खींचने से रोका गया , हो सकता है कि कुछ विशिष्ट कारण रहे हों ।
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| सुदूर दक्षिण राज्यों से आया हुआ बच्चों का एक दल जिन्हें विशेष रूप से जालियांवाला बाग घुमाने के लिए लाया गया था |
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| बाग के अंदर घूमते विभिन्न प्रांतों से आए हुए लोग |
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| संग्राहलय के अंदर बना हुआ विशालकाय चित्र जो उस दिन हुए नरसंहार को प्रतिबिंबित कर रहा है |
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| इस चित्र के आगे खडे होकर आप एक पल के लिए उस दिन को अनुभव कर सकते हैं और यकीनन ये आपको सिहरा के रख देगा |
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| शहीदी कुंआं , जिसे अब एक स्मारक का रूप दे दिया गया है |
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| कुंए के भीतर झांकते गोलू जी और पुत्री बुलबुल अपनी मां के साथ |
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| कुंए को चारों तरफ़ से जाल लगा के बंद कर दिया गया है अब |
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| कुंए के अंदर का एक दृश्य |
इस कुंएं में झांकते हुए जब मैंने श्रीमती जी को पूरा बात बताई तो वे सिहर उठीं थीं और उनकी आंखों के कोर से ढुलकता आक्रोश बहुत कुछ कह गया था । सच कहूं तो मुझे अच्छा लगा था कि वे भी ठीक वैसा ही महसूस करती हैं जैसा कि मैं ।
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| ये वही जगह है जहां खडे होकर जनरल डायर ने बाग में मौजूद हजारों निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाईं थीं |
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| पुत्र आयुष गौर से पढते हुए |
पुत्र आयुष और साथ में ही घूमने आया साढू साहब के साहबजादे जॉनी , ने उन चार घंटों में लगातार एक के बाद एक प्रश्नों की झडी लगाकर मुझे इतिहास के उन पन्नों को फ़िर से पढने और याद करने पर मजबूर कर दिया जिन्हें कभी स्कूल कॉलेज में पढकर हम उत्तेजित हो जाया करते थे । मैंने उन्हें एक एक बात जो मुझे उस समय याद थी सब सुनाई और बताई उधम सिंह तक
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| द्वार पर स्थित अहाता |
उस दिन शहीद हो उन तमाम आत्माओं को नमन कि आज हम चैन की सांस ले पा रहे हैं । आजाद सोच के साथ जी पा रहे हैं , लिख पा रहे हैं , पढ पा रहे हैं ....उन्हें शत शत नमन