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शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

वो सब बता गया








एक ही निगाह में ,वो सब बता गया 
दर्द का पूछा तो ,मज़हब बता गया 

अंदाज़ा मुझे भी इंकार का ही था 
यक़ीन हुआ नाम गलत जब बता गया 

हाथ मिलाया तो नज़रें जेब पर थीं 
यार मिलने का यूं सबब बता गया 

लूटता रहा गरीबों को ताउम्र जो 
पूछने पर ख़ुद को साहब बता गया 

वादे कमाल के किये उसने ,मुकरा तो 
कभी उन्हें अदा ,कभी करतब बता गया 

बता देता राज़ तो तमाशा ही न होता 
खेल ख़त्म हुआ ,वो तब बता गया 

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

मेरा कत्ल किसने किया


चंद पंक्तियाँ ,बेतरतीब ,बिखरी ,सिमटी हुई , आप खुद देखें














गुरुवार, 8 सितंबर 2011

कुछ बेतरतीब से , छिटके , भटके ....कुछ बिखरे आखर





पिछले दिनों मन अशांत रहा और शायद उद्वेलित भी , जाने किन किन रौ में बहता हुआ क्या कुछ लिखता रहा , कहीं स्टेटस के रूप में तो कहीं किसी टिप्पणी के रूप में , देखिए आप भी ,






लो फ़िर दे गया आदेश किसी को , कोई पाकिस्तानी आका ,
अजमल , अफ़ज़ल , को ज़िंदा रखो , करें रोज़ शहर में धमाका


राजा , कलमाडी , मोझी , रेड्डी , और आज गए अमर ,
अजब देश की गजब कहानी , जेल में अब सिर्फ़ नेता आते नज़र .
 
 
 
बहिन जी का जुत्ती आया , धर के हवाईजहाज ,
विकीलीक्ज़ को आगरा भेजो , खोल दिहिस सब राज़ ...
 
 
 
 
आजकल बस एक ही बात , इकदूजे से ,पूछें जेल के संतरी ,
कित्ता स्कोर हो गया टोटल , अबे कितने आ गए मंतरी ...
 
 
 
लो फ़िर दे गया आदेश किसी को , कोई पाकिस्तानी आका ,
अजमल , अफ़ज़ल , को ज़िंदा रखो , करें रोज़ शहर में धमाका ...
 
 
 
कै ठो नयका प्रपोजल ले के ,पिरधान जी,चले थे ढाका ,
रूठ के ममता बैठ गईं , लुट गए मोहन काका ...
 
 
 
अमर जी मांगे थे छूट , रे हमरी एक किडनी है फ़ेल ,
अदालत बोली , एक किडनी वाले भी जा सकते हैं जेल .....
 
 
 
तुम कमज़ोर , हो कायर भी , निर्दोंषों को छुप कर देते मार ,
तुम निश्चिंत , तुम बेफ़िक्र , क्योंकि फ़िर बचा लेगी सरकार ,
आम आदमी ही बस क्यों रहता , निशाने पर हर बार ,
कभी उन्हें भी मौत दो , जो देते तुम्हें हथियार ......
 
 
कोई घडियाली टसुए बहा रहा होगा , 
क्या किया , क्या करना है , बता रहा होगा ,
कल वही , उसी हैवान की बगल में , 
किसी ज़ेल में भी , कहकहे लगा रहा होगा 
 
 
 
अब क्यों सुनें और क्या सुनें तुम्हारी ,
तुम्हारी ही सुन कर तो इतने जीवन बर्बाद हुए ,
अबे छोडो , हर बार वही बकवास करते हो , तुमसे तो,
नए जुमले भी अब तक नहीं ईज़ाद हुए .




पिरधान जी पिरेसान थे , केतना सताया टू जी ,
ये जी जी की आदत गले पडे ,अब आ गए हू जी













शनिवार, 9 जनवरी 2010

होठों को मना लूंगा , पर आखों का क्या



होंठो को मना लूंगा मैं,
वे मान भी जाएंगे,
हमेशा की तरह,
शिकायत को भी ,
नहीं खुलेगें ,
और मौन रहेंगे,
एक दूसरे को ,
जकडे हुए जबरन ,







इन आखों का,
क्या ये तो ,
पलक झपकते ही ,
सब देख लेती हैं ,
और जो बंद ,
हो भी जाएं तो ,
जाते जाते सब ,
कह जाती हैं ,
मस्तिष्क को ,
जिसके बंद होने पर ,
सुना है कि,
इंसान मर जाता है ॥

रविवार, 1 नवंबर 2009

तुम्हारी हसरतों का फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां..

















भीड के साथ होता हूं
पर भीड साथ नहीं देती,
अक्सर
मेरा साथ देती हैं मेरी तन्हाईयां ॥



बेशक न कहो होठो से,
और पलकों से इशारे न करो,
तुम्हारी हसरतों का
फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥



सबके मुकदमे
सालों साल नहीं चला करते,
हाकिम हुक्कामो की
होती हैं चंद सुनवाईयां ॥



कई करते हैं कत्ल पे कत्ल तो
कहीं जिक्र भी नहीं होता,
कई खुद का कत्ल कर लेते हैं
तो भी होती हैं रुस्वाईयां ॥




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