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रविवार, 30 जुलाई 2017

ख़्वाब करेंगे गुफ्तगू अब .....



 चंद बिखरे सिमटे से आखर , कुछ बेतरतीब उनींदी उंघती सी पंक्तियाँ









गुरुवार, 28 जून 2012

शहरों में आंसुओं का अब स्वाद नमकीन नहीं होता...







उन्हें शक है कि उजले , चमकीले ,
शहरों में ,शायद कभी कोई नहीं रोता
कह दो है वो, इतना है हर रात ,रोता ,
पता चल गया होता कबका जो ,तुमने चख लिया कहीं होता 
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



हर दरख्त की जड मिट्टी में होती है ,
हर पेड की मंज़िल आसमां हो बेशक ,
लकडी का कोई टुकडा बनने कुर्सी सियासत की ,
यकायक ही कभी नामचीन नहीं होता ,


शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता

वो जो फ़र्क जानते हैं मान और अपमान का ,
वही तो चापलूसी बेइज़्ज़ती महसूस करते हैं ,
गरीब की बस रोटी ही इक आखिरी औकात है ,
भूखे  का किसी दम भी तौहीन नहीं होता ..

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



उसूलों कानूनों की एक फ़ौज़ है फ़िर भी ,
हादसों अपराधों के लिए हुआ मशहूर मेरा देश ,
है इक दस्तूर अब यहां बहुत मजबूत सा हो चला ,
काबिल वकील साथ में हो , जुर्म कोई सा भी हो ,संगीन नहीं होता

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता


खुली बंद हर जोडी आंखो को है , हुक्म कि सपना देखें ,
फ़िर ताउम्र उस सपने को पाने में , न वक्त बेवक्त अपना देखें ,
बेशक शहर भी सपने देखता होगा , मगर स्याह और सफ़ेद ही ,
इतनी चकाचौंध उजियारी रातों में , कोई सपना रंगीन नहीं होता

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



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