प्रचार खिडकी

यात्रा संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
यात्रा संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 3 मई 2010

बैंकिंग की परीक्षा और सिलिगुडी की यात्रा (यात्रा संस्मरण )



मुझे कभी नहीं पता था कि यात्रा संस्मरण कैसे लिखा जाता है , और क्या क्या लिखा जाता है , या कि क्या नहीं लिखा जाता है । जीवन में इतनी यात्राएं की हैं कि यदि उन्हें लिख कर सहेज न पाता तो अफ़सोस ही रहता । इसकी शुरूआत जाने क्या सोच कर कर गया , पिछली इस पोस्ट और इस पोस्ट में जब मैंने सीधा सीधा जो याद था वो सब जस का तस लिख कर रख दिया , आपने पसंद किया तो मेरा भी उत्साह बढ गया । जैसा कि पहले ही कहा था कि इन यादों में छुपे हुए पन्नों को लिखने में मुझे खुद ही इतना आनंद आया कि लगा कि इसे आगे बढाता चलूं । कई मित्रों ने मुस्कुराते हुए कहा कि , मैं इतने पहले की गई यात्राओं को कैसे याद रख गया तो क्या कहूं जी , किताबों में से कभी कुछ याद रख नहीं पाता था सो दिमाग में जो खाली जगह बची हुई थी उनमें ये यादें बखूबी सिमट जाती थीं । बस उन यादों को गर्म पानी में उबाल कर तरोताज़ा करके आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूं । एक बात और बाबूजी की फ़ौज की नौकरी ने पूरे परिवार को हिंदुस्तान के कई शहरों के दर्शन करा दिए थे और जो कसर रह गई थी या जो भटकना और लिखा था वो सब हमारी परीक्षाओं ने पूरी कर दी थी । बैंकिंग की दी गई ढेर सारी परीक्षाएं उन्हीं का एक हिस्सा था । तो आज फ़िर से आपको एक ऐसी ही यात्रा पर लिए चलता हूं ।



कोलकाता बैंकिंग की हमारी परीक्षा का केंद्र इस बार हमने चुना था सिलिगुडी । नहीं जी इस बार एक नई जगह देखने और घूमना नहीं था सिर्फ़ इसका कारण । इसकी पहली वजह थी कि ये बस मार्ग से जुडा हुआ था , मतलब सबसे नजदीक परीक्षा केंद्रों में से एक इसलिए स्वाभाविक से रूप से हमारा पहला विकल्प । दूसरा और ज्यादा दमदार ये कि हमारा ही एक साथी छात्र , जो खुद इस प्रतियोगिता परीक्षा में भाग लेने के लिए तैयार बैठा था उसके चाचाजी , वहीं सिलिगुडी की किसी चाय बागान के स्कूल में हेडमास्टर थे । यानि वहां रहने खाने पीने की टेंशन खत्म । यही वजह थी कि वो महाशय मोहन झा जी हमसे चार दिन पहले ही निकल कर अपना डेरा जमा चुके थे सिलिगुडी में । मैं और एक और साथी गुलाब झा जी , हम दोनों भी इस बार परीक्षा से एक दिन पहले ही रवानगी की तैयारी कर चुके । दरभंगा से सिलिगुडी के लिए सीधी बस सेवा थी , शायद एतियाना ट्रेवेल्स के नाम से प्रसिद्ध बस सेवा थी वो उस रूट की जिसका संचालन बीच में पडने वाले पूर्णिया से किया जाता था । बस दरभंगा से शाम को छ: या साढे छ; बजे रवाना होती थी और सुबह आठ या नौ बजे तक सिलिगुडी पहुंचा देती थी । हम तो हमेशा की तरह ही तैयार थे ।


बात शायद १९९२ जुलाई की है , बरसात ने अपनी एंट्री मार ली थी, मगर अभी टाप गियर में नहीं पहुंची थी । हम दोनों दिन में ११ बजे अपने गांव से निकले । साथ में वही एयर बैग जिसमें कुछ किताबें और कपडों के अलावा एक गर्म शौल भी रख लिया गया था एहतियातन , हालांकि इस बार थोडे आश्वस्त थे कि घर जैसा ही होगा तो फ़िर चिंता किस बात की है , आखिर मोहन जी गए किसलिए हैं आगे आगे ।
हम दोनों लगभग ढाई बजे तक दरभंगा बस स्टैंड पहुंच कर बस आदि का पता करके उसके समय वगैरह की पूरी तहकीकात करके आराम से सीट लेकर बैठ भी गए । एक से दो भले क्यों कहा जाता है ये ऐसे मौकों पर ठीक ठीक पता चल जाता है । समय था , सो उतर कर कुछ केले वैगेरह भी समेट लिए गए , आखिर बस में कौन सा स्टेशन बार बार आना था जो आगे खरीद पाते , फ़िर पेट और भूख को भी कहां पता होता है बस और रेल यात्रा का अंतर । बस हमारे अंदाज़े से उलटा समय पर चल दी ।


हम लोग भी थोडे से थक से गए थे बैठे बैठे इसलिए बस के चलते ही हवा के थपेडों ने कब झपकी दिला दी पता ही नहीं चला । वैसे हमारे सो जाने का एक कारण और ये भी था कि बाहर अंधेरा हो चुका था और कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था सिवाय इसके कि बादल घिर रहे थे । बस कितनी देर चलती रही और कहां कहां से गुजरी हमें कुछ भी पता नहीं चला ।


जब हमारी आंखें खुली तो घडी पर नजर गई तो देखा कि ११ बज रहे थे । हमें लगा कि शायद खाने वाने के लिए रोका होगा ड्राईवर ने । बारिश तो नहीं हुई थी अलबत्ता उमस के कारण घबराहट महसूस हो रही थी । थोडी देर में पता लगा कि ये तो सीमा जो शायद बिहार और बंगाल राज्यों के बीच की सीमा थी , पर लगने वाला ये वो जाम है जो रोज ही लगता है । दिन भर रुके हुए ट्रक शाम होते ही एक साथ चल पडते हैं जिससे ये जाम कभी न लगे तो न लगे , वर्ना रोज की बात है । कंडक्टर ने बताया कि एक आध घंटे में रास्ता साफ़ हो जाएगा ।


हमें जोरों की भूख लगी थी मगर केला खाने का मन भी नहीं था ................. तो फ़िर खाया क्या और ..........अरे रे रे ...आज ही नहीं सब कुछ .कल भी तो है न

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

बैंकिंग परीक्षा और नैनीताल का सफ़र (यात्रा संस्मरण )


बहुत दिनों से सोच रहा था कि अभी तक जीवन के सफ़र में की गई सारी यात्राएं अपने आप में एक कहानी , एक फ़साने से कम नहीं हैं । और ये भी तय है कि समय के साथ साथ उनमें से यदि सभी को भूल न भी जाऊं तो कुछ तो वो यादें होंगी ही जो धीरे धीरे मेरा साथ न दें । तो ऐसे में उन्हें हमेशा के लिए अपने लिए और भविष्य के लिए भी सहेजने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता था कि उन्हें ब्लोग पोस्टों के रूप में दर्ज़ कर दिया जाए । मैंने कभी यात्रा संस्मरण नहीं लिखा , पढा भी बहुत ज्यादा नहीं है । इसलिए जो जितना याद है उसे बिल्कुल ठीक वैसा ही शब्दों के रूप में रखता जाऊंगा ।

ये शायद साल १९९२ का रहा होगा , महीना सितंबर का । ये वो साल था जब अचानक ही स्नातक करते करते ही हमारे पूरे ग्रुप पर अलग अलग प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने का शौक चर्रा गया था । शौक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उस समय हम सब न तो उन परीक्षाओं के लिए शायद उतने गंभीर थे न ही उस स्तर की हमारी तैयारी थी कि हम उन परीक्षाओं को पास कर पाते , मगर जैसा कि हमारे सीनीयर बताया करते थे कि ऐसी परीक्षाओं में भाग लेते रहने का अनुभव ही आगे काम आएगा । हम भी अनुभव बटोरने में जुट गए जो आगे जाकर सचमुच ही बहुत काम आया । उन दिनों बैंकिंग में अवसरों  की भरमार थी और उनके लिए परीक्षाओं में भाग लेना हमारे लिए देशाटन के अवसर से कम नहीं था । खैर तो मैं बात कर रहा है उत्तर प्रदेश बैंकिंग सर्विसेज़ द्वारा ली जाने वाली बैंकिंग परीक्षा में भाग लेने की ।

 मेरे सभी मित्र और सहपाठी अक्सर ये ध्यान रखते थे कि परीक्षा केंद्र वो होना चाहिए जो , घर के नजदीक हो , ऐसा करने के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तर्क रहता था । नजदीक परीक्षा केंद्र होने से आने जाने का कम किराया और शायद वहां पहले पहुंच कर रुकने की मजबूरी भी खत्म हो जाती थी । मगर मैं जाने किन कारणों से हमेशा ऐसा नहीं कर पाता था , सो मैंने परीक्षा केंद्र भर दिया था नैनीताल । प्रवेश पत्र जब हाथों में पहुंचा तो सिर्फ़ इतना समय मिला कि , जो भी धुले हुए कपडे थे उनमें से दो जोडी कपडे, और ढेर सारी टिप्स और प्रतियोगिता परीक्षा वाली किताबें एक एयर बैग में ठूंस कर , नकद नारायण ले कर घर से निकल जाना होता था । हर सफ़र की शुरूआत मधुबनी से निकलने वाली बस से हुआ करती थी चाहे उससे दरभंगा के लिए निकलना हो या फ़िर पटना के लिए । पटना से आगे की यात्रा रेल द्वारा । मधुबनी में जो कुछ सुविधाएं दुविधाओं जैसी स्थिति में हमेशा से रहे हैं उनमें से एक मधुबनी का बस स्टैंड भी है । बस थोडे से स्थान किसी तरह ठूंस ठास कर दस बसों को खडा करने की जगह थी उसमें । बरसात के दिनों में तो नीचे कीचड की लथपथ के बीच चमकती बसें किसी भी आधुनिक कलाकार को प्रेरित कर सकती थीं नई तरह की चित्रकारी के लिए । अब शायद सुना है कि ये किसी नई जगह पर बनाया जाने वाला है । सरकारी बस स्टैंड और उसकी बसें देखे तो एक युग बीत चुका था लोगों को ।


मधुबनी से बस ली , उन दिनों शाही तिरुपति ट्रैवेल्स की धूम थी जिसका नाम एक इस बात के लिए भी था कि उसकी बसें पटना का कह कर बीच रास्ते यानि मुज्फ़्फ़रपुर या दरभंगा में नहीं उतार देती थीं । सो सुबह सुबह ही पटना वाली टू बाई टू , नहीं शायद टू बाई थ्री थी , में बैठ कर निकल लिए पटना की ओर । सितंबर में पडने और महसूस होने वाली चिपचिपी गर्मी अपने उफ़ान पर थी । मधुबनी से निकल कर पटना जाने वाली बसों का एक प्रचलित रिवाज था । सवारी के लिए दरभंगा में दस मिनट रुकना , मुजफ़्फ़रपुर के किसी लाईन होटल पर खाने पीने के लिए रुकना , सो इस परंपरा को निभाते हुए हम भी बस में लदे हुए पटना पहुंच गए । उन दिनों का रेल का सफ़र भी कम रोमांचक नहीं होता था । सब कुछ रोमांच ही था , न ये पता होता था कि किस रेल से निकलना है न ये पता होता था कि बैठ कर जाना या खडे होकर ।

सीधा पटना से लखनऊ तक का जेनरल टिकट खरीदा गया । स्टेशन पर पहुंचे सैकडों परीक्षार्थियों के आने से से ये दुविधा तो समाप्त हो गई थी कि अब आगे कैसे निकलना है , किस ट्रेन से जाना है । जो भी ट्रेन मिली पहली लखनऊ की सब के सब उसी में लद गए । ऐसा लगा जैसे किसी टिड्डी या मधुमक्खी दल ने ट्रेन पर चिपक मार दी हो । ट्रेन में पटना से लखनऊ तक का वो सफ़र जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता । पूरी ट्रेन में रत्ती भर भी जगह नहीं थी । बस पांव जमाने की जगह मिल गई तो बस वो अंगद का पांव बन गई जैसे , अजी चाह कर भी उसे हिलने हिलाने की जुर्रत नहीं की जा सकती थी । मगर उससे आगे निकलने वाला अपने साथियों में मैं शायद  अकेला ही था । लखनऊ पहुंच कर सबसे विदा लेकर आगे बढा ॥


    वहां पूछने पर पता चला कि , एक गलती कर चुका था, शनिवार की शाम तक वहां पहुंचा था और अगले दिन यानि रविवार को मेरी परीक्षा थी , तो यदि अब जरा भी देर किसी भी वजह से मुझे होती नैनीताल पहुंचने में तो निश्चित रूप से उस परीक्षा से मैं वंचित रह सकता था । अब उलटी गिनती शुरू हो गई थी .............

यदि आज ही पूरी पोस्ट लिख दी तो आप बोर हो जाएंगे ..इसलिए इसका अगला भाग कल । और अभी इस ब्लोग पर आगे कुछ दिनों तक यात्रा संस्मरण ही लिखने की कोशिश करूंगा , मेरा मतलब बस यही जो अभी लिख रहा हूं ॥
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...