जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥
हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥
कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥
बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥
कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥
लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥
एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥
अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥
अजय कुमार झा
9871205767
प्रचार खिडकी
सोमवार, 2 जून 2008
हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )
रविवार, 1 जून 2008
भडास की सडास
अक्सर ही कई ऐसे मौकों पर जब मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा होता है न जाने कहाँ से अपने अज़ीज़ मित्र श्री चिटठा सिंह जी ,
कहीं न कहीं जरूर मिल जाते हैं और फ़िर कुछ ऐसी वैसी बात अवश्य ही निकल जाती है है की उसे यहाँ बताना लाजिमी हो जाता है। पिछले दिनों जैसे ही मिले कहने लगे , अमा सुना तुमने इन दिनों तो फ़िर से चिट्ठाजगत पर भडास ही भडास है अरे भडास क्या उसकी सडास ही फ़ैली हुई है , चारों तरफ़ उसकी बू आ रही है।
" क्या कह रहे हो मियां , एक बार फ़िर से, यार मुझे तो लगता है की ये सब इनकी टी आर पी का चक्कर होगा, वैसे भी मैं तो पहले ही इनका पंच लाइन पढ़ कर समझ गया था कि, सब उल्टे लोग हैं, बताओ लिखा है कि उगल दो , क्या उगल दो यार , कुछ भी अगर सलीके से निकालोगे तो ठीक है उग्लोगे तो उबकाई ही तो बाहर निकलेगी। और फ़िर इन्हें एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह दुश्मनों को ढूँढने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती , सब मजे में एक दूसरे को धकियाने में और गलियाने में लगे रहते हैं। और चिटठा जगत पर हर दूसरी पोस्ट में भडास निकली रहती है। अरे भाई , भडास और गुस्सा निकालने के लिए क्या बाहर कम जगर और गुंजाइश है कि यहाँ भी शुरू हो गए , यार यहाँ तो प्यार बांतों , कुछ अच्छी अच्छी बातें करो कि दिल को सुकून पहुंचे। "
चिटठा सिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे ( यहाँ मैं बता दूँ कि चिट्ठासिंग उन मासूम लोगों में से एक हैं जो बस तीली जला कर चुपचाप खड़े हो जाते हैं और फ़िर लगी हुई आग की लपटें चुपचाप तापते हैं ) , ने आगे कहा , " अरे भाई , इस बार मामला ज्यादा गंभीर है , सुना है कि किसी भडासी भाई ने बलात्कार की कोशिश की है और उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है । और बेशर्मी की हद देखो कि जिसका बलात्कार करने की कोशिश की हैवो उनके मित्र की पुत्री थी शायद। "
मैं अवाक और स्तब्ध हो गया, " क्या कह रहे हो , क्या ये सच है , हाँ यार टी आर पी के लिए कोई इस हद तक तो भडास नहीं निकाल सकता । वैसे ये तो ठीक है कि कोई इस चिट्ठाजगत पर चिकनी चुपडी बातें कर रहा है और दुनिया भर की शिक्षा बघाड रहा है इसका मतलब ये तो नहीं कि उसे gundagardee करने , लम्पती करने और सीधे कहूँ तो नीचे गिरने का कोई अधिकार नहीं है , मगर यार ये तो हद से भी हद हो गयी कि सीधा बलात्कार तक पहुँच गए । खैर वो भी क्या करते आजकल सबको पता है कि अपने क़ानून का जो हाल है उसमें तो बलात्कार और हत्या ही दो वे जुर्म बच गए हैं जिनमें अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । यार ये तो चिट्ठाजगत के लिए बुरी ख़बर है और जब इसकी चर्चा किसी और माध्यम में होगी तो सोचो इसका क्या असर पडेगा। वैसे इसके बाद क्या हुआ
यार उनकी खूब लानत मलामत हुई, और बहुत से लोगों ने तो उनसे अपने सम्बन्ध तक तोड़ लिए , सच कहूँ तो उनपर सबने जम कर भडास निकाली । अच्छा अब चलता हूँ , चिट्ठाजगत की और भी खबरें लेकर फ़िर मिलूंगा।
चिट्ठासिंग चले गए और मैं अब तक उस भडास की सडास महसूस कर रहा हूँ.
कहीं न कहीं जरूर मिल जाते हैं और फ़िर कुछ ऐसी वैसी बात अवश्य ही निकल जाती है है की उसे यहाँ बताना लाजिमी हो जाता है। पिछले दिनों जैसे ही मिले कहने लगे , अमा सुना तुमने इन दिनों तो फ़िर से चिट्ठाजगत पर भडास ही भडास है अरे भडास क्या उसकी सडास ही फ़ैली हुई है , चारों तरफ़ उसकी बू आ रही है।
" क्या कह रहे हो मियां , एक बार फ़िर से, यार मुझे तो लगता है की ये सब इनकी टी आर पी का चक्कर होगा, वैसे भी मैं तो पहले ही इनका पंच लाइन पढ़ कर समझ गया था कि, सब उल्टे लोग हैं, बताओ लिखा है कि उगल दो , क्या उगल दो यार , कुछ भी अगर सलीके से निकालोगे तो ठीक है उग्लोगे तो उबकाई ही तो बाहर निकलेगी। और फ़िर इन्हें एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह दुश्मनों को ढूँढने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती , सब मजे में एक दूसरे को धकियाने में और गलियाने में लगे रहते हैं। और चिटठा जगत पर हर दूसरी पोस्ट में भडास निकली रहती है। अरे भाई , भडास और गुस्सा निकालने के लिए क्या बाहर कम जगर और गुंजाइश है कि यहाँ भी शुरू हो गए , यार यहाँ तो प्यार बांतों , कुछ अच्छी अच्छी बातें करो कि दिल को सुकून पहुंचे। "
चिटठा सिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे ( यहाँ मैं बता दूँ कि चिट्ठासिंग उन मासूम लोगों में से एक हैं जो बस तीली जला कर चुपचाप खड़े हो जाते हैं और फ़िर लगी हुई आग की लपटें चुपचाप तापते हैं ) , ने आगे कहा , " अरे भाई , इस बार मामला ज्यादा गंभीर है , सुना है कि किसी भडासी भाई ने बलात्कार की कोशिश की है और उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है । और बेशर्मी की हद देखो कि जिसका बलात्कार करने की कोशिश की हैवो उनके मित्र की पुत्री थी शायद। "
मैं अवाक और स्तब्ध हो गया, " क्या कह रहे हो , क्या ये सच है , हाँ यार टी आर पी के लिए कोई इस हद तक तो भडास नहीं निकाल सकता । वैसे ये तो ठीक है कि कोई इस चिट्ठाजगत पर चिकनी चुपडी बातें कर रहा है और दुनिया भर की शिक्षा बघाड रहा है इसका मतलब ये तो नहीं कि उसे gundagardee करने , लम्पती करने और सीधे कहूँ तो नीचे गिरने का कोई अधिकार नहीं है , मगर यार ये तो हद से भी हद हो गयी कि सीधा बलात्कार तक पहुँच गए । खैर वो भी क्या करते आजकल सबको पता है कि अपने क़ानून का जो हाल है उसमें तो बलात्कार और हत्या ही दो वे जुर्म बच गए हैं जिनमें अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । यार ये तो चिट्ठाजगत के लिए बुरी ख़बर है और जब इसकी चर्चा किसी और माध्यम में होगी तो सोचो इसका क्या असर पडेगा। वैसे इसके बाद क्या हुआ
यार उनकी खूब लानत मलामत हुई, और बहुत से लोगों ने तो उनसे अपने सम्बन्ध तक तोड़ लिए , सच कहूँ तो उनपर सबने जम कर भडास निकाली । अच्छा अब चलता हूँ , चिट्ठाजगत की और भी खबरें लेकर फ़िर मिलूंगा।
चिट्ठासिंग चले गए और मैं अब तक उस भडास की सडास महसूस कर रहा हूँ.
शनिवार, 31 मई 2008
वो आख़िरी रात
कहीं पढ़ा सुना था कि, जिंदगी बहुत छोटी है, मोहब्बत के लिए भी और नफरत के लिए भी और शायद इसीलिए किसी ने कहा भी है कि ,
दुश्मनी करना भी तो इतनी जगह जरूर रखना कि सामने पड़ो तो नज़रें चुरानी न पडें।
मगर शायद ये बात समझते समझते बहुत देर हो गयी या यूं कहूँ कि उम्र के उस पड़ाव पर बहुत कम लोग ये बातें समझ पाते हैं और मैं उन में से नहीं था। बात उन दिनों की है जम मैं अपनी दसवीं की परीक्षाओं के बाद खेल कूद में लगा हुआ था। हम सब दोस्त एक जगह इकठ्ठा होते और फ़िर आगे का कार्यक्रम तय होता और वो एक जगह हम पहले ही तय कर लेते थे। तब जाहिर सी बात है कि आज की तरह न तो कोई शोप्पिंग मॉल होता था न कोई स्य्बर कैफे न ही कोई कोफ्फी हौस इसिलए किसी न किसी दोस्त का घर ही हमारा मिलन स्थल बन जाता था और वहाँ थोडा सा उस दोस्त के मम्मी पापा को तंग करके हम आगे निकल जाते थे। उन दिनों खेल कूद का दौर था, अजी नहीं सिर्फ़ क्रिकेट की मगजमारी नहीं थी, नहीं ये नहीं कहता कि नहीं थी मगर दूसरे खेल भी हम मेज़ में खेला करते थे, सर्दियों की रातों में badminton खेलना अब तक याद आता है। मगर कुछ दिनों से हमारे बीच में वोलीबाल खेलने का एक क्रेज़ सा बन गया था। सभी लोग दो टीमों में बाँट कर खूब खेलते थे और पसीने में तर होकर शाम के गहराने तक घर वापस लौट जाते थे।
अक्सर खेल ख़त्म होने के बाद , थोड़ी देर सुस्ताने के लिए जब बैठते थे तो पहला काम तो ये होता था कि ये तय करें कि कल किसके घर मिलना है , दूसरा ये कि आज कौन एकदम बकवास खेला फ़िर थोड़ी गपशप । यहाँ ये बता दूँ कि हम लोगों के बीच कभी अपने परीक्षा परिणामों की चर्चा नहीं होती थी ,शायद उसका कारण ये था कि तब आज के जैसा karfew जैसा माहौल नहीं बनता था। अमर मेरे दोस्तों में थोडा ज्यादा करीब था और सबसे ज्यादा मेरी उसीसे पटती थी। उसका कारण एक ये भी था कि हम दोनों के घर एक ही गली में थे। अक्सर खेल के बाद जब हम दोनों घर लौटते थे तो एक ही साथ और हमेशा उसके साइकल पर लौटते थे । उस दिन अचानक अमर कोई बात कहते कहते बोल पड़ा कि , यार तुने, कैलाश की छोटी बहें को देखा है , कितनी सुंदर है "
मुझे नहीं पता कि ऐसा उसने क्यों कहा , मगर मैं उसके ये कहने से बिल्कुल अवाक् था। क्योंकि कैलाश हमारे साथ पड़ने वाला हमारा दोस्त था और उन दिनों दोस्त की बहन , सिर्फ़ बहन ही होती थी और हम समझते भी थे। अपने घर आने पर मैं चुपचाप घर की ओर चल दिया। अगले दिन से उसकी मेरी बातचीत बंद हो गयी। दोस्तों ने लाख पूछा , उससे भी और मुझसे भी मगर बात वहीं की वहीं रही। लगभग एक या सवा साल तक हम सभी दोस्तों की बीच रहते हुए भी कभी आमने सामने नहीं हुए । इस बात का मुझे कोई मलाल भी नहीं था ।
एक दिन अचानक मुझे पता चला कि कैलाश की उसी बहन की शादी , अमर के फुफेरे भैया से हो रही है और चूँकि कैलाश के पिताजी नहीं थे इसीलिए उसके घर के हालत को देखते हुए अमर ने ही ये रिश्ता करवाया था। मेरा दिल बुरी तरह बैचैन था अमर से मिल कर माफी मांगे के लिए भी और अपनी किए पर शर्मिन्दा होने के कारण भी। मैं अमर के घर गया उसकी मम्मी मुझे इतने दिनों बाद अचानक देख कर पहले चौंकी फ़िर खुशी से आने को कहा। उन्होंने बताया कि अमर उसी रिश्ते के सिलसिले में बाहर गया हुआ है और देर रात तक घर लौटेगा। मैंने उन्हें कहा कि अमर के लौटने पर उसे जरूर बता दें कि मैं आया था, वैसे मैं सुबह आकर मिल जाऊँगा। मुझे उससे कुछ जरूरी बात कहनी है।
उन दिनों फोन का चलन नहीं था तो मोबाईल का कौन कहे। अगली सुबह उठता तो गली में अफरा तफरी का आलम था । हर कोई बदहवास सा भागा जा रहा था। मैंने साथ वाले छोटे लड़के से पूछा कि अबे क्या हुआ कोई चोरी वोरी हुई है क्या , या कहीं झगडा हुआ है ।
नहीं भैया, वो शर्मा जी का बेटा था न अमर , अरे जिससे कभी आपकी दोस्ती थी। सुबह नहाते समय बाथरूम में गिर गया । सर की सारी नसें फट गयी, मर गया बेचारा।
आज तक उस रात की दूरी मुझे सालती है और शायद त उम्र सालेगी। इश्वर से दुआ करता हूँ कि अगले जन्म में किसी भी रूप में अमर को मुझसे जरूर मिलाना ताकि एक बार माफी मांग सकूं.
दुश्मनी करना भी तो इतनी जगह जरूर रखना कि सामने पड़ो तो नज़रें चुरानी न पडें।
मगर शायद ये बात समझते समझते बहुत देर हो गयी या यूं कहूँ कि उम्र के उस पड़ाव पर बहुत कम लोग ये बातें समझ पाते हैं और मैं उन में से नहीं था। बात उन दिनों की है जम मैं अपनी दसवीं की परीक्षाओं के बाद खेल कूद में लगा हुआ था। हम सब दोस्त एक जगह इकठ्ठा होते और फ़िर आगे का कार्यक्रम तय होता और वो एक जगह हम पहले ही तय कर लेते थे। तब जाहिर सी बात है कि आज की तरह न तो कोई शोप्पिंग मॉल होता था न कोई स्य्बर कैफे न ही कोई कोफ्फी हौस इसिलए किसी न किसी दोस्त का घर ही हमारा मिलन स्थल बन जाता था और वहाँ थोडा सा उस दोस्त के मम्मी पापा को तंग करके हम आगे निकल जाते थे। उन दिनों खेल कूद का दौर था, अजी नहीं सिर्फ़ क्रिकेट की मगजमारी नहीं थी, नहीं ये नहीं कहता कि नहीं थी मगर दूसरे खेल भी हम मेज़ में खेला करते थे, सर्दियों की रातों में badminton खेलना अब तक याद आता है। मगर कुछ दिनों से हमारे बीच में वोलीबाल खेलने का एक क्रेज़ सा बन गया था। सभी लोग दो टीमों में बाँट कर खूब खेलते थे और पसीने में तर होकर शाम के गहराने तक घर वापस लौट जाते थे।
अक्सर खेल ख़त्म होने के बाद , थोड़ी देर सुस्ताने के लिए जब बैठते थे तो पहला काम तो ये होता था कि ये तय करें कि कल किसके घर मिलना है , दूसरा ये कि आज कौन एकदम बकवास खेला फ़िर थोड़ी गपशप । यहाँ ये बता दूँ कि हम लोगों के बीच कभी अपने परीक्षा परिणामों की चर्चा नहीं होती थी ,शायद उसका कारण ये था कि तब आज के जैसा karfew जैसा माहौल नहीं बनता था। अमर मेरे दोस्तों में थोडा ज्यादा करीब था और सबसे ज्यादा मेरी उसीसे पटती थी। उसका कारण एक ये भी था कि हम दोनों के घर एक ही गली में थे। अक्सर खेल के बाद जब हम दोनों घर लौटते थे तो एक ही साथ और हमेशा उसके साइकल पर लौटते थे । उस दिन अचानक अमर कोई बात कहते कहते बोल पड़ा कि , यार तुने, कैलाश की छोटी बहें को देखा है , कितनी सुंदर है "
मुझे नहीं पता कि ऐसा उसने क्यों कहा , मगर मैं उसके ये कहने से बिल्कुल अवाक् था। क्योंकि कैलाश हमारे साथ पड़ने वाला हमारा दोस्त था और उन दिनों दोस्त की बहन , सिर्फ़ बहन ही होती थी और हम समझते भी थे। अपने घर आने पर मैं चुपचाप घर की ओर चल दिया। अगले दिन से उसकी मेरी बातचीत बंद हो गयी। दोस्तों ने लाख पूछा , उससे भी और मुझसे भी मगर बात वहीं की वहीं रही। लगभग एक या सवा साल तक हम सभी दोस्तों की बीच रहते हुए भी कभी आमने सामने नहीं हुए । इस बात का मुझे कोई मलाल भी नहीं था ।
एक दिन अचानक मुझे पता चला कि कैलाश की उसी बहन की शादी , अमर के फुफेरे भैया से हो रही है और चूँकि कैलाश के पिताजी नहीं थे इसीलिए उसके घर के हालत को देखते हुए अमर ने ही ये रिश्ता करवाया था। मेरा दिल बुरी तरह बैचैन था अमर से मिल कर माफी मांगे के लिए भी और अपनी किए पर शर्मिन्दा होने के कारण भी। मैं अमर के घर गया उसकी मम्मी मुझे इतने दिनों बाद अचानक देख कर पहले चौंकी फ़िर खुशी से आने को कहा। उन्होंने बताया कि अमर उसी रिश्ते के सिलसिले में बाहर गया हुआ है और देर रात तक घर लौटेगा। मैंने उन्हें कहा कि अमर के लौटने पर उसे जरूर बता दें कि मैं आया था, वैसे मैं सुबह आकर मिल जाऊँगा। मुझे उससे कुछ जरूरी बात कहनी है।
उन दिनों फोन का चलन नहीं था तो मोबाईल का कौन कहे। अगली सुबह उठता तो गली में अफरा तफरी का आलम था । हर कोई बदहवास सा भागा जा रहा था। मैंने साथ वाले छोटे लड़के से पूछा कि अबे क्या हुआ कोई चोरी वोरी हुई है क्या , या कहीं झगडा हुआ है ।
नहीं भैया, वो शर्मा जी का बेटा था न अमर , अरे जिससे कभी आपकी दोस्ती थी। सुबह नहाते समय बाथरूम में गिर गया । सर की सारी नसें फट गयी, मर गया बेचारा।
आज तक उस रात की दूरी मुझे सालती है और शायद त उम्र सालेगी। इश्वर से दुआ करता हूँ कि अगले जन्म में किसी भी रूप में अमर को मुझसे जरूर मिलाना ताकि एक बार माफी मांग सकूं.
गुरुवार, 29 मई 2008
ब्लॉगजगत और ब्लोग्गिंग की कुछ और खबरें
जैसा कि कुछ दिनों पहले मैंने , अपने दूसरे चिट्ठे में जिक्र किया था कि जबसे ब्लोग्गिंग शुरू की हैं, तभी से उससे जुडी तमाम ख़बरों पर स्वाभाविक रूप से नज़र चली ही जाती है, मुझे वो खबरें जब भी रोमांचित या प्रभावित करती हैं तो मन करता है कि आपको भी बताया जाए। अपनी उस पोस्ट में मैंने जिक्र किया था कि किस प्रकार इन दिनों प्रिंट और एकोक्त्रोनिक माधायमों ब्लॉग एवं ब्लोगेर्स की चर्चा हो रही है।
उसी बात को जारे रखते हुए आगे बताता हूँ, पिछले दिनों बहुत से हिन्दी समाचारपत्रों में अलग अलग लेखकों और ब्लोग्गारों द्वारा ब्लॉग विशेषकर हिन्दी ब्लोग्गिंग पर काफी कुछ लिखा गया, इसमें न सिर्फ़ ब्लॉग या उनके नाम के चर्चा हुई बल्कि कुछ बेहद तार्किक और लाभदायक टिप्नियाँ की गयी थी। पहला जिक्र करूंगा दैनिक भास्कर का, जिसमें शैनिवार को रविन्द्र भाई नियमित रूप ब्लॉग उवाच के नाम से ब्लोग्गिंग पर एक स्तम्भ लिखते हैं, इस बार उन्होंने किसी ऐसे ब्लॉग की चर्चा की थी जो पर्यावरण पर काफी कुछ लिख और बता रहा है। उन्होंने इस ब्लॉग की काफी तारीफ करते हुए बताया कि ऐसे ब्लॉग न सिर्फ़ अपना काम बखूबी कर रहे हैं बल्कि उनमें दी गयी जानकारी बहुत से लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है और यही बात उस ब्लॉग को सार्थक बना रही है।
राजधानी से निकलने वाले एक अन्य अखबार आज समाज में भी शनिवार को ही कंप्युटर जगत पर अक्सर लिखने और बहुत सी जानकारी रखने , देने वाले विद्वान् लेखक बालेन्दु दाधीच जी ने विस्तारपूर्वक इस बात की चर्चा की थी कि इतना समय बीत जाने के बाद भी किन किन कारणों से हिन्दी ब्लोग्गेर्स को ना तो वो जगह, न वो प्रसिद्धि , और न ही वो पैसा मिल पा रहा है जो कि एक आम ब्लॉगर जो किसी भी अन्य भाषा में लिख रहा है , को मिल रहा है। इसमें मौलिकता का अभाव , दूसरा ये भी कि किस प्रकार कोई विज्ञापन जो कि स्वाभाविक रूप से अंगरेजी उत्पाद का होता है को एक हिन्दी भाषी पाठक ये लेखक देखने में कितनी रूचि दिखा सकता है। हालांकि उन्होंने ये जरूर जिक्र किया कि जल्दी ही किसी न किसी माध्यम से इन सभी मुश्किलों से पार पाते हुए हिन्दी ब्लॉग जगत भी अपना एक अलग मुकाम बना लेगा।
बुधवार २८ मई को अपने रवीश कुमार जी ने दैनिक हिन्दुस्तान में एक स्तम्भ कमेंट्री में भी ब्लोग्गिंग की चर्चा की है। इसमें उन्होंने ब्लॉग पते के साथ बताया कि कि प्रकार हिन्दी ब्लॉग जगत पर हमारी महिला ब्लोग्गेर्स ने एक बगावती और बुलंद रुख अपना रखा है। नंदिनी जी के ब्लॉग की, notepad की, मनीषा जी की तथा और भी कई महिला ब्लोग्गेर्स की चर्चा बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में की गयी है। इसी दिन दैनिक त्रिबुने के दिल्ली संस्करण में भी विशेष पृष्ठ शिक्षा लोक में अपराजिता ने बताया कि ब्लोग्गिंग करने वाले वो ब्लॉगर जो विशुद्ध रूप से व्यावसायिक ब्लोग्गिंग कर रहे हैं उनमें पैसा कमाने की धुन के कारण कई तरह की मानसिक बीमारियाँ और तनाव भरी दिनचर्या का सामना कर रहे हैं।
पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि अमर उजाला के दिल्ली संस्करण में हिन्दी ब्लोग्गिंग का जिक्र नियमित रूप से रहने लगा है । जैसे कि आज उन ब्लॉग पर बात की गयी है जिन पर वे बच्चे लिख रहे हैं जो इस बार माध्यमिक या उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में बैठे थे। उस ख़बर में तो यहाँ तक बताया गया है कि किस प्रकार कई बच्चों ने तो अपने आत्महत्या के नोट तक लिख डाले हैं।
मगर इन सबके बीच मुझे एक अफ़सोस हमेशा रहता है कि ये तमाम बड़े लोग अपने आपको एक दायरे में समेटे हुए हैं, यहाँ ब्लॉगजगत पर भी और अपनी लेखनी में भी । कहीं भी नए ब्लोग्गेर्स, छोटे छोटे प्रयास करने वाले ब्लोग्गेर्स की कोई चर्चा नहीं , जिक्र तक नहीं। मैंने निश्चय किया है कि ब्लोग्जत पर जल्दी ही आने वाले अपने आलेख में मैं ज्यादा से ज्यादा ब्लोग्गेर्स से सबका परिचय करवाउंगा और कोशिश करूंगा कि उसे यहाँ भी स्कैन कर के लगा सकूं।
मेरा अगला पन्ना ;- वो आखिरी रात.
उसी बात को जारे रखते हुए आगे बताता हूँ, पिछले दिनों बहुत से हिन्दी समाचारपत्रों में अलग अलग लेखकों और ब्लोग्गारों द्वारा ब्लॉग विशेषकर हिन्दी ब्लोग्गिंग पर काफी कुछ लिखा गया, इसमें न सिर्फ़ ब्लॉग या उनके नाम के चर्चा हुई बल्कि कुछ बेहद तार्किक और लाभदायक टिप्नियाँ की गयी थी। पहला जिक्र करूंगा दैनिक भास्कर का, जिसमें शैनिवार को रविन्द्र भाई नियमित रूप ब्लॉग उवाच के नाम से ब्लोग्गिंग पर एक स्तम्भ लिखते हैं, इस बार उन्होंने किसी ऐसे ब्लॉग की चर्चा की थी जो पर्यावरण पर काफी कुछ लिख और बता रहा है। उन्होंने इस ब्लॉग की काफी तारीफ करते हुए बताया कि ऐसे ब्लॉग न सिर्फ़ अपना काम बखूबी कर रहे हैं बल्कि उनमें दी गयी जानकारी बहुत से लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है और यही बात उस ब्लॉग को सार्थक बना रही है।
राजधानी से निकलने वाले एक अन्य अखबार आज समाज में भी शनिवार को ही कंप्युटर जगत पर अक्सर लिखने और बहुत सी जानकारी रखने , देने वाले विद्वान् लेखक बालेन्दु दाधीच जी ने विस्तारपूर्वक इस बात की चर्चा की थी कि इतना समय बीत जाने के बाद भी किन किन कारणों से हिन्दी ब्लोग्गेर्स को ना तो वो जगह, न वो प्रसिद्धि , और न ही वो पैसा मिल पा रहा है जो कि एक आम ब्लॉगर जो किसी भी अन्य भाषा में लिख रहा है , को मिल रहा है। इसमें मौलिकता का अभाव , दूसरा ये भी कि किस प्रकार कोई विज्ञापन जो कि स्वाभाविक रूप से अंगरेजी उत्पाद का होता है को एक हिन्दी भाषी पाठक ये लेखक देखने में कितनी रूचि दिखा सकता है। हालांकि उन्होंने ये जरूर जिक्र किया कि जल्दी ही किसी न किसी माध्यम से इन सभी मुश्किलों से पार पाते हुए हिन्दी ब्लॉग जगत भी अपना एक अलग मुकाम बना लेगा।
बुधवार २८ मई को अपने रवीश कुमार जी ने दैनिक हिन्दुस्तान में एक स्तम्भ कमेंट्री में भी ब्लोग्गिंग की चर्चा की है। इसमें उन्होंने ब्लॉग पते के साथ बताया कि कि प्रकार हिन्दी ब्लॉग जगत पर हमारी महिला ब्लोग्गेर्स ने एक बगावती और बुलंद रुख अपना रखा है। नंदिनी जी के ब्लॉग की, notepad की, मनीषा जी की तथा और भी कई महिला ब्लोग्गेर्स की चर्चा बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में की गयी है। इसी दिन दैनिक त्रिबुने के दिल्ली संस्करण में भी विशेष पृष्ठ शिक्षा लोक में अपराजिता ने बताया कि ब्लोग्गिंग करने वाले वो ब्लॉगर जो विशुद्ध रूप से व्यावसायिक ब्लोग्गिंग कर रहे हैं उनमें पैसा कमाने की धुन के कारण कई तरह की मानसिक बीमारियाँ और तनाव भरी दिनचर्या का सामना कर रहे हैं।
पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि अमर उजाला के दिल्ली संस्करण में हिन्दी ब्लोग्गिंग का जिक्र नियमित रूप से रहने लगा है । जैसे कि आज उन ब्लॉग पर बात की गयी है जिन पर वे बच्चे लिख रहे हैं जो इस बार माध्यमिक या उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में बैठे थे। उस ख़बर में तो यहाँ तक बताया गया है कि किस प्रकार कई बच्चों ने तो अपने आत्महत्या के नोट तक लिख डाले हैं।
मगर इन सबके बीच मुझे एक अफ़सोस हमेशा रहता है कि ये तमाम बड़े लोग अपने आपको एक दायरे में समेटे हुए हैं, यहाँ ब्लॉगजगत पर भी और अपनी लेखनी में भी । कहीं भी नए ब्लोग्गेर्स, छोटे छोटे प्रयास करने वाले ब्लोग्गेर्स की कोई चर्चा नहीं , जिक्र तक नहीं। मैंने निश्चय किया है कि ब्लोग्जत पर जल्दी ही आने वाले अपने आलेख में मैं ज्यादा से ज्यादा ब्लोग्गेर्स से सबका परिचय करवाउंगा और कोशिश करूंगा कि उसे यहाँ भी स्कैन कर के लगा सकूं।
मेरा अगला पन्ना ;- वो आखिरी रात.
शनिवार, 24 मई 2008
रिश्ते बदल रहे हैं (एक कविता )
बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥
अब तो लाशें,
और कातिल ,
एक ही,
घर के निकल रहे हैं॥
पर्त चिकनी , हो रही है,
पाप की,
अच्छे-अच्छे,
फिसल रहे हैं॥
बंदूक और खिलोने,
एक ही,
सांचे में ढल रहे हैं॥
जायज़ रिश्तों के,
खून से सीच कर,
नाजायज़ रिश्ते,
पल रहे हैं॥
मगर फिक्र की,
बात नहीं है,
हम ज़माने के,
साथ चल रहे हैं...
बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥
शुक्रवार, 23 मई 2008
जो सक्षम हैं आगे आयें, ( सभी ब्लोग्गेर्स से विनम्र अपील )
मैं पहले भी बता चुका हूँ कि ब्लॉग लेखन में मेरी शुरुआत एक इत्तेफाक था। वो टू शुक्र है कादम्बिनी पत्रिका के एक अंक का और सभी बड़े ब्लोग्गेर्स का जिन्होंने विस्तारपूर्वक बताया हुआ था कि कैसे अपना ब्लॉग बनाया जाए । इसके बाद एक मित्र के पीछे पड़कर पहला ब्लॉग बना। धीरे-धीरे सिलसिला चलता गया और आज हिन्दी अंग्रेज़ी के आठ ब्लोग्स पर निरंतर लेखनी चल रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि ब्लॉग लेखन, उसका प्रकाशन आदि बहुत कठिन या क्लिष्ट काम है मगर इतना तो यकीनन है कि मुझ जैसे अनादियों को यदि मार्गदर्शन देने के लिए कोई मिल पाटा तो बहुत सी कठिनाइयां या ऐसी बातें जो समझ ही नहीं आयी, का हल निकल सकता था। इससे अलग टी ये कि हम भी फोट-शोट, गाने-वने, और ततू-शतू लगवाकर अपने ब्लॉग को वैसा ही खूबसूरत बना पते।
ब्लोग्गिंग करते रहने के बावजूद मुझे ये नहीं पता था कि इसमें अपनी फोटो कैसे लगा सकता हूँ, दूसरे दृश्य चित्रों का क्या कहूँ वो तो अब तक नहीं आते मुझे लगाने। ऐसा ही कुछ कुछ तिप्न्नी के साथ भी हुआ। तिप्न्नी करते करते महक जी ने एक रोज़ बताया कि मुझे वर्ड वेरीफिकेशन हटाना चाहिए, मैंने सोचा ये क्या बाला है और हटेगी कैसे। जैसे तैसे कोशिश की तो तिप्न्नी मोद्रित करें टाईप की कोई दूसरी बाला गले पड़ गयी। बस यूं समझिए कि किसी तरह इनसे पीछा छोटा । मगर सबसे बड़ा अफ़सोस कि हाय रे आज तक एक भी तिप्न्नी हिन्दी में नहीं कर पाया अजी लानत है मुझ पर, मगर क्या करूं अब तक पता ही नहीं है कि ये मैं कैसे कर सकता हूँ। हालांकि अनवरत वाले द्विवेदी जी ने भरसक प्रयत्न किया मुझे सिखाने का मगर हम जैसे नालायक तो बस समझिए कि युगों में पैदा होते हैं, खैर।
तो अंत में अपनी इस पोस्ट में जो कि इत्तेफाकन इस चिट्ठे की शतकीय पोस्ट है , में aअप तमाम जानकार , विद्वान् ब्लोग्गेर्स से आग्रह करता हूँ कि कोई बंधुगन ऐसा ब्लॉग भी बनायें जो हमारे जैसे अनाड़ियों के प्रश्नों, शंकाओं , का हल हमें बता सके। यदि पहले से ही ऐसा कोई ब्लॉग मौजूद है तो उसकी जानकारी मुझे और अन्य सभी को देने की कृपा करें। आप लोग ही बताइये क्या आप लोगों को ये अच्छा लगेगा कि आप जैसे विद्वान् लोगों के बीच हम जैसे भैन्सालोटन भी मौजूद रहे , आगे आपकी मर्जी.
ब्लोग्गिंग करते रहने के बावजूद मुझे ये नहीं पता था कि इसमें अपनी फोटो कैसे लगा सकता हूँ, दूसरे दृश्य चित्रों का क्या कहूँ वो तो अब तक नहीं आते मुझे लगाने। ऐसा ही कुछ कुछ तिप्न्नी के साथ भी हुआ। तिप्न्नी करते करते महक जी ने एक रोज़ बताया कि मुझे वर्ड वेरीफिकेशन हटाना चाहिए, मैंने सोचा ये क्या बाला है और हटेगी कैसे। जैसे तैसे कोशिश की तो तिप्न्नी मोद्रित करें टाईप की कोई दूसरी बाला गले पड़ गयी। बस यूं समझिए कि किसी तरह इनसे पीछा छोटा । मगर सबसे बड़ा अफ़सोस कि हाय रे आज तक एक भी तिप्न्नी हिन्दी में नहीं कर पाया अजी लानत है मुझ पर, मगर क्या करूं अब तक पता ही नहीं है कि ये मैं कैसे कर सकता हूँ। हालांकि अनवरत वाले द्विवेदी जी ने भरसक प्रयत्न किया मुझे सिखाने का मगर हम जैसे नालायक तो बस समझिए कि युगों में पैदा होते हैं, खैर।
तो अंत में अपनी इस पोस्ट में जो कि इत्तेफाकन इस चिट्ठे की शतकीय पोस्ट है , में aअप तमाम जानकार , विद्वान् ब्लोग्गेर्स से आग्रह करता हूँ कि कोई बंधुगन ऐसा ब्लॉग भी बनायें जो हमारे जैसे अनाड़ियों के प्रश्नों, शंकाओं , का हल हमें बता सके। यदि पहले से ही ऐसा कोई ब्लॉग मौजूद है तो उसकी जानकारी मुझे और अन्य सभी को देने की कृपा करें। आप लोग ही बताइये क्या आप लोगों को ये अच्छा लगेगा कि आप जैसे विद्वान् लोगों के बीच हम जैसे भैन्सालोटन भी मौजूद रहे , आगे आपकी मर्जी.
बुधवार, 21 मई 2008
ब्लॉगर के रूप में पहचान न बने , न सही, मगर.........
बहुत पहले किसी ने कहा था, की साहित्य असल में सिर्फ़ साहित्यकार के लिए होता है, और ठीक उसी तरह शायद ब्लॉग भी सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स के लिए होता है, सिर्फ़ उन्ही के पढने और उन्ही के लिखने के लिए। पिछले छः सात महीनों तक यहाँ ब्लॉगजगत पर समय बिताने के बावजूद ब्लॉगर के रूप में मेरी क्या कितनी पहचान बन पायी है न इस बारे में कभी सोचा है न सोचना चाहता हूँ, मगर इतना जरूर है की आज जिन ब्लोग्गेर्स का नियमित तिप्प्निकारों के रूप में मैं आभारी हूँ , मैं चाहता हूँ की एक दिन मैं ख़ुद उस कतार में शामिल हो जाऊं। अहलंकी कुछ दिनों पहले जब मुझे मौका मिला था या कहूँ की ऑफिस में कम्पूटर और थोडा समय भी मिल गया था टू मैंने उसका पूरा फायदा उठाते हुए खूब सारी टिप्पणियाँ की थी, मगर यहाँ कफे में बैठ कर वो सम्भव अनाहीं हो पा रहा है और जैसे ही मैं अपना ख़ुद का कंप्युटर ले लूंगा तो जरूर ही भाई उड़नतश्तरी,डॉक्टर अनुराग आर्य, भाई महेंद्र, मित्र द्विवेदी जी मेहेक्क जी, और भी जो नियमित टिप्पणी करने वाले हैं उनमें से एक बन पाऊँगा और ऐसा जल्दी ही होगा ये मेरा विश्वास है। तब शायद ही कोई ऐसा ब्लॉग बचेगा जहाँ में घूम कर पढ़ कर और लिख कर नहीं आऊंगा।
अपने अगले पन्ने में आप सब ब्लॉगर से कुछ ख़ास बात या निवेदन या सलाह-मशवरा करने वाला हूँ, इस बारे मं की आप सब में से जो भी जानकार लोग हैं किसी एक विशेष ब्लॉग के माध्यम से हम सभी ब्लोग्गेर्स के प्रश्नों का कठिनाएइयों का समाधान कर सकें तो बड़ा उपकार होगा।
अपने अगले पन्ने में आप सब ब्लॉगर से कुछ ख़ास बात या निवेदन या सलाह-मशवरा करने वाला हूँ, इस बारे मं की आप सब में से जो भी जानकार लोग हैं किसी एक विशेष ब्लॉग के माध्यम से हम सभी ब्लोग्गेर्स के प्रश्नों का कठिनाएइयों का समाधान कर सकें तो बड़ा उपकार होगा।
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