"मालिक थोडे से पैसे उधार दे दो , अबकी बार फ़सल अच्छी हुई तो सब चुकता कर दूंगा "भुवन गिडगिडाया ॥
"चल चल, जब देखो मुंह उठाए चला आता है कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने । तेरा पिछला ही कर्जा इतना है कि उसका सूद ही तू नहीं चुका पाएगा मूल तक की तो बात ही क्या । कितनी बार कहा तुझे कि अपनी वो बलका वाली जमीन दे दे , बेच दे उसे , तेरा सारा कर्जा उतर जाएगा । वो भी तू नहीं मानता ।"
" मालिक , वो जमीन कैसे दे दें , एक वही तो टुकडा बचा है आखिरी सहारा बच्चों को पेट भर खिलाने के लिए । अगर वो भी दे दें तो करेंगे क्या मालिक । मालिक मेरी मां बहुत बीमार है ...इलाज के लिए शहर के अस्पताल ले जाना होगा ....उसी के लिए बस बीस हजार रुपए चाहिए थे मालिक ....." भुवन कहते कहते मालिक के पांव पकड चुका था ॥
तभी उसका छोटा बेटा बबलू दौडता आता दिखा ," बापू, जल्दी चलो दादी कुछ बोलती नहीं "
भुवन झटके से उठा और घर की ओर सरपट दौड लिया । मां दम तोड चुकी थी । मां की लाश से लिपट लिपट के रो रहा था भुवन दहाडें मार मार के । सभी आस पडोस से इकट्ठे हो रहे थे घर के आंगन में । भुवन को अपनी बेबसी पर एक आत्मग्लानि सी हो रही थी जो उसका दर्द और बढा रही थी । पत्नी भी वहीं साथ ही बैठ कर भुवन के साथ रो रही थी । भुवन को ज्यादा विलाप करता देख , धीरे से उसके कान में कह उठी ," सुनो , इश्वर की यही मर्जी थी शायद , मां के जाने से तुम पर आने वाला कर्जा तो बचा । भुवन को अचानक ही एक अनचाहा संतोष सा हो गया था ॥ पहले की अपेक्षा अब उसका रोना थोडा कम था ॥
तभी मालिक भी आ पहुंचे ," देखो भुवन , अब भगवान जैसा चाहता है वैसा ही होता है ...उसकी मर्जी के आगे कहां किसी की चलती है , तुम घबराओ मत । समाज तुम्हारे साथ है , मैं तुम्हारे साथ हूं । माता जी के श्राद्ध कर्म और भोज के लिए तीस चालीस हजार की जरूरत तो पडेगी ही तुम्हें , मगर मैं हूं न , कहीं जाने की जरूरत नहीं है , सब इंतजाम हो जाएगा ॥"
मालिक को बलका वाली शानदार जमीन दिख रही थी और भुवन को शहर में भटकता हुआ अपना परिवार और वो खुद ॥
प्रचार खिडकी
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
कर्ज (एक लघु कथा )
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
सोमवार, 23 नवंबर 2009
शिक्षा का व्यावसायीकरण : डेली हिंद मिलाप (हैदराबाद ) में प्रकाशित एक आलेख ॥
शनिवार, 21 नवंबर 2009
ब्लॉग लेखन अभिव्यक्ति का नया मंच : (दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक आलेख )
चित्र को पढने के लिये उस पर चटका लगाएं ..॥
ब्लोगिंग को विषय बना कर लिखा गया मेरा ये आलेख ब्लोगिंग के शुरूआती दिनों में लिखा गया था , और लगभग २८ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था , समय की कमी के कारण ," ब्लोग बातें " नामका एक नियमित कालम शुरू नहीं कर पा रहा हूं मगर जल्दी ही कर पाऊंगा इसकी उम्मीद है ॥
शनिवार, 7 नवंबर 2009
क्यों खो रहा है बचपन ( दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित एक आलेख )
चित्र को बडा करने के लिये उस पर एक चटका लगाएं ।
बच्चों के हालातों पर , लिखा गया एक सामयिक आलेख जिसे दैनिक पंजाब केसरी, दिल्ली संस्करण में स्थान मिला ।ये उन दिनों की बात है जब मैं अजय (रमाकांत) ( मेरे पिताजी का नाम ) के उपनाम से लिखा करता था
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
खामोश ! हम वसूली पर हैं (दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )
दिल्ली पुलिस के असाधारण और इतने कर्मठता से ड्यूटी करने की प्रेरणा से प्रेरित होकर ..एक श्रद्धांजलि टाईप की पोस्ट ..उनके लिये....॥
(चित्र को बडा करने के लिये उस पर चटका लगाएं )
रविवार, 1 नवंबर 2009
तुम्हारी हसरतों का फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां..
भीड के साथ होता हूं
पर भीड साथ नहीं देती,
अक्सर
मेरा साथ देती हैं मेरी तन्हाईयां ॥
बेशक न कहो होठो से,
और पलकों से इशारे न करो,
तुम्हारी हसरतों का
फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥
सबके मुकदमे
सालों साल नहीं चला करते,
हाकिम हुक्कामो की
होती हैं चंद सुनवाईयां ॥
कई करते हैं कत्ल पे कत्ल तो
कहीं जिक्र भी नहीं होता,
कई खुद का कत्ल कर लेते हैं
तो भी होती हैं रुस्वाईयां ॥
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)