जाने कबसे अपने आसपास,
एक छद्म संसार बना रखा है ॥
हरकतों से पकडे जाते हैं, हैवानों ने भी,
इंसान का नकाब लगा रखा है ॥
कोई बेच रहा धर्म तो कोई शर्म और ईमान,
कईयों ने तो जीवन को ही दुकान बना रखा है ॥
बेदिली की ये इंतहा है यारों , माओं ने ,
कोख को बेटियों का शमशान बना रखा है ॥
कितनी बेकसी का दौर है ये , न दिल में जगह है, न घर में,
लोगों ने मां-बाप को भी मेहमान बना रखा है ॥
लपटें सी उठ रही हैं, शहर के हर घर से ,
इसीलिए,गांव में भी इक मकान बना रखा है ॥
अभी तो उंगलियों ने रफ़्तार नहीं पकडी है ,घरवालों की तोहमत
हमने चिट्ठों को ही अपनी संतान बना रखा है ॥
नए साल पर एक रिठेल ही हो जाए तो कोई बुराई तो नहीं , यही सोच कर टोकरी में पडा बासी माल फ़िर से परोस दिया है ..................जाने आपको इसका स्वाद कैसा लगता है ..????????????

