प्रचार खिडकी

सोमवार, 20 सितंबर 2010

हिंदी दिवस पर लिखा गया और हरिभूमि में मेरा एक प्रकाशित लेख, दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य



दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित एक आलेख






दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य


दोनों ही कतरनों को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें, छवि बडी होकर अलग खिडकी में खुल जाएगी और आप सुविधानुसार उसे पढ सकते हैं ॥

रविवार, 19 सितंबर 2010

बुजुर्ग : अनुभवी ,अनमोल, मगर उपेक्षित : दैनिक सच कहूं सिरसा में प्रकाशित मेरा एक आलेख


आलेख को पढने के लिए उसे चटकाने पर जो पृष्ठ खुले , उसे चटका कर आराम से पढा जा सकता है .........

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

ओह ! वो श्वेत श्याम फ़ोटो का जमाना ...



यूं तो अपने उस पिछले जमाने की बात ही कुछ और थी .....बेशक आज का जमाना भी आगे शायद इसी तरह याद किया जाए ...हालांकि जितनी तेज ये दुनिया भाग रही है उसमें मुझे शक है कि ....आने वाली दुनिया के पास इतना वक्त भी होगा कि नहीं .....मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि ...वो जो जमाना था न रेट्रो वाला ...........आहाहा .......सोच सोच के ही मन आनंदित हो जाता है ...उस जमाने के हर बात में ...एक बात थी ..चलिए छोडिए ...।


आज अचानक अपनी कुछ श्वेत श्याम फ़ोटुएं हाथ लग गईं ...तो ध्यान आया कि ..क्या क्रेज़ हुआ करता था फ़ोटुओं का ..। उस समय फ़ोटुओं से जुडी भी एक अलग ही दुनिया होती थी ...और कुछ भयंकर युनिवर्सल टाईप की प्रथाएं थीं .....जैसे कि विवाह के पश्चात ..स्टूडियो जाकर ..सपत्नीक एक फ़ोटो खिंचवाना ....और हां उसकी तीन कॉपी होना जरूरी था .....एक लडके के घरवालों के लिए , एक लडकी के घर के लिए ....और एक जोडे के लिए भी ....। पासपोर्ट साईज़ की फ़ोटो भी बडे चाव से खींची खिंचाई जाती थी ...। और आजकल का डिजिटल जमाना नहीं कि जब मन किया बार बार क्लिक करके खींचते रहे ..सजा संवार के ........जब तक कि थोबडा ..एकदम हीरो हीरोईन सा न दिखे ..। तब तो एक क्लिक और हो गया ....या तो बोलो राम ....या फ़िर पक्का राम राम ।



उन्हीं दिनों की एक फ़ोटो आपके लिए यहां चेपे जा रहा हूं .....देखिए और बताइए कि मैं इसमें कहां हूं ?????




रविवार, 12 सितंबर 2010

ऑपरेशन वसूली ( पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य )






व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगाने से
जो छवि खुलेगी उसे आप चटका कर आराम से पढ सकते हैं

शनिवार, 11 सितंबर 2010

दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक फ़ीचर

चित्र पर क्लिक करने पर उसे चटका के बडा करके आप उसे पढ सकते हैं । ये शायद २००७ में प्रकाशित हुआ था

शनिवार, 21 अगस्त 2010

हर वक्त ! इश्कियाने को जी चाहता है......अजय कुमार झा

है मौसम का सुरूर ,या
कि तेरी नज़रों का कसूर,
हर वक्त,
इश्कियाने को जी चाहता है .............

या मैं हो जाऊं फ़ना तुझमें ,
या तू ही कुर्बान हो जा,
कयामत तक इसे ही,
आजमाने को जी चाहता है .........

नहीं मुझे परवाह,
अब दुनिया ए दौर की,
तेरी नज़रों से,
खुद को सजाने को जी चाहता है........

मुझे फ़िक्र है दस्तूरों ,
और, बंदिशों की, मगर ,
करूं क्या कि जी ,
बस यही ,और यही चाहता है ........

मैंने कब कहा कि ,
ये कुफ़्र नहीं है , होगा शायद,
ये तो दिल ही जाने ,
कब गलत, कब सही चाहता है ........

इस कमबख्त दिल की,
फ़ितरत ही कुछ ऐसी है,
जो मिलना हो मुश्किल
अक्सर , ये वही चाहता है ........

तैयार है हर दिल यहां ,
कोई उडने को आसमान,
तो कोई भाग चलने को,
इक ज़मीं चाहता है ..............

हा हा हा ...........ये दिल बेइमान ....ये दिल बेलगाम...........ये दिल .......छोडो यार .........हा हा हा ..


रविवार, 1 अगस्त 2010

अपने ही घर में मुझे सब , मेहमान बना देते हैं............अजय कुमार झा


बस्तियां खाली करवाने को ,
वो अक्सर उनमें ,
आग लगा देते हैं ॥

उतनी तो दुश्मनी नहीं कि ,
कत्ल कर दें मेरा , इसलिए ,
रोज़ , ज़हर ,बस ,
ज़रा ज़रा देते हैं ॥

मैंने कब कहा कि , गुनाह को ,
उकसाया उन्होंने , वे तो बस ,
मेरे पापों को , थोडी सी,
हवा देते हैं ॥

वो जब करते हैं गुजारिश ,
अपने घर आने का,
हर बार जाने क्यों ,
इक नया पता देते हैं ॥

मैं ठान लेता हूं , कई बार ,
अबकि नहीं मानूंगा ,
नई अदा से वो , मुझको,
हर बार लुभा लेते हैं ॥

जख्मों से अब दर्द नहीं होता ,
कोई टीस भी नहीं ,
पर जाने क्यों जखमों के,
निशान रुला देते हैं ॥

जब भी जाता हूं गांव अपने ,
ऐसी होती है , खातिर मेरी ,
अपने ही घर में मुझे सब ,
मेहमान बना देते हैं ॥

सिलसिला टूटता नहीं ,उनपर ,
मेरे विश्वास का , पुरानी को छोड,
रोज़ एक नई ,
कहानी सुना देते हैं ॥
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...