
काश अबकि ,फ़िर वही
मनाऊं दीवाली ,
जो कभी मनाते थे हम
दशहरे के बाद से ही
जाने कितनी बार ,
किताब में से
आई दीवाली रे कविता ,को
जोर जोर से पढ जाते थे हम
वो दस दिन पहले से ही
घर के कोने
कोने की सफ़ाई ,
और कैसे मां का हाथ बटाते थे हम ,
फ़िर कुछ इधर उधर
खिसका के टेबल पलंग ,
दीवाली में घर का नया लुक लाते थे हम ,
रंगीन कागज पन्नी
से भी क्या खूब घर को सजाते थे हम ,
और मुझे याद है अब तलक हाय ,
सिर्फ़ दस पैसे में ही,
क्या खूब लंबी
पटाखा लडी लाते थे हम ,
दीवाली के दिन की वो चहल पहल ,
रसोई की खुशबू से
पूरा दिन मदमाते थे हम ,
कहां लेते थे
हर बार नए कपडे भी ,
बहुत बार पुराने में ही
दीवाली मनाते थे हम ,
और फ़िर वो शाम दीवाली की ,
छतो,छत्तियों और
परछत्तियों पर दीप जलाते थे हम ,
सबसे बाद तक
फ़ोडेंगे पटाखे , इसलिए ,
कितने ही जतन से
पटाखों को छुपाते थे हम ...
और फ़िर दीवाली की वो रात तक ही
कहां खत्म होती थी दीवाली भी ,
अगली सुबह अधफ़ूटे बचे
पटाखों भी तो ढूंढ लाते थे हम ...
काश कि फ़िर वो दीवाली मना पाऊं कभी .........काश कि ये मुमकिन हो कभी ....काश काश काश !!!!
दीवाली की बहुत बहुत मुबारकबाद दोस्तों , इस दीपों के पर्व पर हर दीप से निकला उजाला सबके तन मन आंगन , वन उपवन ,नंदन कानन, जीवन, सब प्रकाशमय और ओजपूर्ण हो जाए ..दीवाली की मुबारकबाद कायनात के हर कतरे को और हर कतरे की तरफ़ से सबको दीवाली की मुबारकबाद..........