प्रचार खिडकी
सोमवार, 17 जुलाई 2017
रविवार, 2 जुलाई 2017
घर मेरे भी ,बिटिया किलकने लगी है
अब नर्म धूप,
मेरे आँगन भी,
उतरने लगी है।
टिमटिमाते तारों की रौशनी,
और चाँद की ठंडक,
छत पर,
छिटकने लगी है।
पुरबिया पवनें,
खींच लाई हैं,
जो बदली , वो,
घुमड़ने लगी है।
दर्पर्ण मांज रहा है,
ख़ुद को,
आलमारी भी,
सँवरने लगी है ।
फूलों के खिलने में,
समय है,
कलियों पर ही,
तितलियाँ,
थिरकने लगी हैं।
शायद ख़बर,
हो गयी सबको,
घर मेरे भी, बिटिया,
किलकने लगी है.......
गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016
बहुत खराब लिखने बैठा हूँ मैं
बारूद की स्याही से , नया इंकलाब लिखने बैठा हूं मैं ,
सियासतदानों , तुम्हारा ही तो हिसाब लिखने बैठा हूं मैंबहुत लिख लिया , शब्दों को सुंदर बना बना के ,
कसम से तुम्हारे लिए तो बहुत , खराब लिखने बैठा हूं मैंटलता ही रहा है अब तक , आमना सामना हमारा ,
लेके सवालों की तुम्हारी सूची, जवाब लिखने बैठा हूं मैंसपने देखूं , फ़िर साकार करूं उसे , इतनी फ़ुर्सत कहां ,
खुली आंखों से ही इक , ख्वाब लिखने बैठा हूं मैं ......मुझे पता था कि बेईमानी कर ही बैठूंगा मैं ,अकेले में,
सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ...
जबसे सुना है कि उन्हें फ़ूलों से मुहब्बत है ,
खत के कोने पे रख के ,गुलाब , लिखने बैठा हूं मैं........
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
औरत : एक अंतहीन संघर्ष यात्रा
शनिवार, 24 सितंबर 2016
सुनो लड़कियों ,तुम यूं न मरा करो ..
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
हत्या कर दो ,
या अंग भंग ,
फुफकार उठो ,
डसो ज़हर से,
बन करैत,
बेझिझक ,
बेधड़क ,
प्रतिवाद ,
प्रतिकार ,
प्रतिघात , करा करो
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
तुम मर जाती हो ,
फिर मर जाती हो ,
मरती ही जाती हो ,
मरती ही रहती हो ,
कभी गर्भ में ,
कभी गर्त में ,
कभी नर्क में ,
दुनिया के दावानल में
तुम यूं न जरा करो ,
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
मोमबतियां जलाएंगे ,
वे सब ,
खूब जोर से ,
चीखेंगे चिल्लायेंगे ,
मगर ,
खबरदार , जो
भरम पाल बैठो ,
बीच हमारे ही ,
से कोइ हैवान ,
फिर से ,
फिर फिर ,
वही कर उठेगा ,
वो नहीं आयेंगे ,
मरते मरते तो कह दो उनसे ,
तुम यूं न गिरा करो ,
सुनो !
आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,
करुणा ,
सुनो लड़कियों
तुम यूं न मरा करो ,
शनिवार, 3 अक्टूबर 2015
जीभ और दांत
एक संत थे | उनके कई शिष्य थे | जब उन्हें महसूस हुआ कि उनका अंतिम समय आ गया है तो उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया |
जब सभी शिष्य आ गए तो उन्होंने कहा ," ज़रा मेरे मुंह के अन्दर ध्यान से देखकर बताओ कि अब कितने दांत शेष बचे रहे गए हैं |"
बारी बारी से सभी शिष्यों ने संत का मुंह देखा और एक साथ बोले," गुरूजी आपके सभी दांत टूट गए हैं | एक भी बचा हुआ नहीं है | "
संत ने कहा ,"ज़रा ध्यान से देखो कि जीभ भी है या नहीं "
यह सुनकर शिष्यों को हंसी आ गयी | वे सोचने लगे कि आज गुरू जी मजाक क्यों कर रहे हैं |
एक शिष्य बोला ,"गुरु जी जीभ तो जन्म से मृत्यु तक साथ रहती है वह भला कहाँ जायेगी "
संत हंस कर बोले ,"यह तो अजीब बात है कि जीभ जन्म से मृत्यु तक साथ रहती है और दांत बाद में आते हैं मगर पहले ही साथ छोड़ देते हैं | जबकि बाद में आने वालों को बाद में जाना चाहिए | क्या तुम लोगों में से कोइ बता सकता है कि ऐसा क्यों होता है कि दांत बाद में आते हैं और पहले चले जाते हैं "
एक शीश बोला," गुरु जी यह प्रकृति का नियम है कि दांत टूट जाते हैं और जीभ नहीं टूटती "
संत बोले यही बात समझाने के लिए मैंने तुम लोगों को यहाँ बुलाया है | यह प्रकृति का नियम नहीं है | जीभ इसलिए नहीं टूटती क्योंकि वह लचीली है वह नरम है उसमे सहन करने की शक्ति होती है उसमे कठोरता बिलकुल नहीं होती |जबकि दांत बहुत कठोर होते हैं उन्हें अपनी कठोरता पर अभिमान होता है | लेकिन उनकी कठोरता ही उनकी समाप्ति का कारण बनती है | जीभ और दाँतों की कोइ तुलना नहीं हो सकती लेकिन यदि तुम्हे समाज के कठोर नियमो का सामना करना है तो तुम लोग जीभ बनो दांत नहीं | अपने को हमेशा लचीला बनाए रखो समाज में नम्रता से व्यवहार करो |यदि ऐसा नहीं करोगे तो दाँतों की तरह तुम भी जल्दी टूट जाओगे और समाज तुम्हें तिरस्कृत कर देगा | "
सोमवार, 28 सितंबर 2015
हर औरंगजेब को अब मिटा देंगे
आज गाने दे मुझको , गीत मातृवंदना के ,
मुहब्बत के नगमे, फिर कभी तुझको सुना देंगे ||
उठ बढ़ा कदम अपनी हिम्मत और विशवास से
"वो" रुदाली हैं जो , रो रो के तुझको डरा देंगे ||
उन्हें भरोसा है अपनी काबलियत पर इतना कि ,
मरने देंगे पहले , जी उठने की फिर वो दवा देंगे ||
आग लगाने की उनको आदत नहीं है मगर ,
लेस चिंगारी लबों से, धीरे धीरे उसको हवा देंगे ||
बड़ी मुद्दतों बाद उतारा है बोझ कन्धों से ,
उन्हें अब भी यकीन है ,दौर डोरेमोन का वो फिर चला देंगे ||
मनाने दो मातम , बेताजी का उनको ,
जो रूठे कभी तो , विदेशों में छुट्टी बिता लेंगे ||
गया छुपने छुपाने का वो मौसम कहीं ,
अब तो सुभाष-शास्त्री की फाईलें भी दिखा देंगे ||
उन्हें गुमां हो चला जब मिली जीत का ,
लडे आप ही अपनों में जो , वो गैरों से क्या वफ़ा देंगे ||
सुन पड़ोसी बेगैरत , तू मान भी जा ,
तिनके सी हैसियत तेरी , बाँध पतंगों में किसी दिन उड़ा देंगे ||
जयघोष ये उठा है , चहुँओर से अब ,
तुम रोओ गाओ , हर शोर को अब दबा देंगे ||
निशानियाँ गुलामी की बहुत हैं संभाली हमने ,
नाम लिख कलाम का , हर औरंगजेब को मिटा देंगे ||
मर्ज़ भांपा है ,साठ सालों तक जिन्होंने ,
तैयार रहना , ठीक करने को , वे कडवी दवा देंगे ||
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