मैं चाहता हूँ,
कि कोई मुझसे,
मोहब्बत करके ,मुझे,
ठोकर मार दे,
मैं टूट कर ,
बिखर जाऊं,
यार, सुना है कि,
दीवाने ,
अच्छा लिखते हैं॥
मैं सोचता हूँ,
कि, क्यों न,
एक बार , मैं भी,
मर कर देखूं,
यार , सुना है कि ,
मरने के बाद,
हर इंसान को,
अच्छा कहते हैं॥
मैं चाहता हूँ,
कि लिखूं,
खूब अंट-शंट ,
सनसनाता साहित्य,
यार सुना है कि,
नाम- दाम भी,
मिलता है, और यूं,
लोग खूब छपते हैं॥
काश कि मिलता,
कोई गुनी चिकित्सक,
तो उससे इलाज ,
करवाता क़ानून का,
यार सुना है कि,
इसके हाथ बड़े-लंबे,
मगर आँख-कान,
काम नहीं करते हैं...
पता नहीं, मैं भी क्या-क्या सुनता रहता हूँ।
अगला पन्ना ,:- लो जी , स्यापा पै गया (व्यंग्य )
प्रचार खिडकी
सोमवार, 17 मार्च 2008
रविवार, 16 मार्च 2008
टिपियाने का (अजी टिप्प्न्नी करने का ) अपना मज़ा है
पिछले कुछ दिनों से देख और पढ़ रहा हूँ की इधर कुछ लोगों ने टिप्प्न्नी करने को लेकर काफी कुछ लिखा है, हालांकि इससे पहले मैं भी इस विषय पर एक आध बार लिख चुका हूँ , परन्तु आज टिप्प्न्नी करने के अनुभव और उसमें मिलने वाले आनंद पर कुछ बातें आपसे बाटनें का मन कर रहा है। दरअसल इस ब्लॉगजगत में हमारी घुसुउआत ( अजी शुरू शुरू में कहीं अन्यास ही घुस जाने को ही घुसुआत कहते हैं ) बिल्कुल अप्रत्याशित और एक अनादी की तरह हुई थी, इससे पहले सिर्फ़ पत्नी के शब्दों में कहूं तो कागज़ काले करते रहते थे, फ़िर अचानक इस ब्लॉगजगत की अनोखी दुनिया का पता चला , एक मित्र की मदद से जी मेल बनी और फ़िर ब्लॉग भी।
शुरूआत में बस पोस्ट लिख कर चले आते थे , हालांकि कभी कभार दूसरों की पोस्ट भी पढ़ते थे मगर टिप्प्न्नी करने की गुस्ताखी कभी नहीं करते थे, धीरे धीरे हमें लगने लगा की यार ये खामखा ही पोस्ट बॉक्स नम्बर ले लिए कम्भाक्त डाक में एक पोस्ट कार्ड भी नहीं होता। जी हाँ हमारी सभी पोस्टें कोरी कवान्री रहती कहीं कोई तिप्न्नी नहीं रहती ऐसा लगता की हमने भी अपने आँगन में कोई अछूत कन्या पाल ली है। फ़िर ये निराशा थोड़ी नाराजगी में बदलने लगी , मैंने कहा कमाल है यार क्या मैं इतना बुरा लिखता हूँ की कोई पढता ही नहीं और यदि पढता है तो कुछ कहता ही नहीं है। मगर थोडा और सोचा तो अन्दर से आवाज़ आई की भैया आप पहले ये बताओ की क्या टिप्प्न्नी करने का ठेका दूसरे लोगों ने ही ले रखा है आप के हाथों में क्या मेहेंदी लगी है, या अपने आपको बिपासा बासु और आमिर खान समझते हो की सब यूं ही टिप्प्न्नी करते रहेंगे। बस हमने तय कर लिया की जितना समय हम लिखने पर देंगे उतना ही समय टिप्प्न्नी करने पर भी देंगे। इसमें हमें सबसे ज्यादा प्रभावित की महाराज अन्त्रिख्स के प्राणी, अपने उड़नतश्तरी , जी ने, अजी शायद ही कोई ब्लॉगर होगा जिसकी धरती पर ये उड़नतश्तरी ना उतारी हो। खैर , हमारा ये प्रयास बिल्कुल रंग लाया।
मुझे टिप्प्न्नी करने के अनेक लाभ हुए , पहला तो यही हुआ की चाहे उत्सुकतावश ही सही उन लोगों ने मेरा ब्लॉग भी पढ़ कर देखा जिनके ब्लॉग पढ़ कर मैंने टिप्प्न्नी की थी। दूसरी बात ये हुई की जल्दी ही एक दायरा सा बन गया और नित ल्नाये लोग या कहूँ की दोस्त उस दायरे के भीतर आने लगे, मुझे प्रशंशा , आलोचना, सुझाव और शिकायत भी मिलने लगी। ये क्रम अब भी जारी है और अब तो और भी बढेगा।
टिप्प्न्नी के सम्बन्ध में एक और बात , यूं तो टिप्प्न्नी कैसी भी हो , कुछ भी aछी लगती ही है , मगर कोशिश ये करनी चाहिए की टिप्प्न्नी भी मजेदार हो ऐसी की पढने वाला भी सोचे यार ये कौन है बन्दा , सिर खा रहा है , देखें इसका भी प्रोफाईल। और हाँ कई बार ऐसा होता है की हम जिस पोस्ट के लिए सोचते हैं की इसपर टिप्प्न्नी आयेगी खूब सारी आयेगी , उसपर बस एक अंडा बना रह जाता है , तो कोई बातअत नहीं ऐसा भी होता है यार। और हाँ ये वर्ड वेरीफिकेशन या फ़िर सिर्फ़ ब्लॉगर वाले ही टिप्प्न्नी कर सकते हैं, या फ़िर ये की किसी पुरानी पोस्ट पर कोई टिप्प्न्नी आए , तो इन सबके लिए हमारे aggregatars को कुछ न कुछ तो करना ही चाहिए , अन्यथा मुझे जैसे भैंसा लोटन ब्लॉगर को क्या दिक्कत आती है वो तो मुझ जैसा ही कोई जानता होगा.
शुरूआत में बस पोस्ट लिख कर चले आते थे , हालांकि कभी कभार दूसरों की पोस्ट भी पढ़ते थे मगर टिप्प्न्नी करने की गुस्ताखी कभी नहीं करते थे, धीरे धीरे हमें लगने लगा की यार ये खामखा ही पोस्ट बॉक्स नम्बर ले लिए कम्भाक्त डाक में एक पोस्ट कार्ड भी नहीं होता। जी हाँ हमारी सभी पोस्टें कोरी कवान्री रहती कहीं कोई तिप्न्नी नहीं रहती ऐसा लगता की हमने भी अपने आँगन में कोई अछूत कन्या पाल ली है। फ़िर ये निराशा थोड़ी नाराजगी में बदलने लगी , मैंने कहा कमाल है यार क्या मैं इतना बुरा लिखता हूँ की कोई पढता ही नहीं और यदि पढता है तो कुछ कहता ही नहीं है। मगर थोडा और सोचा तो अन्दर से आवाज़ आई की भैया आप पहले ये बताओ की क्या टिप्प्न्नी करने का ठेका दूसरे लोगों ने ही ले रखा है आप के हाथों में क्या मेहेंदी लगी है, या अपने आपको बिपासा बासु और आमिर खान समझते हो की सब यूं ही टिप्प्न्नी करते रहेंगे। बस हमने तय कर लिया की जितना समय हम लिखने पर देंगे उतना ही समय टिप्प्न्नी करने पर भी देंगे। इसमें हमें सबसे ज्यादा प्रभावित की महाराज अन्त्रिख्स के प्राणी, अपने उड़नतश्तरी , जी ने, अजी शायद ही कोई ब्लॉगर होगा जिसकी धरती पर ये उड़नतश्तरी ना उतारी हो। खैर , हमारा ये प्रयास बिल्कुल रंग लाया।
मुझे टिप्प्न्नी करने के अनेक लाभ हुए , पहला तो यही हुआ की चाहे उत्सुकतावश ही सही उन लोगों ने मेरा ब्लॉग भी पढ़ कर देखा जिनके ब्लॉग पढ़ कर मैंने टिप्प्न्नी की थी। दूसरी बात ये हुई की जल्दी ही एक दायरा सा बन गया और नित ल्नाये लोग या कहूँ की दोस्त उस दायरे के भीतर आने लगे, मुझे प्रशंशा , आलोचना, सुझाव और शिकायत भी मिलने लगी। ये क्रम अब भी जारी है और अब तो और भी बढेगा।
टिप्प्न्नी के सम्बन्ध में एक और बात , यूं तो टिप्प्न्नी कैसी भी हो , कुछ भी aछी लगती ही है , मगर कोशिश ये करनी चाहिए की टिप्प्न्नी भी मजेदार हो ऐसी की पढने वाला भी सोचे यार ये कौन है बन्दा , सिर खा रहा है , देखें इसका भी प्रोफाईल। और हाँ कई बार ऐसा होता है की हम जिस पोस्ट के लिए सोचते हैं की इसपर टिप्प्न्नी आयेगी खूब सारी आयेगी , उसपर बस एक अंडा बना रह जाता है , तो कोई बातअत नहीं ऐसा भी होता है यार। और हाँ ये वर्ड वेरीफिकेशन या फ़िर सिर्फ़ ब्लॉगर वाले ही टिप्प्न्नी कर सकते हैं, या फ़िर ये की किसी पुरानी पोस्ट पर कोई टिप्प्न्नी आए , तो इन सबके लिए हमारे aggregatars को कुछ न कुछ तो करना ही चाहिए , अन्यथा मुझे जैसे भैंसा लोटन ब्लॉगर को क्या दिक्कत आती है वो तो मुझ जैसा ही कोई जानता होगा.
शनिवार, 15 मार्च 2008
झूठ कहता है ये आईना (एक कविता या पता नहीं क्या )
मुझे शिकायत,
रहती है,
अपने,
आईने से,
जो मेरे ।
आसपास,
रहते हैं,
वो सच,
कहते हैं, कि,
मैं कितना ,
अच्छा और,
सच्चा हूँ,
मगर ये,
आईना जो,
मेरे सामने,
रहकर भी,
झूठ पर झूठ,
कहता है, कि,
मैं जो दिखता हूँ,
वो नहीं हूँ...
ये आईना मुझसे अक्सर झूठ क्यों कहता है , क्या आपको पता है ?
मेरा अगला पन्ना :- टिपयाने का (अरे त्तिप्प्न्नी करने का यार,) अपना ही मज़ा है .
रहती है,
अपने,
आईने से,
जो मेरे ।
आसपास,
रहते हैं,
वो सच,
कहते हैं, कि,
मैं कितना ,
अच्छा और,
सच्चा हूँ,
मगर ये,
आईना जो,
मेरे सामने,
रहकर भी,
झूठ पर झूठ,
कहता है, कि,
मैं जो दिखता हूँ,
वो नहीं हूँ...
ये आईना मुझसे अक्सर झूठ क्यों कहता है , क्या आपको पता है ?
मेरा अगला पन्ना :- टिपयाने का (अरे त्तिप्प्न्नी करने का यार,) अपना ही मज़ा है .
शुक्रवार, 14 मार्च 2008
लादेन की मिस कॉल (व्यंग्य )
कल अचानक लादेन की मिस कॉल आ गयी। हाँ तो, आपको क्या लगता है की वो ससुरा अपना कॉल लगा कर मुझसे बात करेगा। नहीं जी, कहता है की मिस कॉल में कॉल ट्रेस करने का लफडा ज़रा कम रहता है। मैंने कहा की यार तू तो इतनी छोटी कॉल करता है की कई बार तो मैं भी ट्रेस नहीं कर पाटा, खैर। पलट कर मैंने भी फोन किया मगर अपने मोबाईल से थोड़ी , लोकल बूथ वाले सिक्के वाली कॉल से।
क्यों भाई लादेन , आज कैसे याद कर लिए, कहाँ हो, आज्ल्कल दिख्बे नहीं करते हो, ना टेप , न विडो न कोई बयान कोई धमकी भी नहीं का बात है सब ठीक है न , कहीं होली के मौसम में तबियात न न ख़राब कर बैठे हो।?
अरे का बतायें , हम त अपने टेंसन में हमको तो ई अमरीकवा वाला सब भी भूल-बिसर गया है। ससुरा सब लागल है अपना राष्ट्रपती के चुनाव में आ वाहून तालिबान , लादेन का कौनो चर्चा नहीं मुद्दा नहीं। ई एफ बी आई वाला सब भी हफ्ता में एक बार झूठ मूठ हमरे ख़बर हमरा पता के बारे में बोळ bओल कर हमको फैमस कर रहा था अब एक्दुमे चुप है।
लेकिन सुने थे की तुम तो पाकिस्तान में कहीं पर भाडा का घर में रह रहे हो ।
अरे छोड़ यार ई पाकिस्तान वाला बात, बता बेनजीर वाला इतना बडका काण्ड हुआ आ ऊ मुश्रफ्फ्वा कम से कम झूठ मूठ में ही सही हमरा नाम ले देता, पता नहीं कौन लल्लू पंजू गैंग का नाम ले लिया, अब त अपने लफडा में फंसा हुआ है, कह रहा था भैया हमरा यहाँ से रिटायर होने का टाईम आ रहा है , आका चेला बन जायेंगे।
लेकिन तुम्हरा भी तो गलती है तुम आज कल अपना टेप आ एल्बम वाला प्रोग्राम भी त नहीं pएश कर रहे हो।
यार ई में तो तुम लोग का टी वी वाला सब का बदमाशी है यार , एकदम धोखा धदी वाला बात है, अब कहता है की छोडो दादा , अब त तुम्हरा टेप से बढियां राखी सावंत का छोटा सा साक्षात्कार से हम लोग का टी आर पी बढ़ जाता है. अब त तुम्ही बताओ की का काम करें की कुछ त फैमस हो जाएँ पहले की तरह.
देखो भैया अब इतना कह रहो हो तो हमारी मनो तो तुम भी ब्लोग्गिंग शुरू कर दो , यार कम से कम हम लोग के बीच त फैमस हो ही जाओगे. और यदि तुमने अपनी बेगमों और बच्चों को pअसंद की घंटी बजाने के लिए कह दिया तो यकीन मानो यहाँ सब ब्लॉगर पिछड़ जायेंगे, सब का घंटी बज जायेगा, कहो का कहते हो.
अच्छा यार अगला बार मिस कॉल करेंगे त फ़िर बताना की ई सब कैसे होगा ?
क्यों भाई लादेन , आज कैसे याद कर लिए, कहाँ हो, आज्ल्कल दिख्बे नहीं करते हो, ना टेप , न विडो न कोई बयान कोई धमकी भी नहीं का बात है सब ठीक है न , कहीं होली के मौसम में तबियात न न ख़राब कर बैठे हो।?
अरे का बतायें , हम त अपने टेंसन में हमको तो ई अमरीकवा वाला सब भी भूल-बिसर गया है। ससुरा सब लागल है अपना राष्ट्रपती के चुनाव में आ वाहून तालिबान , लादेन का कौनो चर्चा नहीं मुद्दा नहीं। ई एफ बी आई वाला सब भी हफ्ता में एक बार झूठ मूठ हमरे ख़बर हमरा पता के बारे में बोळ bओल कर हमको फैमस कर रहा था अब एक्दुमे चुप है।
लेकिन सुने थे की तुम तो पाकिस्तान में कहीं पर भाडा का घर में रह रहे हो ।
अरे छोड़ यार ई पाकिस्तान वाला बात, बता बेनजीर वाला इतना बडका काण्ड हुआ आ ऊ मुश्रफ्फ्वा कम से कम झूठ मूठ में ही सही हमरा नाम ले देता, पता नहीं कौन लल्लू पंजू गैंग का नाम ले लिया, अब त अपने लफडा में फंसा हुआ है, कह रहा था भैया हमरा यहाँ से रिटायर होने का टाईम आ रहा है , आका चेला बन जायेंगे।
लेकिन तुम्हरा भी तो गलती है तुम आज कल अपना टेप आ एल्बम वाला प्रोग्राम भी त नहीं pएश कर रहे हो।
यार ई में तो तुम लोग का टी वी वाला सब का बदमाशी है यार , एकदम धोखा धदी वाला बात है, अब कहता है की छोडो दादा , अब त तुम्हरा टेप से बढियां राखी सावंत का छोटा सा साक्षात्कार से हम लोग का टी आर पी बढ़ जाता है. अब त तुम्ही बताओ की का काम करें की कुछ त फैमस हो जाएँ पहले की तरह.
देखो भैया अब इतना कह रहो हो तो हमारी मनो तो तुम भी ब्लोग्गिंग शुरू कर दो , यार कम से कम हम लोग के बीच त फैमस हो ही जाओगे. और यदि तुमने अपनी बेगमों और बच्चों को pअसंद की घंटी बजाने के लिए कह दिया तो यकीन मानो यहाँ सब ब्लॉगर पिछड़ जायेंगे, सब का घंटी बज जायेगा, कहो का कहते हो.
अच्छा यार अगला बार मिस कॉल करेंगे त फ़िर बताना की ई सब कैसे होगा ?
गुरुवार, 13 मार्च 2008
हम लोग गंदगी पसंद लोग हैं या कहूँ की सूअर हैं.
कल किसी मित्र को छोड़ने के लिए स्टेशन जाना पडा, यूं तो स्टेशन की भीड़ भाड़ में सिर्फ़ एक ही बात दिमाग में घूमती रहती है वो ये की किस तरह आप ख़ुद या की जिसके लिए आप वहाँ गए है वो सुरक्षित अपनी गाडी में बैठ जाएँ, किंतु चूँकि गाडी के प्लत्फोर्म पर आने में अभी वक्त था तो अनायास ही नज़र इधर उधर दौड़ने लगी, देखा तो चारों तरफ़ भांति भांति के कुदे और कचरे का अम्बार लगा था तिस पर लोगों ने अपने गुटखे पान के पीक की आधुनिक या पुरातन जो भी आप समझें चित्रकारी कर रखी थी । मेरा ध्यान इसलिए भी आज ज्यादा उस और जा रहा था क्योंकि कुछ देर पहले ही मैं समाचारों में देख पढ़ कर आ रहा था की दिल्ली सरकार ने आज ही ये फैसला लिया था की आने वाले कुछ महीनों में सड़कों पर या कहूँ की खुली जगह पर गंदगी फैलाने वालों पर , थूकने वालों पर , या मल मूत्र करने वालों को वहीं पकड़ कर जुर्माना और दण्डित किया जायेगा। मैं सोचने लगा की क्या ये पहली बार होगा, और क्या इससे कोई फर्क पडेगा, मुझे तो कम से कम ऐसा नहीं लगा। थोड़ी देर बाद पानी भरने के लिए मैं नलके के पास गया वहाँ एक सज्जन मेरे सामने ही उस नलके से पानी ले ले कर मुंह हाथ धोने के अलावा चेहरे और नाक कान गले की सारी सफाई करने लगे, मुझसे रहा नहीं गया और सिर्फ़ मेरे नाराज़ नज़रों को भांप कर फट से उन्होंने कहा, " भइया हिन्दुस्तान में पैदा हुए हो तो gअन्दगी में रहने की aआदत डाल लो " मैं हक्का बका ये सोच रहा था की हम क्या सचमुच गंदगी पसंद लोग बन गए है, या कहूँ की सूअर बन गए है।
एक छोटी सी कहानी आपको सुनाता हूँ । एक बार एक बहुत बड़ा सेठ मरने से पहले अपने चारों बेटों को बुलाता है और कहता है की बेटा मरने के लगभग पाँच वर्षों के बाद मैं अमुक आदमी के यहाँ सूअर के रूप में जन्म लूंगा और मेरे कान के नीचे एक काला दाग होगा , तुम चारों मुझे पहचान कर वहाँ से ले आना और मार देना ताकि पुनः अगला जन्म मैं किसी अच्छे रूप में ले सकूं। जैसा उस सेठ ने कहा था वैसा ही हुआ, लगभग पांच वर्षों बाद जब उसके चारों बेटे उस व्यक्ति के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई तो वह व्यक्ति चकित होकर बोला आप इन्हें ले जा सकते है, जैसे ही वे चारों अपने सूअर बने पिता के पास उसे ले जाने को पहुंचे उस सूअर ने कहा, बेटा मैं तुम चारों को पहचान गया और अपनी कही बात भी मुझे ध्यान है मगर अब मुझे यहीं रहने दो मुझे इस गंदगी की आदत हो गयी है ॥ चारों बेटे वापस लौट गए।
तो ये अब आपको और हमें सोचना है की क्या वाकई हम सूअर बनते जा रहे है, सरकार के नियम और क़ानून किसी भी व्यक्ति किसी भी समाज और किसी भी देश को एक दिशा तो दे सकते है परन्तु संस्कार और व्यवहार तो हमें ख़ुद ही बनाने होंगे.
एक छोटी सी कहानी आपको सुनाता हूँ । एक बार एक बहुत बड़ा सेठ मरने से पहले अपने चारों बेटों को बुलाता है और कहता है की बेटा मरने के लगभग पाँच वर्षों के बाद मैं अमुक आदमी के यहाँ सूअर के रूप में जन्म लूंगा और मेरे कान के नीचे एक काला दाग होगा , तुम चारों मुझे पहचान कर वहाँ से ले आना और मार देना ताकि पुनः अगला जन्म मैं किसी अच्छे रूप में ले सकूं। जैसा उस सेठ ने कहा था वैसा ही हुआ, लगभग पांच वर्षों बाद जब उसके चारों बेटे उस व्यक्ति के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई तो वह व्यक्ति चकित होकर बोला आप इन्हें ले जा सकते है, जैसे ही वे चारों अपने सूअर बने पिता के पास उसे ले जाने को पहुंचे उस सूअर ने कहा, बेटा मैं तुम चारों को पहचान गया और अपनी कही बात भी मुझे ध्यान है मगर अब मुझे यहीं रहने दो मुझे इस गंदगी की आदत हो गयी है ॥ चारों बेटे वापस लौट गए।
तो ये अब आपको और हमें सोचना है की क्या वाकई हम सूअर बनते जा रहे है, सरकार के नियम और क़ानून किसी भी व्यक्ति किसी भी समाज और किसी भी देश को एक दिशा तो दे सकते है परन्तु संस्कार और व्यवहार तो हमें ख़ुद ही बनाने होंगे.
बुधवार, 12 मार्च 2008
हर आदमी कतार में है.
भीड़ से भरी ये दुनिया,
फ़िर भी है जल्दी में दुनिया,
बेचैनी सी छाई ,
संसार में है,
मैं क्यों रहूँ,
परेशान,
की जानता हूँ,
आज हर आदमी,
कतार में है॥
कोई खुशी -गम के,
कोई सुख-दुःख,
कोई लड़ रहा है,
जिंदगी से,
कोई मौत के,
इंतज़ार में है॥
कोई धारा के बीच,
कोई तूफानों में,
किसी को मिला,
मांझी का साथ,
किसी के सिर्फ़,
पतवार है हाथ,
सच है तो इतना,
हर कोई मंझधार में है॥
सबकी सीरत एक सी,
और सूरत पे,
अलग-अलग,
चढा हुआ नकाब है,
किसी एक की बात,
क्यों करें, जब,
पूरी कौम ही ख़राब है।
फर्क है तो ,
सिर्फ़ इतना कि,
कोई विपक्ष में है बैठा,
कोई सरकार में है॥
हर कोई आज किसी न किसी कतार में है , क्यों है न ?
फ़िर भी है जल्दी में दुनिया,
बेचैनी सी छाई ,
संसार में है,
मैं क्यों रहूँ,
परेशान,
की जानता हूँ,
आज हर आदमी,
कतार में है॥
कोई खुशी -गम के,
कोई सुख-दुःख,
कोई लड़ रहा है,
जिंदगी से,
कोई मौत के,
इंतज़ार में है॥
कोई धारा के बीच,
कोई तूफानों में,
किसी को मिला,
मांझी का साथ,
किसी के सिर्फ़,
पतवार है हाथ,
सच है तो इतना,
हर कोई मंझधार में है॥
सबकी सीरत एक सी,
और सूरत पे,
अलग-अलग,
चढा हुआ नकाब है,
किसी एक की बात,
क्यों करें, जब,
पूरी कौम ही ख़राब है।
फर्क है तो ,
सिर्फ़ इतना कि,
कोई विपक्ष में है बैठा,
कोई सरकार में है॥
हर कोई आज किसी न किसी कतार में है , क्यों है न ?
रविवार, 9 मार्च 2008
कलम उनकी कातिल है.
कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥
कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥
कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥
कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥
एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥
मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।
कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥
नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥
कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥
कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥
कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥
एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥
मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।
कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥
नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.
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