कई अलग अलग कारणों से पिछले कुछ दिनों से अपना ये पसंदीदा काम नहीं कर पाया था, और पिछले ही कुछ दिनों में कई सारी घटनाएं-दुर्घटनाएं एक साथ घटती चली गयी। जिन्हें जब मैंने बैठ कर एक साथ सोचा तो ये सारी बातें निकल कर सामने आयी :-
एक करोड़ का बैग :- संसद में अभी अभी हमारे माननीय सांसदों द्वारा एक करोड़ की नोटों की गद्दियाँ उछालने को बिल्कुल ग़लत दृष्टिकोण से देखा और दिखाया गया।
समाज और समाज सेवक के बीच पूर्ण पारदर्शिता का ये प्रत्यक्ष प्रमाण था।
इसी घटना से एक आम आदमी को पता चला की यदि सौ सौ की गद्दियों का एक करोड़ हो तो कुल वज़न उन्नीस किलो होता है, वरना एक आम आदमी तो गुल्लक में जमा सिक्कों के वज़न से ही ख़ुद को कृतार्थ कर लेता है।
इसी गटना से पहली बार आम लोगों को किसी भी संसद सत्र में, सस्पेंस, थ्रिल और कोमेडी का पूरा मज़ा मिला, वरना तो ये सत्र वैगेरा बिल्कुल बोरिंग ही होते थे।
घटना ने दिखा दिया , की दुनिया वालों, यदि तुम समझ रहे हो की इस देश में सिर्फ़ गरीबी, भुखमरी , अशिख्सा है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लोग कुपोषण और बीमारी से मर रहे हैं, तो आँखें पसार कर देख लो हमारे सेवक जन करोड़ों के गड्डी बना कर खुलेआम कैच कैच खेल रहे हैं।
बंगलुरु और गुजरात में बम विस्फोट :-
सब कुछ एक तय शुदा कार्यक्रम है भाई।
आतंकियों का काम, पहले जगह तलाशो, जहाँ खूब भीडभाड हो , भारत में ये कौन मुश्किल काम है, फ़िर मजे से बम लगाओ और फोड़ दो।
पुलिस का काम, फ़टाफ़ट जांच शुरू, ई मेल , फी मेल पकड़े, संदिग्धों की धड पकड़ की, और अपनी पीठ थोक ली।
सरकार और हमारे मंत्रियों का काम, पहुंचे , बम विस्फोट की निंदा की, मुआवजे की घोषणा की, और चलते बने।
आम आदमी का काम, बम फटा, मरे, घायल हुए तो टी वी अखबार में फोटो छपी, मंत्रियों ने सांत्वना दी, मुवाजे का लोलीपोप दिखाया, और फ़िर सब , सब कुछ भूल कर बैठ गए,
किसी अगले बम विस्फोट की प्रतीक्षा में..............................
सीना फुलाए जाओ, सर झुकाए आओ।
ये लीजिये, अभी हमारा ५७ सदस्यों वाला दल ओलम्पिक में भाग लेने निकला ही था की उनकी सफलता-विफलता की चिंता होने लगी। पदकों का हिसाब किताब चल रहा है, और हमारे मंत्री अधिकारी अपने विचार और बयान दे रहे हैं। भविष्य में ओलम्पिक का कितना सोना चांदी भारत में चमकेगा ये तो पता नहीं मगर फिलहाल के स्थिति में एक आम भारतीय समझ नहीं पा रहा है की हँसे या रोये। कोई नसीहत दे रहा है की किसी चमत्कार या पदक की कोई उम्मीद नहीं लगाना भैया, कोई कह रहा है की चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए कम से कम आठ पदक तो अपने हैं ही। सवा अरब की जनसंख्या में सिर्फ़ पचास पचपन खिलाड़ी , जीते तो आठ, नहीं तो हमेशा की तरह सीना फुलाए जाओ, सर झुकाए आओ की नीती सफल रहेगी। तो फ़िर यार, सिर्फ़ छप्पन लोग क्यों छप्पन हज़ार या छप्पन लाख क्यों नहीं, कम से कम ओलम्पिक के दौरान ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी भारतीय ही दिखाई देंगे।
इश्मीत का जाना:-
यार, कौन कहता है कि, भगवान् से अन्याय नहीं होता , एक उदाहरण तो सामने है ही।
कोई अपनी मेहनत और किस्मत से सिर्फ़ इतनी सी उम्र में इतनी ऊचाईयों तक पहुंचा और फ़िर अचानक ही मौत की गहराई में चला गया।
मेरे तरह बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने इश्मीत सिंग को सिर्फ़ टी वी में ही देखा होगा, और शायद मेरी तरह ही कभी वोट भी नहीं किया हो, मगर दुःख , बेहद दुःख तो उसे भी मेरी तरह ही हुआ होगा।
एक नहीं भूल सकने वाली कहानी, एक फ़साना, इश्मीत का जाना, अफ़सोस , अफ़सोस, अफ़सोस।
आज इतना ही..........
प्रचार खिडकी
गुरुवार, 31 जुलाई 2008
शनिवार, 12 जुलाई 2008
ब्लॉगजगत में महिलाओं की धाक
पिछले दिनों जब मैंने अपने एक पोस्ट में महिलाओं पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थी तो जैसा मैंने सोचा था बहुत सी प्रतिक्रियां आयी थी और कई तो ऐसी थे की जिनको पढने के बाद मुझे लगा की यार ये सब तो मुझे औरतों का दुश्मन समझने लगे हैं। हालाँकि ऐसा नहीं है की उस बात को ठीक करने के लिए या किसी तरह की कोई सफाई देने के लिए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ परन्तु इतना जरूर है की मैं चाहता था की बिल्कुल आराम से किसी दिन फुर्सत में ये पोस्ट लिखूंगा, क्योंकि यदि किसी का जिक्र छूट गया या कोई बात दिमाग में आने से रह गयी तो फ़िर बाद में अफ़सोस होगा , मगर पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर मैं ये लिखने बैठ गया हूँ।
ब्लॉगजगत पर जितने समय से मैं हूँ उसमें मैंने महसूस किया है की यहाँ महिलाओं के लेखन की , उनके ब्लोग्स की और शायद इससे बनी उनकी शक्शियत की एक अलग ही बात है , एक अलग ही प्रभाव है, जो किसी भी क्षेत्र से ज्यादा है, नहीं ऐसा नहीं है की ये एक अकेला ऐसा क्षेत्र है, या की मैं पुरुषों के लेखन या इस ब्लॉगजगत में प्रभाव और सक्रियता से कोई तुलना कर रहा हूँ । बस इतना समझ लीजिये की यहाँ महिलाओं को जबरदस्त स्थान और महत्त्व मिला हुआ है।
यदि मैं एक एक का नाम लिखवाऊं तो शायद अपनी आदत के अनुरूप किसी न किसी का नाम जरूर भोल जाउंगा फ़िर भी कोशिश करता हूँ , क्योंकि उनकी नाम की चर्चा के बगैर , ये चर्चा अधूरी सी हो जायेगी। उन नामो में , घुघूती बासूती, नीलिमा, प्रत्यक्षा, मीनाक्षी, रंजना, अनुराधा, लवली, स्वाति, सुजाता, पारुल, दीप्ति, रश्मि सुराना ,शानू, मुस्कान, महक, बेजी ,ममता ,और भी बहुत सी महिला ब्लोग्गेर्स जिन्हें में पढता या नहीं भी पढ़ पाता हूँ।
सबसे पहली बात तो ये की महिला ब्लोग्गेर्स (अधिकाँश महिला ब्लोग्गेर्स ) अपने ब्लॉग को उसी तरह सजाती और सवारती हैं जैसा वे अपने घर को , हमारे जैसे नहीं की बिना मुंह धोये पहुँच गए , जैसा अपना थोबडा वैसा ही ब्लॉग का भी दिखता है, मगर ऐसा नहीं है की इसमें सिर्फ़ महिलाओं को ही महारत हासिल है हमारे भाई लोग भी कमाल की मेहनत कर रहे हैं.मगर इतना तो मैं यकीनी तौर पर कह सकता हूँ की महिलाएं इस काम में ज्यादा ध्यान देती हैं । अब उनके लिखने के विषय पर जाएँ, इसमें कोई शक नहीं की हमारी महिला ब्लोग्गेर्स अपने क्षेत्र
और अपनी विशेषता के अनुरूप पूरी दक्षता और संजीदगी से यहाँ लिख रही हैं। चाहे वो पारुल जी का संगीत ज्ञान हो , या प्रत्यक्षा का साहित्य ज्ञान, चाहे वो बेजी की चिकित्सकीय स्पंदन हो या घुघूती जी का घुमक्कड़ साहित्य, या फ़िर शानू अनुराधा, रंजना की कवितायें हो या मिनाक्षी जी का अलग अलग अंदाज़ या फ़िर स्वाति की विशिस्थ शब्दावली, सब कुछ अपने आप में अनोखा है, और ममता जी के तो पता नहीं कितने टी वी चैनल हैं । हाँ मगर मुझे लगता है की यदि मैं औरतनामा, चोखेरबाली जैसे सामूहिक ब्लोगों की चर्चा नहीं भी करूँ तो भी सभी महिला का एक प्रिया विषय ख़ुद "औरत " ही है, उनका संघर्ष , उन पर होने वाले अत्याचार, उनका शोषण, उनमें आ रहे परिवर्तन, और अपनी आदत के अनुरूप वे पुरुषवादी मानसिकता वाले समाज को जरूर कटघरे में खडा करती है , जो शायद स्वाभाविक भी है। लेकिन कोई महिला ब्लॉगर या जो ब्लॉगर नहीं भी है कभी उन महिलाओं को अपने निशाने पर नहीं लेती जो ख़ुद ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।
एक और ख़ास बात लगती है महिलाओं की, वे बेहद भावुक पाठक और उतनी ही तत्पर टिप्प्न्नी करने वाली भी होती हैं, मगर सिर्फ़ उनके लिए जो उन्हें टिप्प्न्नी करते हैं, हा हां हां , मजाक कर रहा था , मगर यदि किसी ने महिलाओं के लिए कोई प्रतिकूल बात कह दी या जिसे हमारे बुजुर्गों ने बड़ी चालाकी से नाम दे दिया है कड़वा सच तो फ़िर तो बच्चू आपकी खैर नहीं , आपको ऐसी ऐसी , और ऐसे ऐसे लोगों से तिप्प्न्नियाँ मिलेंगी की फ़िर कभी आपको ये हसरत नहीं रहेगी की को आपको टिपियाता नहीं है।
चलिए आज इतना ही ज्यादा लिखा तो जरूर कोई न कोई मेरे कान पकड़ लेगा। चलते चलते सिर्फ़ इतना
की जिनका नाम भूलवश मैं यहाँ लेना भूल गया वो मुझे माफ़ कर दें , और अपने बोल्ग्गेर भाइयों से इतना केई बंडू नाराज़ ना होना की जो काम एक महिला को करना चाहिए था वो मैंने क्यों किया , आप लोगों के लिए भी जल्दी ही एक खुशखबरी दूंगा। वैसे अभी तो सिर्फ़ इतना ही की शायद अगली पोस्ट मेरा विभिन्न समाचार पत्रों में छापा हुआ आलेख होगा जो की पूरे ब्लॉगजगत पर लिखा गया है, प्रति आते ही यहाँ स्कैन करके लगाउंगा।
फिलहाल राम राम
आपका
अजय
9871205767
रविवार, 29 जून 2008
रे माधो, तू देखना
रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,
न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥
माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?
गुरुवार, 19 जून 2008
ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट
शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
सोमवार, 16 जून 2008
तुम औरतें, हर बार क्यों,
तुम औरतें,
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?
जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥
वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।
वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।
मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।
लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।
क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।
माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?
सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥
"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...
औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?
जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥
वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।
वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।
मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।
लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।
क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।
माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?
सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥
"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...
औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.
रविवार, 15 जून 2008
दर्द हो या नंगापन ,अच्छी पैकिंग में सब बिकता है. (भाग दों)
कल इसी विषय पर मैंने अपने दूसरे चिट्ठे में (देखें मेरा दूसरा चिटठा , मेरा दूसरा ठिकाना ) कुछ पंक्तियाँ लिखी थी, मगर फ़िर लगा कि, अभी मन नहीं भरा और अभी और भी बहुत कुछ कहना बांकी है ।
अभी हाल फिलहाल में ख़बर पढी कि , ताजातरीन आरुशी काण्ड ने हिन्दी समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ा दी है। टी आर पी, यानि टेलीविजन रेटिंग पोंट्स , मतलब उन दिनों लोगों ने अधिकांश समय ये समाचार चैनल्स देखे। इसके साथ ही इस घटना से जुडी कुछ और खबरें भी आयी, जैसे कि एक प्रमुख महिला निर्मात्री (जिन्हें मेरे विचार से भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सादे गले मस्तिष्क और विचार वाली महिला और निर्मात्री कहा जाए टू ग़लत नहीं होगा ) ने अपनी आदत के अनुरूप इस व्हातना को भी अपने वाहियात सेरेयलों को ज्यादा वाहियात बनाने के लिए शामिल करने की सोची, मगर आयोग के डंडा फटकारते ही दुबक गए।
हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब मीडिया , और चित्रपट के लोगों द्वारा हादसे को, किसी के दर्द को भुनाने की कोशिश की गयी हो। बॉलीवुड में तो ये एक स्थापित चलन सा बन चुका है। आपको राजस्थान की दलित महिला भंवारी देवी के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बनी पिक्चर बवंडर शायद याद हो। जहाँ तक मुझे पता है कि इसके निर्माता निर्देशक (उनका नाम शायद जगमोहन मून्द्रा था ) ने आज तक कभी भंव्री देवी की शक्ल भी नहीं देके, उसका दर्द पूछना तो दूर की बात है। और ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें याद करने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पडेगा।
असल बात सिर्फ़ इतनी है कि ये जो हमारे बीच से निकलकर हमारे सामने खड़े हैं और जिनका दावा है कि वे जो दिखाते बताते हैं वो तो समाज का आईना है वो एक सौदागर हैं, विशुद्ध सौदागर , सबकुछ बेचने वाले। सपने मुस्कराहट, आतंक, मासूमियत, दर्द, प्यार, नफरत, हादसा, हकीकत, सबकुछ। माल चाहे जैसा भी हो, जो भी हो या कि सबके पास एक ही माल हो फर्क पैकिंग और प्रस्तुतीकरण का है।
और फ़िर हमारे समाचार चैनलों की इन्तहा टू ये है कि अभी कुछ समय पहले एक समाचार चैनल की प्रसारिका एक अपराध आधारिक कार्यक्रम की उद्घोषणा इतनी शिद्दत से करती थी कि लगता था कि वे अपराधियों का नाम नहीं बल्कि अपने प्रेमियों का नाम ले ले कर पुकार रही हों। तो फ़िर तो यही लगता है कि ये सब के सब उन गिद्धों के झुंड की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ़ लाशों से मतलब होता है, चाहे वो इंसान की लाशें हों या जानवरों की। वह रे हमारा चौथा स्तम्भ !
अभी हाल फिलहाल में ख़बर पढी कि , ताजातरीन आरुशी काण्ड ने हिन्दी समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ा दी है। टी आर पी, यानि टेलीविजन रेटिंग पोंट्स , मतलब उन दिनों लोगों ने अधिकांश समय ये समाचार चैनल्स देखे। इसके साथ ही इस घटना से जुडी कुछ और खबरें भी आयी, जैसे कि एक प्रमुख महिला निर्मात्री (जिन्हें मेरे विचार से भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सादे गले मस्तिष्क और विचार वाली महिला और निर्मात्री कहा जाए टू ग़लत नहीं होगा ) ने अपनी आदत के अनुरूप इस व्हातना को भी अपने वाहियात सेरेयलों को ज्यादा वाहियात बनाने के लिए शामिल करने की सोची, मगर आयोग के डंडा फटकारते ही दुबक गए।
हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब मीडिया , और चित्रपट के लोगों द्वारा हादसे को, किसी के दर्द को भुनाने की कोशिश की गयी हो। बॉलीवुड में तो ये एक स्थापित चलन सा बन चुका है। आपको राजस्थान की दलित महिला भंवारी देवी के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बनी पिक्चर बवंडर शायद याद हो। जहाँ तक मुझे पता है कि इसके निर्माता निर्देशक (उनका नाम शायद जगमोहन मून्द्रा था ) ने आज तक कभी भंव्री देवी की शक्ल भी नहीं देके, उसका दर्द पूछना तो दूर की बात है। और ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें याद करने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पडेगा।
असल बात सिर्फ़ इतनी है कि ये जो हमारे बीच से निकलकर हमारे सामने खड़े हैं और जिनका दावा है कि वे जो दिखाते बताते हैं वो तो समाज का आईना है वो एक सौदागर हैं, विशुद्ध सौदागर , सबकुछ बेचने वाले। सपने मुस्कराहट, आतंक, मासूमियत, दर्द, प्यार, नफरत, हादसा, हकीकत, सबकुछ। माल चाहे जैसा भी हो, जो भी हो या कि सबके पास एक ही माल हो फर्क पैकिंग और प्रस्तुतीकरण का है।
और फ़िर हमारे समाचार चैनलों की इन्तहा टू ये है कि अभी कुछ समय पहले एक समाचार चैनल की प्रसारिका एक अपराध आधारिक कार्यक्रम की उद्घोषणा इतनी शिद्दत से करती थी कि लगता था कि वे अपराधियों का नाम नहीं बल्कि अपने प्रेमियों का नाम ले ले कर पुकार रही हों। तो फ़िर तो यही लगता है कि ये सब के सब उन गिद्धों के झुंड की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ़ लाशों से मतलब होता है, चाहे वो इंसान की लाशें हों या जानवरों की। वह रे हमारा चौथा स्तम्भ !
शनिवार, 14 जून 2008
दान (एक छोटी सी कहानी )
सुबह सुबह ही विद्या के फोन की घंटी कम ही बजा करती थी इसलिए जब उस दिन अचानक ही नींद खुलने से पहले ही घंटी बज उठी तो उसने बुरा सा मुंह बनाया, और मन ही मन उस फोन मिलाने वाले को कोसती हुई फोन उठा कर देखने लगी, नंबर देखते ही झुंझलाहट कम हो गयी, कविता दीदी का फोन था,
" हेलो, अरे विद्या तूने, कल मुझे ये तो बता दिया की आज निर्जला एकादशी है , परन्तु शायद तुझे ये नहीं पता कि इस दिन का बड़ा महत्त्व है, सिर्फ़ चावल नहीं खाने का मतलब नहीं है, आज लोग खूब दान पुण्य , करते हैं। मैं तुझे बताती हूँ , आज के दिन मन्दिर में खरबूजा, पंखाघडा, दूध चीनी आदि का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है। अरे हाँ , मुझे कौन सा मालूम था , वो तो माँ का फोन आया था , शायद तुझे भी करें।"
इसके बाद तो माँ , बड़ी दीदी, बाजी और जाने किस किस ने फोन करके पुण्य कमाने का सूत्र विद्या को बता दिया। दरअसल विद्या ने अभी अभी घर गिरहस्थी शुरू की थी, और फ़िर घर में सबसे छोटी होने के कारण भी सब उसे हर बात बताते और समझाते थे।
विद्या ने इसके बाद देर करना ठीक नहीं समझा और विनय को भी जबरदस्ती उत कर सारे सामानों की सूची पकडा दी, और ये भी बता दिया कि जब तक वो बाज़ार से ये सारी चीज़ें लाते हैं वो नहा धोकर तैयार हो जायेगी, ताकि मन्दिर जाकर वो सारी चीज़ें दान कर सके, बाद में बहुत भीड़ हो जाती है। विनय भी बेमन से उठ कर बाज़ार चल दिए और जाते जाते बोल गए , " भाई , तुम लोगों का कुछ नहीं हो सकता इस सबसे अच्छा तो ये होगा कि इन चीजों को किसी गरीब को देदो , भगवान् से तुम्हें क्या कब कैसे मिलेगा ये तो पता नहीं मगर गरीब की दुआ हाथोंहाथ मिल जायेगी।"
विद्या सारा समान लेकर फताफर मन्दिर की तरफ़ चल पडी। वहाँ देखा तो वहाँ पहले से ही बहुत सी औरतें , दान के लिए खादी थी, उसने सोचा कि शायद उसे थोडा और जल्दी आना चाहिए था, मगर वो क्या करती , सबने इसके बारे में आज ही तो बताया था। काफी इंतज़ार के बाद उसका नंबर भी आ ही गया , भगवान् को प्रणाम करने के बाद उसने दान की थाली पंडितजी के हाथ में पकडा दी। पंडित जी ने भी उसे खूब मन से आशीर्वाद दिया।
पूजा पाठ के बाद वो बाहर निकलने लगी , तो मन्दिर के गेट पर ही दो छोटी छोटी लडकियां फटी चिती फ्राक में उसके आगे हाथ पसारे आ गयी, अबी वो कुछ और सोचती इससे पहले ही उसे याद आया कि , अरे उसने तो मन्दिर की प्रदक्षिना की ही नहीं। वो तुरंत वापस घूम गयी। प्रदक्षिना करते करते जैसे ही मन्दिर के पीछे पहुँची तो उसे पंडित जी दिखाई दिए, पास में खड़े किसी लड़के को शायद कुछ कह रहे थे, " जा जल्दी से ये सब कुछ पीछे वाले लाला जी की दुकान पर दे आ, कभी कभार तो कमाने धामाने का मौका मिलता है, और हाँ मोहन से कह कि ये साले भूखे नंगे बच्चों को यहाँ से भगाए , सब साले मामला ख़राब करते हैं।"
विद्या ने उड़ती उड़ती निगाह डाली तो देखा कि पंडितजी सारा समान जो अभी अभी दान में लोग दे कर गए थे एक बड़े से पोलीथिन में दाल कर उस लड़के को पकडा रहे थे। विद्या पर निगाह पड़ते ही पंडित जी ने खिसयानी सी हंसी हंस दी।
विद्या, ने गेट पर खड़ी दोनों लड़कियों को दो दो रूपैये का सिक्का दिया। उसके मन को जो भी शांती मन्दिर में दान करते वक्त मिली थी वो सारी कब की उड़ गयी थी। उसे दान का मतलब समझ आ चुका था, और अब उसे अगली एकादशी का इंतज़ार है.
" हेलो, अरे विद्या तूने, कल मुझे ये तो बता दिया की आज निर्जला एकादशी है , परन्तु शायद तुझे ये नहीं पता कि इस दिन का बड़ा महत्त्व है, सिर्फ़ चावल नहीं खाने का मतलब नहीं है, आज लोग खूब दान पुण्य , करते हैं। मैं तुझे बताती हूँ , आज के दिन मन्दिर में खरबूजा, पंखाघडा, दूध चीनी आदि का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है। अरे हाँ , मुझे कौन सा मालूम था , वो तो माँ का फोन आया था , शायद तुझे भी करें।"
इसके बाद तो माँ , बड़ी दीदी, बाजी और जाने किस किस ने फोन करके पुण्य कमाने का सूत्र विद्या को बता दिया। दरअसल विद्या ने अभी अभी घर गिरहस्थी शुरू की थी, और फ़िर घर में सबसे छोटी होने के कारण भी सब उसे हर बात बताते और समझाते थे।
विद्या ने इसके बाद देर करना ठीक नहीं समझा और विनय को भी जबरदस्ती उत कर सारे सामानों की सूची पकडा दी, और ये भी बता दिया कि जब तक वो बाज़ार से ये सारी चीज़ें लाते हैं वो नहा धोकर तैयार हो जायेगी, ताकि मन्दिर जाकर वो सारी चीज़ें दान कर सके, बाद में बहुत भीड़ हो जाती है। विनय भी बेमन से उठ कर बाज़ार चल दिए और जाते जाते बोल गए , " भाई , तुम लोगों का कुछ नहीं हो सकता इस सबसे अच्छा तो ये होगा कि इन चीजों को किसी गरीब को देदो , भगवान् से तुम्हें क्या कब कैसे मिलेगा ये तो पता नहीं मगर गरीब की दुआ हाथोंहाथ मिल जायेगी।"
विद्या सारा समान लेकर फताफर मन्दिर की तरफ़ चल पडी। वहाँ देखा तो वहाँ पहले से ही बहुत सी औरतें , दान के लिए खादी थी, उसने सोचा कि शायद उसे थोडा और जल्दी आना चाहिए था, मगर वो क्या करती , सबने इसके बारे में आज ही तो बताया था। काफी इंतज़ार के बाद उसका नंबर भी आ ही गया , भगवान् को प्रणाम करने के बाद उसने दान की थाली पंडितजी के हाथ में पकडा दी। पंडित जी ने भी उसे खूब मन से आशीर्वाद दिया।
पूजा पाठ के बाद वो बाहर निकलने लगी , तो मन्दिर के गेट पर ही दो छोटी छोटी लडकियां फटी चिती फ्राक में उसके आगे हाथ पसारे आ गयी, अबी वो कुछ और सोचती इससे पहले ही उसे याद आया कि , अरे उसने तो मन्दिर की प्रदक्षिना की ही नहीं। वो तुरंत वापस घूम गयी। प्रदक्षिना करते करते जैसे ही मन्दिर के पीछे पहुँची तो उसे पंडित जी दिखाई दिए, पास में खड़े किसी लड़के को शायद कुछ कह रहे थे, " जा जल्दी से ये सब कुछ पीछे वाले लाला जी की दुकान पर दे आ, कभी कभार तो कमाने धामाने का मौका मिलता है, और हाँ मोहन से कह कि ये साले भूखे नंगे बच्चों को यहाँ से भगाए , सब साले मामला ख़राब करते हैं।"
विद्या ने उड़ती उड़ती निगाह डाली तो देखा कि पंडितजी सारा समान जो अभी अभी दान में लोग दे कर गए थे एक बड़े से पोलीथिन में दाल कर उस लड़के को पकडा रहे थे। विद्या पर निगाह पड़ते ही पंडित जी ने खिसयानी सी हंसी हंस दी।
विद्या, ने गेट पर खड़ी दोनों लड़कियों को दो दो रूपैये का सिक्का दिया। उसके मन को जो भी शांती मन्दिर में दान करते वक्त मिली थी वो सारी कब की उड़ गयी थी। उसे दान का मतलब समझ आ चुका था, और अब उसे अगली एकादशी का इंतज़ार है.
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