प्रचार खिडकी

सोमवार, 14 सितंबर 2009

मां की न कर सके तो, बेटी की सेवा करें...(हिंदी दिवस पर )


कैसे समय बीतते बीतते ठीक उसी जगह पर पहुंच जाता है....जहां से चलना शुरू करता है.....ऐसा लगता है जैसे अभी तो हिंदी दिवस बीता था....और अब बिना कुछ बदले...कुछ नया हुए....कुछ अलग हुए....फ़िर आ गया....ऐसा थोडी होता है....कम से कम ...त्रेता से द्वापर तक का समय तो मिलना ही चाहिये....तभी तो कुछ कर पायेंगे हिंदी के लिये....आखिर ..पूरे सवा या उससे भी ज्यादा लोगों को समझाना है कि हिंदी ही ......हमारी राष्ट्र भाषा है ...हमारी अपनी भाषा है....कम से कम वो एक इकलौती भाषा ....जिसके दम पर अपने इतने बडे देश में ..हम निश्चिंत होकर घूम सकते हैं....कि चलो कम से कम बतिया तो लेंगे ही सबसे ....न सही ..अपनी बात तो कह ही लेंगे......और यदि आज हिंदी दिवस के बहाने इसे दोबारा याद कर लिया जाये....कुछ देर आपस में बैठ कर हिंदी में बोल बतिया लेने से इसका रत्ती भर भी भला हो पाता है ...तो यही सही.....

हालांकि मुझे हमेशा ही इस बात से सख्त ऐतराज़ रहा है कि ....बहुत से लोग कहते हैं कि हिंदी कमज़ोर होती जा रही है.....इसकी सेहत की चिंता जाने कैसे कैसे ....कितनी जगह पर की जाने लगती है....और इस हफ़्ते...महीने में तो खास तौर पर इसे ..पल्स पोलियो ड्रोप्स पिलाने की तैयारी की जाती है....मैं तब सोचने लगता हूं.....ये अपनी हिंदी कमज़ोर कैसे हो गयी....बचपन से आज तक तो इसे वैसे ही ...सेहत मंद देखा है....घर से लेकर बाहर तक...दोस्त से लेकर दुश्मन तक.....गाने से लेकर ...रोने तक...और छोडने से लेकर ..लपेटने तक...सिर्फ़ हिंदी ही हिंदी दिखी मुझे तो ...दिखी क्या अब भी वही दिखती है.....मेरा दूध वाला.....मेरा सब्जी वाला.....मेरा मिस्त्री....मेरा ..अरे किस किस का नाम लूं सब के सब ....हिंदी मे ही बात करते हैं....अपनी उधारी भी हिंदी में ही वसूलने आते हैं....और खुदा ना खास्ता ...जब किसी बहाने पर उन्हें यकीन नहीं होता....तो ससुरे ...कोसते...गलियाते भी हिंदी में ही हैं.....कितनी बार कहा है..कि यार कम से कम गाली तो ........मगर न जी....पूछा भी कि अबे.....ये हिंदी दिवस लगता तुम लोगों के लिये ही मनाया जाता है....वे कहने लगे...कौन सा दिवस...कौन सी रात्रि....हम लोग तो यही बोलते समझते हैं....हमने मन ही मन कहा बेवकूफ़ कहीं के....कहां तो सरकार इनके लिये इत्ते पैसे खर्च कर रही है....और इन्हें पता तक नहीं.......क्या कहा इनके लिये थोडी कर रही है......तो फ़िर.....?

ओह तो उनके लिये.....जो टीवी....रेडियो....और अपने...इंटर्व्यू में...इंग्रेजी छांटते हैं...धत तेरे की....अपनी जनसंख्या में...वे लोग हैं ही कितने जी...मुट्ठी भर भी नहीं....उनके लिये इत्ता सारा ....और हमने तो सुना है कि ई सब बडका लोग भी ....अपने घर में...अपने धोबी, माली, नौकर, चाकर, ...सबसे हिंदी में ही...मतलब आ जाते हैं अपनी औकात पर ..........धत तेरे कि....यही सच है जी...

चलते चलते ...एक बात .....कल परसों जब मेरे कार्यालय में ...हिंदी कार्यशाला का आयोजन किया गया....तो जो हमारी कार्यशाला को संचालित करने आये थे....उन्होंने एक बात कही जो मेरे मन को बहुत ही गहरे तक प्रभावित कर गयी.....उनका कहना था.....संसक्रत (यदि किसी को बराहा में व्रित...प्रव्रति आदि लिखना पता हो तो बतायें...अब तो आप समझ ही गये होंगे..संस्क्रत ऐसे क्यों लिखा )....जो सभी भाषाओं की जननी यानि मां है...उसकी सेवा तो हम नहीं कर पा रहे हैं.....मगर कम से कम बेटी ...हिंदी की सेवा का जो मौका मिला है ..उसे तो कर ही सकते हैं...चाहे जिस रूप में भी हो....चाहे जिस तरह से भी हो......आने वाले बच्चों को हमें ये एह्सास कराना ही होगा कि ...हिंदी हमारी....हमारे परिवार की...देश की..समाज की ताकत है....उनकी अपनी ताकत है...
मेरी कोशिश जारी है.........................................और आपकी................................

रविवार, 6 सितंबर 2009

पहले कमाओ.....फ़िर नौकरी पाओ...



..है न कमाल..या शायद थोडा कन्फ़्यूजिंग.....नहीं जी बिल्कुल भी नहीं...जब आप भी पूरी बात सुनेंगे ..तो कहेंगे .कि ये तो सच ही है....दरअसल बात ये है कि अभी हाल ही में...केन्द्रीय विद्यालय संगठन में कई पदों की भर्ती का इश्तहार विग्यापित किया गया है...खुशी की बात है न.....आज जब सरकारी नौकरियों में काफ़ी कटौती की जा रही है तो ऐसे में..यदि इस तरह की चुनौतियां बच्चों को मिल रही हैं..ये उनके लिये निसंदेह अच्छी बात है.....यहां तक तो सब ठीक है .....मगर इसके आगे ....

इस पद को पाने के लिये जो प्रतियोगिता आयोजित की जायेगी...उसके लिये आवेदन मंगाये गये हैं...और उस आवेदन के साथ परीक्षार्थी को मात्र ....एक हज़ार रुपये की राशि जमा करनी है...अब ये आपकी श्रद्धा है....आप उसे ड्राफ़्ट के माध्यम से जमा करवाते हैं..या पोस्टल और्डर के माध्यम से...राशि सिर्फ़ ....मात्र एक हज़ार रुपये ही रहेगी....देखा सरकार कित्ते कम पैसे में ..बेरोजगार बच्चों को इतना सुनहरा अवसर दे रही है...मेरे ख्याल से सरकार शायद ये सोच रही है कि ..बच्चे पहले कमाना सीख लें..थोडे पैसे वैसे बचाना सीख लें.....फ़िर नौकरी भी दे दी जायेगी उनको....क्या कहा ...क्या पूछ रहे हैं आप ....नौकरी से पहले कमाना कैसे सीख सकेंगे बच्चे...लिजीये ..इससे सरकार को क्या लेना देना....भई वो सरकार है ...कुछ भी सोच सकती है....

मैंने भी अपने अनुज को इस प्रतियोगिता में आवेदन के लिये कहा था....मगर इत्ती सी फ़ीस सी फ़ीस को देख कर ....और उसकी अपार काबिलियत को देख कर थोडा सा ठिठक गया.....फ़िर सोचा इसी बहाने ...उनसे पूछूं तो सही कि ...ये इतनी सब्सीडी काहे दे रहे हो भाई.....बेरोजागारों को ....

हेल्लो...जी देखिये आपने जो ये फ़ौर्म निकाला है न....यार इसकी फ़ीस तो बहुत ज्यादा है...बंदा सिर्फ़ इसमें भाग लेने के लिये इतनी राशि खर्च कैसे करेगा...वो भी बेरोजगार व्यक्ति....

अबे जाओ ..ये कौन सी ज्यादा राशि है भई....कौन सी दुनिया में हो ..इत्ते में तो दस किलो दाल भी नहीं आयेगी......

आयं...नौकरी से दाल का क्या कनेक्शन भाई........

लो अब ये भी मैं बताऊं.... दाल से आज किस चीज़ का कनेक्शन नहीं है....और तो और ..सुना है सोना जो महंगा हुआ है ..उसमें भी कहीं न कहीं दाल का ही हाथ है....और सुनो ..विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था का अपना जो एक अलग और मजबूत स्थान बन रहा है ....सब दाल की बदौलत ....वे कह रहे हैं....जो देश दाल इतनी मंहगी खा सकता है ...वो जरूर ही ......

अरे भाई रूको रूको...यार मैं आवेदन की फ़ीस की बात कर रहा हूं आप दाल की गाये जा रहे हो....यार जब हमने फ़ौर्म भरा था ऐसे पदों के लिये तब तो मात्र बीस पच्चीस रुपये हुआ करते थे.....अब भाई को भरवाना है...

तो अब तो आप रिटायर हो चुके होंगे ....या होने वाले होंगे......?

अरे नहीं भई...सिर्फ़ दस साल पहले की बात है यार....आप तो कमाल करते हैं.....

तो तब क्यों नहीं भरवा दिया अपने भाई को फ़ौर्म अब इतनी मंहगाई में ये तजुर्बा क्यों कर रहे हो......

यार तब उसकी उम्र नहीं हुई थी.....अब हुई है...

अरे तो इतनी मंहगाई में जवान होगा तो ...भुगतना तो पडेगा ही न........

उसने फ़ोन काट दिया.....मैं भी लटका हुआ हूं....सोच रहा हूं इससे अच्छा तो एक दाल की दुकान ही खुलवा दूं...वैसे जिन जिन के पास मात्र हज़ार रुपये हों वे यह सुनहरा अवसर न छोडें.....


रविवार, 23 अगस्त 2009

एक इंटरव्यू ...पोलीग्राफी मशीन का (वही सच का सामना वाली )

आजकाल हर तरफ इंटरव्यू का दौर चल रहा है...या तो इंटरव्यू लिया जा रहा है ..या दिया जा रहा है....हम दोनों में से किसी भी कैटेगरी में नहीं आते ..ताऊ से भी कहा की ..लगे हाथ हमारा भी कुछ छोटा मोटा इंटरव्यू ले ही डालो ..फायर फॉक्स राउंड...वही दे धनाधन प्रश्नों वाली ..ही सही....मगर ताऊ तो ताऊ ठहरे...सूरमा भोपाली बना दिया ..शोले में ..खैर छोडिये..तो जब ये तय हुआ कि...यही अपने पराये इंटरव्यू नहीं लेने को तैयार हैं ..तो सोचा चलो खुद ही ये काम करें ...हम भी निकल पड़े.....

आजकल टी आर पी का ज़माना है ...सो सोचा कि मेहमान भी तो ऐसा होना चाहिए कि जिसके इंटरव्यू को देख पढ़ कर उसका हो न हो ....अपना कल्याण तो हो ही जाए...तो ऐसे में सच का सामना से बेहतर और कौन हो सकता था...मेजबान उस शो के तो तैयार नहीं हुए....कहने लगे ..अबे जा .अब जाके इस शो के बहाने तो मेरी खुद की टी आर पी बढ़ी है ...अब इंटरव्यू आप जैसे को दे दिया तो ..जो टी आर पी बढ़ी है ..वो टी आर पी से....सीधा बी जे पी .हो जायेगी.....बी जे पी......अरे पार्टी नहीं यार...बी जे पी मतलब ...भाड़ में जाओ पुत्तर ..ओह अच्छा ...तो और कौन मिलता ..वहाँ आने वाले मेहमान से बात की ....वे बौखलाए थे ..अबे भाग यहाँ से ..इस शो में आकर सिर्फ टी आर पी ही मिली है ...कमबख्त पैसे तो आज तक इन्होने किसी को दिए नहीं ....टी आर पी भी ..ऐसी ..थूकम और फजीहत ...

अचानक ही मेरा कोने वाला ब्रिलिएंट दिमाग भक्क से जल उठा ....अरे असली बंधू तो अब मिले हैं ...इंटरव्यू के लिए इनसे बढिया तो और कोई हो ही नहीं सकते थे ...मैं फटाक से पहुँच गया ....

और भैया ..एन आर आई..पोलीग्राफी मशीन ...कैसी हो ....कैसा लग रहा है ..पूरे देश की बखिया उधेड़ रही हो ...और मजे आ रहे हैं न......

मशीन की तो जैसे बाँछें खिल रही थी ...मुझे तो सिर्फ इस बात से पता चला कि उसमें से निकल रही बहुत सी तारें एक दम से ... टैन टैणेन .......करने लगी ...

मशीन हुलस कर बोली....क्या बताउं.....इससे पहले जितनी बार भी मुझे यहां बुलाया ..लाया जाता रहा है ...कम्बखत...चोरों...
डाकुओं....नेताओं.......और पता नहीं कैसे कैसे झूठों का ...कितना गंदा ....कैसा धंधा...और क्या क्या उगलवाया जाता था...और मुझे कह्ते थे...सुनो झेलो...बताओ...इतने पर भी मुझे कोई मलाल नहीं होता ...यदि ..वे मेरे ..सहारे किसी को सजा दिलवा पाते...अरे तो क्या खाली ..कहानी सुनाने के लिये बुलाया है मुझे...कह्ते तू बस सच झूठ का बता ...इसका यूज कैसे करना है ....वो हम देख लेंगे .....सत्यानाश हो तुम्हारा ....मन दुख जाता था.....मगर करती क्या.....

अब जाकर कुछ तसल्ली हुई है...बल्कि कहुं तो लगता है कि हां...इसी दिन के लिये तो मेरा जन्म हुआ था ...जब आयोजकों ने मुझसे सम्पर्क किया ..तो मुझे भी लगा ....ये क्या बात हुई..अपने जीवन से जुडी हुई कुछ सच्चाईयों को स्वीकार करो ..और ढेर सारे पैसे ले जाओ ...कोइ क्यों झूठ बोलेगा......किसे नहीं पैसे चाहिये.....मगर फ़िर पता चला ....अरे आप क्यों इत्ता सोच रही हो ...आप देखना हम प्रश्न ही ऐसे करेंगे ....कि यदि सच बोले तो भी गये..और झूठ बोले तो भी ....और प्रश्न भी ऐसे कि ....बस एक उत्तर देने वाले..और उसके रिश्तेदारों को छोड्कर ...बांकी सब को गुदगुदी होने लगे.....

अरे इतना ही नहीं ....उन्होंने मुझे एक सूची सौंपी ..और कहा कि ..किसान...मजदूर....गरीब...जैसों को कभी भी ...इस शो पर नहीं बुलाया जायेगा...तुम बस मजे लो....तब जाकर मुझे तसल्ली हुई...अब तो ऐसा लग रहा है कि ...इस देश में कोई ऐसा बचा ही नहीं...जिसका कोइ गलत सम्बन्ध नहीं...जाओ जाओ इससे ज्यादा इन्टरव्यु दिया तो ...गड्बड हो सकती है ...

शनिवार, 15 अगस्त 2009

नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं , न देश से न उसकी आजादी से ..




















साल में दो बार जब भी देश के स्वतंत्र और गणतंत्र दिवस को मनाये जाने का अवसर आता है उस समय हमेशा ही ये प्रश्न उठता और उठाया जाता है की ...क्या यही है आजादी...क्या इसी के लिए हमारे पुरखों ने संघर्ष किया था ..क्या यही वो सपना था जो उन्होंने देखा था....और यकीनन फटाक से उसका जवाब मिलता है ...बिलकुल नहीं जी...ऐसा तो कतई नहीं सोचा था ....ये सब तो अब हो रहा है ...और कई बार तो ये तक कहा जाता है की .......यार इससे भले तो अंग्रेजों के जमाने में थे ...तो क्या सिर्फ इतने ही वर्षों में स्वतन्त्रता हमें भारी लगने लगी है ...इतनी की अब तो उसे मनाने का मन भी नहीं करता ...आज बहुत से लोगों के लिए ये सिर्फ एक छुट्टी बन कर रह गयी है ....यानि शिकायत ही शिकायत ..एक छटपटाहट ..एक व्याकुलता ...मगर किसलिए ...

क्या सचमुच देश को आजादी मिलने से ..हमें स्वतंत्र होने से ...कोई अंतर नहीं आया ...कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता ...हाँ ये हो सकता है की ऐसा मुझे अपने जीवन से मिले निजी अनुभवों के कारण लगता हो ....मगर अपने स्थान पर खड़े हर व्यक्ति से मैं कम से कम यही अपेक्षा तो कर ही सकता हूँ की ..हमें कोई शिकायत नहीं है ..इस देश के आजाद होने ..और आजादी बनी रहने से ..इस बात का भी अफ़सोस नहीं है की ..हम इस देश के नागरिक हैं ...और कहूँ तो गर्व है ..किन किन बातों पर ..वो एक अलहदा मुद्दा है ...जिसमें बहस की बहुत गुंजाईश है ...दोष और गुण ...दो सर्वथा अनिवार्य तत्त्व हैं ...जो सब जगह मिल ही जाते हैं ....बस फर्क आपके देखने का होता है ...मुझे बहुत अच्छी तरह स्मरण है की पिताजी बताते थे कि किस तरह वे और उनके पिताजी जी तोड़ मेहनत के बावजूद दो वक्त का खाना नहीं खा पाते थे क्यूंकि ..सारा अनाज लगान में ही चला जाता था ....समय बदला ...पहले उन्होंने फौज में देश की सेवा की....अपने बाल बच्चों को यथासंभव और यथाशक्ति ...उस समय उपलब्ध संसाधनों और शिक्षा सुविधाओं के अनुरूप ..पढाया लिखा कर एक जिम्मेदार नागरिक और एक अच्छा इंसान बनाया ..चाहते तो वे भी अपने मित्रों की तरह बहुत से व्यसन करते ..हो सकता था कि औरों की तरह वे भी अपने परिवार को ग्रामीण परिवेश में छोड़ कर ...बाद में नौकरी न मिलने के लिए देश को, सरकार को, उसके तंत्र को कोसते ..मगर ऐसा हुआ नहीं....आज मैं राजधानी में एक सरकारी नौकरी में हूँ ..अपनी संतानों के लिए ..उनके भविष्य के लिए ..उन्हें जो भी दे सकता हूँ दे रहा हूँ ...और मुझे कभी भी नहीं लगा कि ..सरकार , ये देश, मेरे लिए कोई ऐसी बाधा खड़ी कर रहे हैं ...

जानते हैं हमारी समस्या क्या है ...हम आसानी से ही ...बिना किसी सोच विचार के ..एक दम से निर्णय पर पहुंच जाते हैं कि ......सब दोष सिर्फ सरकार का इस देश की परिस्थितियों का ही है ....आखिर ये देश है कौन ..क्या मिटटी ,पानी, पहाड़, जंगल ,,गाँव , शहर ,,यही देश हैं...नहीं देश तो हम और आप हैं ...और हम आप क्या ....यदि आप खुद ठीक हैं ..तो देश ठीक है .....तो कीजिये न खुद का आकलन ..झांकिए न अपने अन्दर ..पूछिए न अपनी अंतरात्मा से प्रश्न ....और मुझे लगता है कि आपको जो जवाब मिलेगा वो ही बतायेगी कि ...देश का ...उसकी आजादी का महत्व क्या और कितना है ....वैसे भी पकिस्तान, बंगलादेश, चीन जैसे ....मासूम मित्र देशों की फितरत ,नीयत , और उद्देश्यों को कौन नहीं जान रहा है ...तो ऐसे में यदि हम खुद ही अपने देश के दुश्मन,,उसके विरोधी बने रहने का दिखावा करते हैं, (दिखावा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि मैं जानता अहूँ कि भले हम थोड़ी देर के लिए भडास निकाल लें ,,खूब भला बुरा कह लें ...मगर हर हाल में दिल से भारतीय ही रहते हैं ..और रहेंगे ..न जाने कितने युगों तक ) तो ये ठीक नहीं होगा.....इसलिए ...दोस्तों इस आजादी को ..इस देश को ..और इस देश के आप जैसे सभी प्यारे देशवासियों के हर जज्बे को सलाम ......

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कृष्ण तो याद रहे , गीता को भूल गए


जन्माष्टमी का पर्व हर वर्ष की तरह इस बार भी खूब जोर शोर से मनाया जा रहा है ...मंदिर सजे हुए हैं...आरती, पूजा, कीर्तन की तैयारी भी चल रही है...और मैंने महसूस किया है की ऐसा मैं अपने बचपन से ही देख रहा हूँ ....और अब हमारे बच्चे देख रहे हैं ....
चलिए इसी बहाने से ..उनमें वो पारंपरिक संस्कार तो जा ही रहे हैं...जिनकी आज न जाने मुझे क्यूँ बहुत जरूरत महसूस होती है...
बेशक हमारी तरह उन्हें ...ओम जय जैग्दीश हरे कंठस्थ न हो ...ये भी की उन्हें हमारे समय की तरह पारिवारिक आरती में कोई विशेष दिलचस्पी न हो ...इसके बावजूद इतना तो है की ...वे कल को ..ये न कहें...अपने दोस्तों के बीच...यार आज कुछ है न .....वो कहते हैं ......हैपी जन्माष्टमी ...

इससे इतर मैं सोचता हूँ की आज हमें कृष्ण याद हैं....कृष्ण की लीलाएं याद हैं...राधा, मीरा, ....सब याद हैं...उनके भजन कीर्तन से हम ....मंदिर में समां बाँध देते हैं....मंदिर में आज ...खूब देर तक पूजा ..अर्चना चलती रहेगी ....और फिर वो धनिये वाल विशेष प्रसाद ....क्या कहने ..उसकी खुशबू ...और उसका स्वाद .....मगर जो चीज़ नहीं याद है ...और न जाने कबका उसे भूल चुके हैं ..वो है कृष्ण का गीता उपदेश....गीता में कृष्ण द्वारा समझाया गया जीवन दर्शन ....चिंतामुक्त होकर ...सिर्फ कर्म करने का चरित्र निर्माण....और भी सब कुछ....आज तो वो दर्शन ... साधू संतों के प्रवचन में भी नहीं दिखाई देता ...वहाँ भी न जाने कौन सा दर्शन बघारा जाता है....कर्म के लिए तो कोई प्रेरित ही नहीं कर रहा है ...

काश कि ..इस जन्माष्टमी के शुभ मौके पर कृष्ण के साथ साथ सब ..गीता सार को भी याद कर लेते...

आप सबको जन्माष्टमी के शुभ अवसर की शुभकामनायें

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

आवाजें ....क्यूँ बेआवाज हो जाती हैं ..?







सुना है कि,
दिल्ली देश का दिल है ,
यानि पूरे देश
रूपी शरीर के ,
बिलकुल मध्य में स्थित ,

ये भी सुना है है कि,
उस दिल्ली के
बीचों बीच एक ,
बहुत बड़ा केंद्र
बना हुआ है,

सभी तकनीकों ,
और ,तरकीबों से लैस,
वहाँ कुछ लोग
बैठे हैं ,इसलिए ताकि
उस गोल इमारत में
सभी दिशाओं से ,
आवाजें पहुँच सकें ,

आवाजें पहुँचती भी ,
होंगी शायद ,
या कभी पहुंचाई जाती होंगी,
मगर हमेशा वो ,
डूब जाती हैं ,
उस गोल इमारत के ,
अन्दर घूम घूम कर ,
भंवर में फंस कर ..

मैं आज तक ,
नहीं जान पाया ,
जाने वे आवाजें ,
वहाँ तक पहुँच कर ,
बेअवाज क्यूँ हो जाती हैं .....?

रविवार, 26 जुलाई 2009

जाने क्यूँ , हर बार वो, इक नया पता देते हैं......





बस्तियां खाली करवाने को,वो,
अक्सर उनमें आग लगा देते हैं.....

उतनी तो दुश्मनी नहीं कि ,कत्ल कर दें मेरा ,
इसलिए वो रोज़ , जहर, बस जरा जरा देते हैं ......

मैंने कब कहा कि, गुनाह को उकसाया उसने ,
वे तो बस मेरे पापों को, थोडी सी हवा देते हैं....

वो जब करते हैं गुजारिश , घर अपने आने की,
जाने क्यूँ, हर बार, इक नया ही पता देते हैं......

मैं ठान लेता हूँ कई बार, अबके नहीं मानूंगा,
नयी अदा से वो, हर बार लुभा लेते हैं.......

जख्मों से अब दर्द नहीं होता, कोई टीस भी नहीं,
पर जाने क्यूँ जख्मों के निशाँ, रुला देते हैं......

जब भी जाता हूँ गाँव अपने, ऐसी होती है खातिर मेरी,
अपने ही घर में , मुझे, मेहमान बना देते हैं......

सिलसिला टूटता नहीं उनपर मेरे विश्वास का,
पुरानी को छोड़ , रोज़ इक नयी कहानी सुना देते हैं....
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