प्रचार खिडकी

बुधवार, 15 अगस्त 2018

इश्क की तैयारी


























रविवार, 30 जुलाई 2017

ख़्वाब करेंगे गुफ्तगू अब .....



 चंद बिखरे सिमटे से आखर , कुछ बेतरतीब उनींदी उंघती सी पंक्तियाँ









रविवार, 23 जुलाई 2017

बहुत गहरी हैं ये आँखें मेरी



चंद बिखरे सिमटे आखर , बेतरतीब ,बेलौस से , बात बेबात कहे लिखे गए , उन्हें यूं ही सहेज दिया है ........




दो दरखत एक शाख के , एक राजा की कुर्सी बनी दूसरी बुढापे की लाठी 







रविवार, 2 जुलाई 2017

घर मेरे भी ,बिटिया किलकने लगी है


अब नर्म धूप,
मेरे आँगन भी,
उतरने लगी है।
टिमटिमाते तारों की रौशनी,
और चाँद की ठंडक,
छत पर,
छिटकने लगी है।
पुरबिया पवनें,
खींच लाई हैं,
जो बदली , वो,
घुमड़ने लगी है।
दर्पर्ण मांज रहा है,
ख़ुद को,
आलमारी भी,
सँवरने लगी है ।
फूलों के खिलने में,
समय है,
कलियों पर ही,
तितलियाँ,
थिरकने लगी हैं।
शायद ख़बर,
हो गयी सबको,
घर मेरे भी, बिटिया,
किलकने लगी है.......

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

बहुत खराब लिखने बैठा हूँ मैं







बारूद की स्याही से , नया इंकलाब लिखने बैठा हूं मैं ,
सियासतदानों , तुम्हारा ही तो हिसाब लिखने बैठा हूं मैं
बहुत लिख लिया , शब्दों को सुंदर बना बना के ,
कसम से तुम्हारे लिए तो बहुत , खराब लिखने बैठा हूं मैं
टलता ही रहा है अब तक , आमना सामना हमारा ,
लेके सवालों की तुम्हारी सूची, जवाब लिखने बैठा हूं मैं
सपने देखूं , फ़िर साकार करूं उसे , इतनी फ़ुर्सत कहां ,
खुली आंखों से ही इक , ख्वाब लिखने बैठा हूं मैं ......
मुझे पता था कि बेईमानी कर ही बैठूंगा मैं ,अकेले में,
सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ...
 
जबसे सुना है कि उन्हें फ़ूलों से मुहब्बत है ,
खत के कोने पे रख के ,गुलाब , लिखने बैठा हूं मैं 
........

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

औरत : एक अंतहीन संघर्ष यात्रा

                                        औरत : एक अंतहीन संघर्ष यात्रा एक प्रकाशित आलेख
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