
मेरे विवाह के समय खींची गई पिताजी की तस्वीर
मुझे ये तो ठीक ठीक याद नहीं कि पिताजी के प्रति मेरा आकर्षण यकायक मेरे मन में आया था कि शुरू से ही था क्योंकि मेरी स्वर्गवासी माताजी बताया करती थीं कि बचपन में भी जब सो कर उठता था तो आमतौर से अलग मैं मां मां न करके पापा पापा करता हुआ उठता था । पिताजी का भी उन दिनों सबसे प्रिय काम होता था मेरे साथ खेलना कूदना । या शायद मैं उनकी देह पर हरी रंग की चमचमाती फ़ौजी वर्दी को देख कर उन जैसा बनने की चाहत पाल बैठा था , ये भी हो सकता है कि उन दिनों जब देखता था कि पिताजी हर क्षेत्र में हर मोर्चे पर अपने आपको बिल्कुल दृढता से रख देते थे , उनके लिए कोई अपना पराया नहीं था । उनके लिए कोई दिन रात की बंदिश भी नहीं थी , उनके लिए कोई भी काम असंभव नहीं हुआ करता था इसलिए कोशिश करना तो उनकी आदत थी ही ।
उनकी एक खास बात ,फ़ौजी दिनचर्या और उनके कार्यक्षेत्र में कभी कभी अनिवार्यता के अनुरूप मदिरा का सेवन , न सिर्फ़ सेवन बल्कि शायद एक आदत भी ......उससे भी कोसों दूर रहे , कभी लगा ही नहीं कि उन्हें कभी इसकी चाहत भी रही हो । या फ़िर वो फ़ुर्ती जो वो रात में अक्सर मोहल्ले में , कैंपस में आई किसी मुसीबत के समय दिखा जाया करते थी । उनकी जीवटता जो उन्होंने बांग्लादेश में लडाई में बुरी तरह घायल होने के बाद दिखाई और शरीर में चंद खून की बूंदें होने के बाद भी मां को ढांढस बंधाते हुए कहा कि ," जिंदगी जिंदादिली का नाम होता है , मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं "। नहीं जानता कि उनकी वो कौन सी बात थी या कौन सी आदतें थीं जो मुझे अक्सर ये कहने पर मजबूर करती थीं कि , "डैड, आई जस्ट वांट टू बी लाईक यू "। जब वे होते थी तो बस वे ही होते थे , उनका अनुशासन , दूसरों में उनका डर , उनकी हिम्मत , और सबसे बढकर रिस्क उठा जाने की आदत , सब कुछ एक आभामंडल जैसा था मेरे लिए ।
कभी कभी तो उनका अनुशासन बहुत ही कोफ़्त में डाल देता था , सोचते थे कि बताओ भला आप खुद फ़ौजी हैं तो हमें भी फ़ौजी बनाए दे रहे हैं । उनकी एक आदत से भी हम दोनों भाई उन दिनों परेशान रहते थे कि दीदी ही उनका बेटा थी असल में । बताओ पूरी दुनिया बेटा बेटा करते मर रही थी और वे अपने मित्रों से हमारी दीदी का परिचय करवाते हुए कहते थे , ये है मेरा सबसे बडा बेटा , बांकी के ये दोनों तो एक नंबर के शैतान हैं । और शायद यही वजह रही कि दीदी का अचानक यूं हमें छोड कर चले जाना उन दोनों से बर्दाश्त नहीं हुआ । मां ने पूरे बीस साल तक इस दुख को अपने भीतर झेला और वो भी चल दीं अपनी बेटी के पास ।
पिताजी यहां भी जीवट निकले , अब भी मेरे पास हैं, मेरे साथ , सोचने समझने की शक्ति अब नहीं रही उनमें । उनकी एक सिमटी हुई दुनिया है उनके पास । बीच बीच मे पत्नी और पुत्री को खोने का गम भी जोर मार देता है । मैं भरसक कोशिश करता हूं कि पिताजी को ये एहसास होता रहे कि अभी भी बहुत सारे बचे हुए हैं जिन्हें उनकी जरूरत है , बहुत जरूरत है । उनके साथ की , उनके स्नेह की , उनकी छाया की । अब मेरा बेटा और बेटी जब उन्हें तोतली जबान में दद्दा कहते हैं तो खुशी से उनकी पलकें कांपने लगती हैं । मैं अब भी कोशिश करता हूं कि उनके आदर्शों पर ही चलता जाऊं । जानता हूं कि उनकी बहुत सी बातें मेरे लिए मुमकिन नहीं , खासकर दूसरों के लिए उनके द्वारा किया गया त्याग और बदले में उनके द्वारा की गई उपेक्षा को देखने के बाद तो कतई नहीं । मगर लगता है कि आज जो भी मैं जैसा भी अपने आपको पाता हूं तो जरूर और नि:संदेह वो पिताजी के कारण ही उनके जीवन के कारण ही ।
जीवन चक्र को घूमते कहां देर लगती है । बेटा भी धीरे धीरे उन्हीं चरणों में पहुंच रहा है जहां मैं खुद को कभी पाता था । मैं लिखता पढता रहता हूं तो वो भी साथ बैठ कर कभी चित्रकारी तो कभी कुछ और पर हाथ आजमाता रहता है । आदतें सारी की सारी कुछ इस कदर उतर गई हैं उसमें कि कभी कभी तो अंदेशा होने लगता है कि मेरी छोटी सी जीरोक्स कौपी मेरे सामने ही घूम फ़िर रही है । और जब साथ बैठा अपनी कौपी में सुंदर अक्षर उकेर कर मुझे गर्व से दिखाता है तो उसकी आखें भी मानो कह रही होती हैं , " डैड , आई वांट टू बी जस्ट लाईक यू डैड !"
