काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
प्रचार खिडकी
बुधवार, 6 फ़रवरी 2008
सोमवार, 4 फ़रवरी 2008
जिन्दगी (एक कविता )
क्यों तन्हा ,
और,
वीरान है जिन्दगी॥
ना जाने,
किस गम से,
परेशान है जिन्दगी॥
साँसे तो हैं,
इस दिल में , पर,
बेजान है जिन्दगी॥
इतनी आबादियों के ,
बीच भी,
सुनसान है जिन्दगी॥
बीते और आने वाले ,
कल के बीच ,
वर्तमान है जिन्दगी॥
युगों युगों की दौड़ में,
चंद बरसों की,
मेहमान है जिन्दगी॥
प्रेम-द्वेष, सुख-दुःख,
हर फलसफे, हर एहसास की ,
पहचान है जिन्दगी॥
बहुत जाना , बहुत समझा,
लेकिन अब भी ,
अनजान है जिन्दगी॥
दोनो सच्चे पहलू हैं,
कभी दर्द का कतरा,
कभी मुस्कान है जिन्दगी॥
कहिये आप क्या कहते हैं जिन्दगी के बारे में.
और,
वीरान है जिन्दगी॥
ना जाने,
किस गम से,
परेशान है जिन्दगी॥
साँसे तो हैं,
इस दिल में , पर,
बेजान है जिन्दगी॥
इतनी आबादियों के ,
बीच भी,
सुनसान है जिन्दगी॥
बीते और आने वाले ,
कल के बीच ,
वर्तमान है जिन्दगी॥
युगों युगों की दौड़ में,
चंद बरसों की,
मेहमान है जिन्दगी॥
प्रेम-द्वेष, सुख-दुःख,
हर फलसफे, हर एहसास की ,
पहचान है जिन्दगी॥
बहुत जाना , बहुत समझा,
लेकिन अब भी ,
अनजान है जिन्दगी॥
दोनो सच्चे पहलू हैं,
कभी दर्द का कतरा,
कभी मुस्कान है जिन्दगी॥
कहिये आप क्या कहते हैं जिन्दगी के बारे में.
रविवार, 3 फ़रवरी 2008
शहरी होने की कीमत
कल ही गाँव से माँ का फोन आया, कहने लगी " बेटा दुर्गा पूजा गयी, छत पूजा भी हो गयी, मकर सक्रान्ति बीता, और बसंत पंचमी भी आने को है, और लगता नहीं है कि होली पर भी तेरी सूरत देख पाउंगी, तेरे शहरी होने की मैं और कितनी कीमत चुकाउंगी रे "।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
शनिवार, 2 फ़रवरी 2008
जाने क्यूँ (एक कविता )
जाने क्यूँ,
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
गुरुवार, 31 जनवरी 2008
अब साइमंड्स कटघरे में
अपने भज्जी मियां तो फालतू के आरोपों से बारी हो गए। फालतू के इसलिए क्योंकि ये कौन मान सकता है कि जो भारतीय खुद नस्लभेद का शिकार रहे हों वे खुद किसी पर नस्लभेदी टिप्पणी करेंगे। मगर यहाँ माजरा कुछ ज्यादा बढ़ गया है।
सुनने में आया है कि वानार्जगत ने अन्द्र्यु साइमंड्स को कटघरे में खडा करने का निर्णय लिया है। कल ही उन्होने साइमंड्स को पकड़ लिया और खूब खरी खोटी सुनाई॥
"क्यों बे, तुझे यदि भज्जी ने बन्दर कहा तो वो गाली कैसे हो गयी बे ? तूने अपनी शक्ल देखी है , पता ही नहीं चलता है कि तू कौन सा प्राणी है , नीचे चिद्दी सी दाढी , और सर पर ढेर सारी जता। और फिर तुम इंसान तो एक दुसरे को ना जाने कब से और ना जाने कितनी ही बार गधा , कुत्ता, बन्दर उल्लू, कहते आ रहे हो हमने तो आज तक बुरा नहीं माना। ये क्यों भूल गया कि तुम सब इंसा बन्दर की औलाद हो। ये अलग बात है कि अब तुम बन्दर रहे नहीं और इंसान बन नहीं पाए ।
लेकिन सर , वो नस्लभेदी तिप्नी थी। एंड्र्यू ने सफाई देनी चाही।
अबे चुप, कहे का नस्लभेद और कहे कि टिप्पणी । तुम लोग भी एक मैच जीतने के लिए क्या कया नाटक करते हो यार। अबे इससे अच्छा तो ये होता कि मैच फ़िक्सिंग कर लेते। बड़ा ही सेफ रास्ता है।
सुनने में आया है कि वानार्जगत ने अन्द्र्यु साइमंड्स को कटघरे में खडा करने का निर्णय लिया है। कल ही उन्होने साइमंड्स को पकड़ लिया और खूब खरी खोटी सुनाई॥
"क्यों बे, तुझे यदि भज्जी ने बन्दर कहा तो वो गाली कैसे हो गयी बे ? तूने अपनी शक्ल देखी है , पता ही नहीं चलता है कि तू कौन सा प्राणी है , नीचे चिद्दी सी दाढी , और सर पर ढेर सारी जता। और फिर तुम इंसान तो एक दुसरे को ना जाने कब से और ना जाने कितनी ही बार गधा , कुत्ता, बन्दर उल्लू, कहते आ रहे हो हमने तो आज तक बुरा नहीं माना। ये क्यों भूल गया कि तुम सब इंसा बन्दर की औलाद हो। ये अलग बात है कि अब तुम बन्दर रहे नहीं और इंसान बन नहीं पाए ।
लेकिन सर , वो नस्लभेदी तिप्नी थी। एंड्र्यू ने सफाई देनी चाही।
अबे चुप, कहे का नस्लभेद और कहे कि टिप्पणी । तुम लोग भी एक मैच जीतने के लिए क्या कया नाटक करते हो यार। अबे इससे अच्छा तो ये होता कि मैच फ़िक्सिंग कर लेते। बड़ा ही सेफ रास्ता है।
बुधवार, 30 जनवरी 2008
अब बने हम सुपर मार्केट , हम किडनी बेचते हैं
जैसे ही मैंने ये खबर देखी कि हमारे यहाँ पर कुछ बडे बिजनेस मैन पैदा हुए हैं जो यहाँ पर बहुत बडे पैमाने पर kidnee का अंतर राष्ट्रीय कारोबार करते हैं। मेरा मन ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गया। अजी चलती रहे दुनिया भर में mandee का दौर , होता रहे अमेरिका और इंग्लैंड का बेदा गद्क और चाहे कितनी ही बार हमारा दलाल स्ट्रीट डूब जाये , मगर मुझे पूरा यकीन हो गया है कि जब तक इस तरह के किडनी के दलाल हमारे यहाँ पर मौजूद हैं हम दुनिया भर के लिए सबसे बडे सुपर मार्केट बने rahenge। ama इससे badh kar भी कोई produkt हो saktaa है kisi देश के पास bechne के लिए। तो bhaiyaa काहे कि चिंता है phir , vyarth की है toubaa क्यों मचा रखी है भी लोगों।
वैसे भी हम तो शुरू से सबसे अनोखे उत्पाद बेचने के लिए मशहूर हैं भैया। देखिए बहुत साल पहले हमारे यहाँ से लोगों को ले जाकर बेचा जाता था videshon में मजदूरी करने के लिए , यानी हम अपने यहाँ के प्राणी बेचते थे। समय बदला और हम भी पढ़ लिख kar इन्तेल्लेजेंट हो गए तो हम कहाँ मानने वाले थे हमें अपना स्तातास बदला और हम अपना टैलेंट बेचने लगे। हमारी कद्रदानी देखिए कि हमें भी और हमारे टैलेंट को भी बिल्कुल ब्रांडेड उत्पाद की तरह खारेदा गया।
अजे, ये तो हुई इंपोर्ट और एक्सपोर्ट की बात । खरीदने बेचने में तो हमारा अपने देश में भी लाजवाब रेकोर्ड है। हम अपनी इमानदारी, खुद्दारी, अपना इमान , अपनी इज्ज़त यहाँ तक कि अब तो हमारे कई महान लोग अपनी बहन बहू और बेटियों तक को बेझिझक बेच रहे हैं। सबसे बडे फख्र की बात तो ये है कि इनके खरीदार भी हमें कहीं तलाशने की जरूरत नहीं होती वो भी हमारे अपने ही लोग हैं। और हाँ इसके लिए ना तो कोई सेंसेक्स है na ही किसी का कोई कोंत्रोल बिल्कुल फ्री मार्केट है भैया।
चलो भाई लोगों , अब अपनी , अपने अंगों की , अपने मान समान, इमान, अपमान, जिन्दगी और maut तक की कीमत लगाओ और मेज़ से बिजनेस करो । क्यों सही कहा ना.
वैसे भी हम तो शुरू से सबसे अनोखे उत्पाद बेचने के लिए मशहूर हैं भैया। देखिए बहुत साल पहले हमारे यहाँ से लोगों को ले जाकर बेचा जाता था videshon में मजदूरी करने के लिए , यानी हम अपने यहाँ के प्राणी बेचते थे। समय बदला और हम भी पढ़ लिख kar इन्तेल्लेजेंट हो गए तो हम कहाँ मानने वाले थे हमें अपना स्तातास बदला और हम अपना टैलेंट बेचने लगे। हमारी कद्रदानी देखिए कि हमें भी और हमारे टैलेंट को भी बिल्कुल ब्रांडेड उत्पाद की तरह खारेदा गया।
अजे, ये तो हुई इंपोर्ट और एक्सपोर्ट की बात । खरीदने बेचने में तो हमारा अपने देश में भी लाजवाब रेकोर्ड है। हम अपनी इमानदारी, खुद्दारी, अपना इमान , अपनी इज्ज़त यहाँ तक कि अब तो हमारे कई महान लोग अपनी बहन बहू और बेटियों तक को बेझिझक बेच रहे हैं। सबसे बडे फख्र की बात तो ये है कि इनके खरीदार भी हमें कहीं तलाशने की जरूरत नहीं होती वो भी हमारे अपने ही लोग हैं। और हाँ इसके लिए ना तो कोई सेंसेक्स है na ही किसी का कोई कोंत्रोल बिल्कुल फ्री मार्केट है भैया।
चलो भाई लोगों , अब अपनी , अपने अंगों की , अपने मान समान, इमान, अपमान, जिन्दगी और maut तक की कीमत लगाओ और मेज़ से बिजनेस करो । क्यों सही कहा ना.
मंगलवार, 29 जनवरी 2008
बर्ड फ़्लू पर मुर्गों की बैठक ( नहीं स्टैंड अप )
जैसे ही समाचारों में ये बात आयी कि भारत के कुछ क्षेत्रों में बर्ड फ़्लू फैलने की खबर है देश भर के मुर्गा मंदी के नेता मुर्गों ने आपात स्टैंड अप बुलाया। दरअसल मुर्गे बैठते नहीं हैं और ऐसी कारगिल वार वाली सिचुअशन पर तो बिल्कुल नहीं।
देखिए एक बार फिर पश्चिमी देशों ने हम देसी मुर्गों पर कोई रासायनिक टाईप का हमला किया है और शोर मचा दिया है कि हमें बर्ड फ़्लू हो गया है। मुर्गा मंत्री ने इतना ही कहा कि प्रश्नों की झाडी लग गयी।
सर , ये बर्ड फ़्लू क्या है, क्या ये भी कोई आई लव यू ईलूयु कि तरह का तो नहीं है, मगर सर आजकल मुर्गियाँ कहाँ रही प्यार करने के लिए वे तो बस अंडो की फक्तारी बन गयी हैं।
सर, पहली बात ये जो कुछ भी है बर्ड से रेलातेद है तो हम क्यों चिंता करें? हम तो मुर्गे है। आप ही बताइये , हमें बिर्ड्स में कौन गिनता है? बच्चों को हमारे फोटो दिखाओ तो पूछेंगे कि पापा इसका अफगानी ज्यादा बढिया बनेगा कि फ्री । मुझे तो लगता है हम अब मुर्गे भी नहीं है सिर्फ चिकेन रह गए हैं।
सर मुझे ये समझ में नहीं आता कि हमें ही बार बार क्यों घसीटा जाता है , अभे कुछ दिन पहले ही सेन साहब ने कुछ हेद्लेस चिकेन कह कर भी हमें ख़बरों में ला दिया था।
मुर्गा मंत्री बौखला गया । अरे चुप रहो यार , तुम सब,. देखो, जहाँ जहाँ तक मुझे पता चला है कि ये कोई बड़ी बीमारी है एड्स की तरह जो पश्चिमी देशों ने ही फैलाई है। जैसे आज तक ये पता नहीं चला कि एड्स बंदरों से इन्सान में कैसे घुस गया वैसे ही ठीक ठीक नहीं पता है कि बर्ड फ्लाई करते करते बर्ड फ़्लू कैसे हो गया। स्थिति चिंताजनक है इसलिए सरकार हमारे लिए पुल्स पोलियो अभियान टाईप की कोई चीज़ शुरू करने के साथ एम्स हॉस्पिटल से दोक्त्रोर्ण की टीम भेजने वाली है ।
नहीं , नहीं सर ये तो गड़बड़ है। सुना है कि पोलियो द्रोप्स पीने से नपुंसकता आ जाती है और सर एम्स के दोक्तोर्स तो आज कल छुरी, कैंची, तोलिया, कच्छा, कंघा और पता नहीं क्या कया मरीजों के पेट में छोड़ रहे हैं।
मुर्गा मंत्री कुदक कर बोला, चुप बे तूने कौन सी मर्दानगी दिखानी है जो पोलियो द्रोप्स नहीं पिएगा अंडे तो मुर्गियाँ अपने आप ही दे रही हैं। और रही दोक्तोरों की बात , तो यदि वे हमारे पेट में कुछ छोडेंगे तो देर सवेर ये उनके ही पेट में पहुंच जाएगा । समझे।
नहीं नहीं सर, कहकर सारी मुर्गा मंडली लड़ने लगी। कई झटक दिए गए और कई हलाल हो गए। अंत में जो बचा वो सिर्फ चिकेन था। हेड लेस चिकेन.
देखिए एक बार फिर पश्चिमी देशों ने हम देसी मुर्गों पर कोई रासायनिक टाईप का हमला किया है और शोर मचा दिया है कि हमें बर्ड फ़्लू हो गया है। मुर्गा मंत्री ने इतना ही कहा कि प्रश्नों की झाडी लग गयी।
सर , ये बर्ड फ़्लू क्या है, क्या ये भी कोई आई लव यू ईलूयु कि तरह का तो नहीं है, मगर सर आजकल मुर्गियाँ कहाँ रही प्यार करने के लिए वे तो बस अंडो की फक्तारी बन गयी हैं।
सर, पहली बात ये जो कुछ भी है बर्ड से रेलातेद है तो हम क्यों चिंता करें? हम तो मुर्गे है। आप ही बताइये , हमें बिर्ड्स में कौन गिनता है? बच्चों को हमारे फोटो दिखाओ तो पूछेंगे कि पापा इसका अफगानी ज्यादा बढिया बनेगा कि फ्री । मुझे तो लगता है हम अब मुर्गे भी नहीं है सिर्फ चिकेन रह गए हैं।
सर मुझे ये समझ में नहीं आता कि हमें ही बार बार क्यों घसीटा जाता है , अभे कुछ दिन पहले ही सेन साहब ने कुछ हेद्लेस चिकेन कह कर भी हमें ख़बरों में ला दिया था।
मुर्गा मंत्री बौखला गया । अरे चुप रहो यार , तुम सब,. देखो, जहाँ जहाँ तक मुझे पता चला है कि ये कोई बड़ी बीमारी है एड्स की तरह जो पश्चिमी देशों ने ही फैलाई है। जैसे आज तक ये पता नहीं चला कि एड्स बंदरों से इन्सान में कैसे घुस गया वैसे ही ठीक ठीक नहीं पता है कि बर्ड फ्लाई करते करते बर्ड फ़्लू कैसे हो गया। स्थिति चिंताजनक है इसलिए सरकार हमारे लिए पुल्स पोलियो अभियान टाईप की कोई चीज़ शुरू करने के साथ एम्स हॉस्पिटल से दोक्त्रोर्ण की टीम भेजने वाली है ।
नहीं , नहीं सर ये तो गड़बड़ है। सुना है कि पोलियो द्रोप्स पीने से नपुंसकता आ जाती है और सर एम्स के दोक्तोर्स तो आज कल छुरी, कैंची, तोलिया, कच्छा, कंघा और पता नहीं क्या कया मरीजों के पेट में छोड़ रहे हैं।
मुर्गा मंत्री कुदक कर बोला, चुप बे तूने कौन सी मर्दानगी दिखानी है जो पोलियो द्रोप्स नहीं पिएगा अंडे तो मुर्गियाँ अपने आप ही दे रही हैं। और रही दोक्तोरों की बात , तो यदि वे हमारे पेट में कुछ छोडेंगे तो देर सवेर ये उनके ही पेट में पहुंच जाएगा । समझे।
नहीं नहीं सर, कहकर सारी मुर्गा मंडली लड़ने लगी। कई झटक दिए गए और कई हलाल हो गए। अंत में जो बचा वो सिर्फ चिकेन था। हेड लेस चिकेन.
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