अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।
बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥
वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥
कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।
मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........
प्रचार खिडकी
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008
तन्हाइयां बोलती हैं
अभी मन और मष्तिष्क ने रफ़्तार नहीं पकडी है, सो फ़िर कुछ हल्का फुल्का :-
दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं॥
परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं॥
मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं॥
सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं॥
कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.
दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं॥
परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं॥
मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं॥
सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं॥
कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.
गुरुवार, 25 दिसंबर 2008
बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के
आज लगभग डेढ़ महीने बाद ब्लॉग पर लौटा हूँ, पिछले दिनों के लिए सिर्फ़ इतना की वे मेरी जिंदगी के कुछ बेहद कठिन दिनों में से कुछ दिन रहे, मन में कुछ भी नहीं हैं न ही मस्तिष्क में इसलिए कुछ हलकी फुलकी पंक्तियाँ आपको पढ़वाता हूँ जो मैंने कहीं बहुत पहले पढी थी, यदि मेरी याददाश्त ठीक है तो लेखिका का नाम था , सुश्री रीता यादव।:-
बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के इस कदर,
अपना कोई बनना ही गंवारा नहीं करता॥
पागल भी नहीं लोग की न माने नसीहत,
जो मान ले गलती वो दोबारा नहीं करता॥
अपने लिए तो जीते हैं , मरते हैं सभी लोग,
औरों के जख्म कोई दुलारा नहीं करता॥
जाते हैं बिखर आज, गुलिश्ते बहार के,
जिनको कोई माली भी संवारा नहीं करता॥
ऐसे तो मुकद्दर को कोई न बदल सका,
फ़िर भी सिकंदर है , जो हारा नहीं करता॥
तूफानों से लड़ के जिन्हें मिल जाए किनारा,
वो ही कभी औरों को पुकारा नहीं करता॥
तारे भी तोड़ लाने का जो रखता है जिगर,
वो शख्स फटेहाल, गुजारा नहीं करता॥
बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के इस कदर,
अपना कोई बनना ही गंवारा नहीं करता॥
पागल भी नहीं लोग की न माने नसीहत,
जो मान ले गलती वो दोबारा नहीं करता॥
अपने लिए तो जीते हैं , मरते हैं सभी लोग,
औरों के जख्म कोई दुलारा नहीं करता॥
जाते हैं बिखर आज, गुलिश्ते बहार के,
जिनको कोई माली भी संवारा नहीं करता॥
ऐसे तो मुकद्दर को कोई न बदल सका,
फ़िर भी सिकंदर है , जो हारा नहीं करता॥
तूफानों से लड़ के जिन्हें मिल जाए किनारा,
वो ही कभी औरों को पुकारा नहीं करता॥
तारे भी तोड़ लाने का जो रखता है जिगर,
वो शख्स फटेहाल, गुजारा नहीं करता॥
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
पांडे V/S ठाकरे ( राजनीति का २०-२० )
अब क्षेत्रवाद का मैच ये,
और भी रोचक होगा,
नारे-दंगे, लाठी- डंडे,
सभी कहेंगे , बाप रे॥
मंजे हुए दोनों कप्तान,
इक पांडे, इक ठाकरे॥
अब जलने को तैयार रहो,
तिल तिल कर हर बार मरो,
इक डालेगा पैट्रोल, दूजा,
लगवाएगा आग रे ॥
पांडे बोले , जो बिदके,
अबकी उलटा सीधा,
तो न ताज रहें न राज रे॥
भागी सेना, पहुँची थाने,
डर और चिंता, लगी सताने,
गाने लगे, सब,
सुरक्षा का राग रे॥
गरीब भला ये क्या जाने,
आया था दो रोटी कमाने,
पीछे पड़ा , बोली-भाषा का नाग रे॥
चलिए , भगवान् करे पांडे ठाकरे टीम के इस मैच में किसी निर्दोष का विकेट न गिरे, मगर मुझे डर है की ऐसा ही होगा...
और भी रोचक होगा,
नारे-दंगे, लाठी- डंडे,
सभी कहेंगे , बाप रे॥
मंजे हुए दोनों कप्तान,
इक पांडे, इक ठाकरे॥
अब जलने को तैयार रहो,
तिल तिल कर हर बार मरो,
इक डालेगा पैट्रोल, दूजा,
लगवाएगा आग रे ॥
पांडे बोले , जो बिदके,
अबकी उलटा सीधा,
तो न ताज रहें न राज रे॥
भागी सेना, पहुँची थाने,
डर और चिंता, लगी सताने,
गाने लगे, सब,
सुरक्षा का राग रे॥
गरीब भला ये क्या जाने,
आया था दो रोटी कमाने,
पीछे पड़ा , बोली-भाषा का नाग रे॥
चलिए , भगवान् करे पांडे ठाकरे टीम के इस मैच में किसी निर्दोष का विकेट न गिरे, मगर मुझे डर है की ऐसा ही होगा...
रविवार, 9 नवंबर 2008
दोस्त परेशान है , बताइए क्या करे
जब कोई आपके आसपार परेशान या दुखी हो तो जाहिर है की उसके प्रभाव से आप भी बच नहीं सकते, यदि आप सचमुच इंसान हैं तो , जरूर ही। बातों बातों में ही दोस्त से पता चल की आजकल वो बेहद परेशान चल रहा है , उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा की क्या करे और कैसे इस परेशानी से निकले , हलाँकि मैंने उसे सभी मानवीय और कानूनी उपाय और रास्ते भी बता दिए हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की वो इसमें से बाहर आ पाया है, जब मैं भी नहीं जानता कि, उसे कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए, इश्वर करे उसे ये न पता चले कि मैंने उसकी समस्या यहाँ रख दी।
दरअसल कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में गों से शहर आया, खूब भाग दौड़ के बाद एक अच्छी सी नौकरी भी मिल गयी, और किस्मत से अच्छी सी छोकरी भी, जी हाँ अपने दोस्त को या उनकी धर्मपत्नी जी को प्यार हो गया, परिणाम ये कि दोनों अलग क्षेत्र, अलग भाषी, और अलग संस्कृति के बावजूद, बहुत से विरोधों के बावजूद परिणय सूत्र में बाँध गए.दोनों की आपसी समझ भी अच्छी ही है, मगर आजकल स्थिति कुछ ठीक नहीं है। दोस्त के बूढे माँ बाप, जब कुछ दिनों के लिए गाओं से यहाँ शहर में अपने बेटे और बहू के पास रहने आए तो दिक्कत शुरू हो गयी। पता नहीं कौन सही है कौन ग़लत, किसका व्यवहार ठीक है किसका नहीं, दोनों के पास अपने अपने तर्क हैं, और एक लिहाज से दोनों ही कभी ठीक तो कभी ग़लत होते हैं। अब मुश्किल ये है कि दोनों ही एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, नहीं सहायद मैं ग़लत कह गया, दरअसल हमारी भाभी जी को दोस्त की माताजी से बिल्कुल ही खुन्नस हो गयी है, और इसके लिए उनके पास शायद लाखों तर्क हैं। दोस्त ने प्यार से तकरार से, मान मनौव्वल से , रूठ कर और सख्ती से भी प्रयास कर देख लिया, मगर अफ़सोस कोई बात नहीं बनी। एक बार तो ऐसा समय आ गया कि दोस्त ने माँ बाप के लिए सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लिया, मगर फ़िर अपने बच्चों के कारण ऐसा भी नहीं कर पाया।
अब हालात ये हैं कि वो कशमकश में फंसा हुआ , बेचारा सबसे पूछ रहा है कि क्या करे, माँ बाप को इस बुढापे में छोड़ दे या फ़िर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दे।
मुझे तो सिर्फ़ एक ही रास्ता सूझा , वो ये कि , नहीं दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकता इस लिए जब तक कर सकता है कोशिश करता रह और अपना कर्म भी , बिना कुछ सोचे और समझे।
अब ये बताइए, विशेषकर महिला समाज से तो जरूर ही जानना चाहूंगा कि दोनों ही औरतें उसकी जिम्मेदारी हैं उसका जीवन भी और दायित्व भी, तो ऐसे में वो क्या करे ..........?
दरअसल कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में गों से शहर आया, खूब भाग दौड़ के बाद एक अच्छी सी नौकरी भी मिल गयी, और किस्मत से अच्छी सी छोकरी भी, जी हाँ अपने दोस्त को या उनकी धर्मपत्नी जी को प्यार हो गया, परिणाम ये कि दोनों अलग क्षेत्र, अलग भाषी, और अलग संस्कृति के बावजूद, बहुत से विरोधों के बावजूद परिणय सूत्र में बाँध गए.दोनों की आपसी समझ भी अच्छी ही है, मगर आजकल स्थिति कुछ ठीक नहीं है। दोस्त के बूढे माँ बाप, जब कुछ दिनों के लिए गाओं से यहाँ शहर में अपने बेटे और बहू के पास रहने आए तो दिक्कत शुरू हो गयी। पता नहीं कौन सही है कौन ग़लत, किसका व्यवहार ठीक है किसका नहीं, दोनों के पास अपने अपने तर्क हैं, और एक लिहाज से दोनों ही कभी ठीक तो कभी ग़लत होते हैं। अब मुश्किल ये है कि दोनों ही एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, नहीं सहायद मैं ग़लत कह गया, दरअसल हमारी भाभी जी को दोस्त की माताजी से बिल्कुल ही खुन्नस हो गयी है, और इसके लिए उनके पास शायद लाखों तर्क हैं। दोस्त ने प्यार से तकरार से, मान मनौव्वल से , रूठ कर और सख्ती से भी प्रयास कर देख लिया, मगर अफ़सोस कोई बात नहीं बनी। एक बार तो ऐसा समय आ गया कि दोस्त ने माँ बाप के लिए सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लिया, मगर फ़िर अपने बच्चों के कारण ऐसा भी नहीं कर पाया।
अब हालात ये हैं कि वो कशमकश में फंसा हुआ , बेचारा सबसे पूछ रहा है कि क्या करे, माँ बाप को इस बुढापे में छोड़ दे या फ़िर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दे।
मुझे तो सिर्फ़ एक ही रास्ता सूझा , वो ये कि , नहीं दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकता इस लिए जब तक कर सकता है कोशिश करता रह और अपना कर्म भी , बिना कुछ सोचे और समझे।
अब ये बताइए, विशेषकर महिला समाज से तो जरूर ही जानना चाहूंगा कि दोनों ही औरतें उसकी जिम्मेदारी हैं उसका जीवन भी और दायित्व भी, तो ऐसे में वो क्या करे ..........?
शनिवार, 8 नवंबर 2008
औरत एक अंतहीन संघर्ष यात्रा

अपनी पिछले पोस्ट में नारी ने मुझे शिकायत की , कि मैंने ब्लॉग्गिंग पर लिखे और छपे अपने विस्तृत आलेख में महिला ब्लोग्गेर्स के लिए ज्यादा नहीं लिखा, हलाँकि मैंने उन्हें आश्वाशन दे दिया है कि जल्दी ही मैं उनकी ये इच्छा भी पूरी कर दूंगा, मगर फिलहाल मुझे लगा कि शायद ये उपायुक्त अवसर होगा कि महिला जीवन पर मेरा एक आलेख को मैं यहाँ पर छाप सकूं।
* छपे हुए आलेख को पढने के लिए उस पर क्लिक करें.
शुक्रवार, 7 नवंबर 2008
ब्लॉग्गिंग पर मारा आलेख २९ समाचार पत्रों में छपा


जैसा की बहुत पहले ही सोचा था कि जब ब्लॉग्गिंग हो ही रही है तो , इसके बारे में अन्यत्र भी चर्चा होनी चाहिए, खासकर उन माध्यमों में तो जरूर ही जहाँ मैं सक्रिय हूँ, पहले रेडियो, फ़िर प्रिंट में भी सोचा था, आखिरकार ब्लॉग्गिंग के विषय में पहला आलेख फीचर के माध्यम से अब तक २९ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपा। सबसे अच्छी बात ये रही कि ये आलेख, हैदराबाद, श्रीगंगानगर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार आदि कई राज्यों में छपा। मेरी कोशिश तो यही रही कि सब कुछ लिख सकूँ , पर जाहिर है कि एक ही पोस्ट में ऐसा सम्भव नहीं था, इसलिए फैसला किया है कि ,जल्द ही एक नियमित स्तम्भ , "ब्लॉग बातें " विभ्हिन्न समाचार पत्रों में दिखाई देगा, योजना को मूर्त रूप देने में लगा हूँ, आप लोगों का साथ रहा तो जल्दी ही और भी कुछ सामने आयेगा.
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