जाने तेरी इन काली,मोटी,गहरी, आखों में,
कभी क्यों मेरे सपने नहीं आते,
तू तो ग़ैर है फिर क्यों करूं तुझसे शिक़ायत,
जब पास मेरे, मेरे अपने नहीं आते।
उन्हें मालूम है कि हर बार में ही माँग लूँगा माफी ,
इसलिए वो कभी मुझसे लड़ने नहीं आते।
जो शमा को पड जाये पता,कि उनकी रौशनी से,
परवाने लिपट के देते हैं जान, वे कभी जलने नहीं आते।
जबसे पता चला है कि यूं जान देने वालों को सुकून नहीं मिलता,
हम कोशिश तो करते हैं पर कभी मरने नहीं पाते।
जो कभी किसी ने पूछ लिया होता, मुझसे इस कलमज़ोरी का राज़,
खुदा कसम हम कभी यूं लिखने नहीं पाते।
पर किसी ने कभी पूछा नहीं इसलिए लिखे चले जा रहे हैं .
प्रचार खिडकी
रविवार, 17 जनवरी 2010
जब पास मेरे ........मेरे अपने नहीं आते !!!
शनिवार, 16 जनवरी 2010
ताज्जुब है कि, ये , दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
शहर की हर गली मैं, एक कोठी,
और इक झुग्गी मिलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
लखटकिया , फ़टफ़टिया, और सायकल,
लालबत्ती पर सारी रुकती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
घर के एक कमरे से कातिल,
दूसरे से लाश निकलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
प्रेम , दोस्ती, रिश्ते की परिभाषा,
हर रोज़ बदलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
गिरने के डर से ही, मैं नहीं दौडा,
वो रोज़ गिरती है, वो रोज़ संभलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
मैं समझ नहीं पाता, कैसे मेरे अन्दर,
प्यार भी पलता है, नफरत भी पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
बेटा जिस कोख में मारे किलकारी,
बेटी के लिए उसमें मौत ही पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥
हाँ , और कमाल की बात है कि ये दुनिया तो फ़िर भी चलती ही रहेगी ............
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
जाने क्यूं ...????

मैं अब तक ,
ये समझ नहीं पाया कि ,
जब हमारे पास हैं
कितनी उंगलियां ,
जिन्हें मिला कर ,
हम हाथ बना लेते हैं ,
हमारी तो ,
आदत है कि ,
हम तो तस्वीरों से भी ,
हाथ मिला लेते हैं ,
तो फ़िर जाने क्यों ,
अक्सर लोग ,
हमपे अपनी ,बस ,
एक उंगली उठा देते हैं ॥
क्यूं यार क्यूं ......?????????.....मैं सोच रहा हूं ..... ॥
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
जो मौन रहे , आखिर समय,, क्यों लिखेगा उनका अपराध ?
जो मौन रहे , आखिर समय,
क्यों लिखेगा उनका अपराध ?
क्यों यही विकल्प कि बनो, ग्राह्य,
या नहीं तो बन जाओ व्याध ॥
क्यों करूं व्यर्थ उर्जा अपनी,
क्यों रहूं न मैं बस मौन साध ?
हर जगह ही तो मुखर ही हूं ,
आरोपी किनका, बस एक आध ?
हो यदि तुम मुझसे और मैं तुमसा,
तो क्यों समझा मुझको अपवाद ??
अपने तूणीरों से निकाल रहे हैं विषबाण,
और रहे नित नए जो निशाने साध ॥
मुझसे पहले निश्चित ही ,
समय लिखेगा उनका अपराध,
मैं मौन रहूं ,या रहूं मुखर ,
मेरी शब्द यात्रा अवश्य चलेगी निर्बाध॥
सोमवार, 11 जनवरी 2010
सपनो को फ्रिज में रख छोड़ा है
मैंने सपने देखना,
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,लपेट कर,फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
शनिवार, 9 जनवरी 2010
होठों को मना लूंगा , पर आखों का क्या
होंठो को मना लूंगा मैं,वे मान भी जाएंगे,हमेशा की तरह,शिकायत को भी ,नहीं खुलेगें ,और मौन रहेंगे,एक दूसरे को ,जकडे हुए जबरन ,इन आखों का,क्या ये तो ,पलक झपकते ही ,सब देख लेती हैं ,और जो बंद ,हो भी जाएं तो ,जाते जाते सब ,कह जाती हैं ,मस्तिष्क को ,जिसके बंद होने पर ,सुना है कि,इंसान मर जाता है ॥
बुधवार, 6 जनवरी 2010
अब कैसे पास करें औडीशन ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )
अब कैसे पास करें औडीशन ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )
चित्र को बडा करके पढने के लिए उस पर चटका लगाएं
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