प्रचार खिडकी

बुधवार, 31 मार्च 2010

मां ............

मेरी मां

माँ , तेरी गोद मुझे,
मेरे अनमोल,
होने का,
एहसास कराती है॥

माँ, तेरी हिम्मत,
मुझको,
जग जीतने का,
विश्वास दिलाती है॥

माँ, तेरी सीख,
मुझे ,
आदमी से,
इंसान बनाती है॥

माँ, तेरी डाँट,
मुझे, नित नयी,
राह दिखाती है॥

माँ, तेरी सूरत,
मुझे मेरी,
पहचान बताती है॥

माँ, तेरी पूजा,
मेरा, हर,
पाप मिटाती है॥

माँ तेरी लोरी,
अब भी, मीठी ,
नींद सुलाती है॥

माँ , तेरी याद,
मुझे,
बहुत रुलाती है॥
 

ये पंक्तियां तब लिखी थी जब मां मेरे पास थी , मेरे साथ थी .........जाने आज क्यों बार बार मां की बहुत याद आई , और मैं बाहर निकल कर तारों में उन्हें ढूंढता रहा ..........

सोमवार, 29 मार्च 2010

पत्र पत्रिकाओं के लिए ,ब्लोग पोस्टों पर आधारित मेरा साप्ताहिक स्तंभ "ब्लोग बातें" शुरू



पिछले काफ़ी समय से विचार करते करते आखिरकार आज जाकर हिंदी ब्लोग की पोस्टों पर आधारित और विभिन्न समाचार पत्रों के लिए मेरा नया कालम " ब्लोग बातें " शुरू हो ही गया । ये विचार तो काफ़ी पहले से मन में आ रहा था मगर हर बार कुछ अलग अलग कारणों से और कुछ अपने आलस्य के कारण योजना टलती जा रही थी । मगर अब जाकर ये सुनिश्चित हो ही गया है कि सोमवार के सोमवार मेरे द्वारा एक स्तंभ जो कि सप्ताह भर में किसी एक विषय या किसी एक खास मुद्दे के इर्दगिर्द लिखी गई पोस्टों का संकलन और विश्च्लेषण करता हुआ होगा । और बहुत जल्दी ही आपको उसकी छपी हुई प्रति ब्लोग औन प्रिंट पर देखने को मिलेगी । मेरा प्रयास ये होगा कि उन सभी ब्लोग्स को इसकी सूचना भी प्रेषित करूं ।

      यहां एक दुविधा मन में जरूर उठ रही है । जैसाकि पिछले दिनों इस बात पर कहीं कहीं पर आपत्ति उठती देखी कि समाचार पत्र बिना इजाजत के ब्लोग पोस्ट्स से सामग्री उठा रहे हैं जो अनुचित है । तो इसके लिए मैं अभी ही स्पष्ट कर दूं कि मेरा कार्य कोशिश सिर्फ़ ये होगी कि अतंरजाल पर सप्ताह भर के दौरान , ब्लोग्गर्स ने क्या क्या लिखा , क्या क्या बहस हुई आदि आदि । इसमें न सिर्फ़ उन ब्लोग पोस्ट्स का जिक्र होगा बल्कि उनके ब्लोग्स का पता भी बाकायदा दिया जाएगा । मुझे लगता है कि हिंदी ब्लोग्स से आम पाठकों का परिचय कराने के लिए ये बहुत बढिया विचार होगा । एक बात और यदि आपको लगता है कि आपकी पोस्ट आम पाठकों की पहुंच में भी आनी चाहिए तो मुझे मेरे मेल पते पर बेझिझक  बताएं । उम्मीद है कि आपका साथ और स्नेह मुझे अपने इस नए प्रयास में भी मिलता रहेगा ।

शनिवार, 27 मार्च 2010

बुधवार, 24 मार्च 2010

यही दस्तूर है मकानों का








वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा

कहीं  पढ थीं ये पंक्तियां ............याद रह गईं ॥

मंगलवार, 23 मार्च 2010

२३ मार्च को कुछ ख़ास है क्या ???? हैप्पी शहीद डे यार !

देश के तीन सपूत जिन्हें आज देश भुला बैठा है
पापा, आज २३ मार्च को कुछ ख़ास है क्या ?

हाँ बेटा, तुम्हें नहीं पता , आज शहीद दिवस है। आज ही के दिन तो हमारे आजादी के कुछ दीवाने हँसते हँसते अंग्रेजों के फांसी के फंदे को फूल की माला की तरह गले में लपेट कर झूल गए थे। तुम्हें नहीं पता ये।

लेकिन पापा यदि ये इतना ख़ास है तो फ़िर चारों तरफ़ इसकी बात होनी चाहिए थी न, जब वैलेंताईन डे आता है तो उसके कितने पहले से ही हर तरफ़ उसकी चर्चा और खबरें रहती हैं , तो मैं क्या ये मानू की वैलेंताईन डे इस शहीद दिवस से ज्यादा महत्वपूर्ण है। और उस वैलेंताईन डे को मनाने और विरोध करने वालों की भी कितनी बातें होने लगती हैं, अब तो हम बच्चों के भी पता है उसके बारे में।

अरे बेटा इस शहीद दिवस को जब कोई मनाने को ही तैयार नहीं है तो इस बेचारे दिवस का विरोध करने की बात कहाँ से होगी। अच्छा तुम ये बताओ तुम शहीद तो जानते हो न क्या होता है।

हाँ पापा वे लोग जो अब भी, (आज जब समाज में बहुत कम ही लोग ऐसे हैं तो अपने बारे में सोचने के अलावा भी कुछ सोचते और करते हैं ) अपने बारे में अपने बाल बच्चों और अपने परिवार के बारे में न सोच कर सिर्फ़ देश के बारे में सोचते हैं। न सिर्फ़ सोचते हैं बल्कि अपना तन मन, प्राण सब कुछ देश पर न्योछावर कर देते हैं। और इस देश के लोग कुछ दिनों बाद उनका नाम तक भूल जाते हैं। सरकार उनके नाम पर कभी पेट्रोल पम्प घोटाला तो कभी कोई और घोटाला करती रहती है। उन्हें ही शहीद कहा जाता है।

खैर , वो छोडिये पापा आप ये बताइए, की उन शहीदों को फांसी पर क्यूँ टांगा था और किसने टांगा था।
अरे बेटा उस वक्त अंग्रेजों का राज था, हमारे वे बांके लोग जो दीवानों की तरह देश को आजाद करवाने के लिए सर पर कफ़न बाँध कर घूम रहे थे उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। जब अंगरेजी हुकूमत उनसे बुरी तरह डर गयी तो उन्होंने उन क्रांतिकारियों को पकड़ कर फांसी दे दी.

बेटा आश्चर्य में डूब कर बोला, अच्छा पापा बताओ ये क्या बात हुई भला। मैं सोच रहा हूँ की यदि उस वक्त यही अभी वाली सरकार होती तो क्या उन्हें कोई फांसी दे सकता था , पर हाँ दे भी सकता था यदि उन्हें फांसी से बचाया जा सकता था तो उसकी एक ही सूरत थी की वे भी आतंकवादी होते, तब जरूर ही हमारी सरकार उन्हें कुछ नहीं कहती।


नहीं बेटे , यदि वे आज जीवित होते तो ख़ुद ही फांसी के फंदे में झूल गए होते । और इस तरह मैंने और मेरे बेटे ने शहीद दिवस मन लिया.

बुधवार, 17 मार्च 2010

व्रत आसान है रखना क्या ( एक लघु कथा ..या पता नहीं क्या )



"सुनो जी कल से नवरात्रि शुरू हो रही है , मुझे बहुत सी तैयारियां करनी हैं । आप तो जानते हैं कि मैं पिछले कई सालों से श्रद्धापूर्वक सारे व्रत रखती हूं। ये लो लिस्ट और बाजार से व्रत के लिए सारा सामान ले आओ

पांच किलो फ़ल ...अभी फ़िलहाल इतना ही बांकी बाद में आते रहेंगे .. 
दस किलो आलू...ओह व्रत में आलू न हों तो ....कैसे चल सकता था काम  
दो किलो देसी घी ...सुनो घी चैक करके लाना ..बढिया हो एकदम खालिस  
आलू चिप्स के पैकेट...चिप्स के पैकेटों का भी बहुत सहारा हो जाता है
           जूस के दो बडे डब्बे ...ब्रत में कमजोरी महसूस न हो इसके लिए तो जूस जरूरी है

देखो न और भी कुछ याद था ..खैर छोडो ..इसके साथ थोडी सी पूजा सामग्री भी ले आना । और हां कल से आपको ज्यादा हाथ बंटाना होगा ....जाओ जल्दी निकलो ...ओह ब्रत इतने आसान नहीं होते रखने ...."श्रीमती जी ने अपने श्रीमान जी से कहा ।

श्रीमान जी सोच रहे थे ": हां सच कहा है व्रत इतने आसान नहीं होते ...इतनी महंगाई में ...तो खाते पीते ही ठीक है ॥




मंगलवार, 16 मार्च 2010

एक प्याली चाय


एक प्याली चाय,
अक्सर मेरे,
भोर के सपनों को तोड़,
मेरी अर्धांगिनी,
के स्नेहिल यथार्थ की,
अनुभूति कराती है॥

एक प्याली चाय,
अक्सर,
बचाती है,
मेरा मान, जब,
असमय और अचानक,
आ जाता है,
घर कोई॥

एक प्याली चाय,
अक्सर,
बन जाती है,
बहाना,
हम कुछ ,
दोस्तों के,
मिल बैठ,
गप्पें हांकने का..

एक प्याली चाय,
अक्सर ,
देती है,
साथ मेरा,
रेलगाडी के,
बर्थ पर भी..

एक प्याली चाय,
अक्सर मुझे,
खींच ले जाती है,
राधे की,
छोटी दूकान पर,
जहाँ मिल जाता है,
एक अखबार भी पढने को॥

एक प्याली चाय,
कितना अलग अलग,
स्वाद देती है,
सर्दी में, गरमी में,
और रिमझिम ,
बरसात में भी॥

एक प्याली चाय,
को थामा हुआ,
है मैंने,या की,
उसने ही ,
थाम रखी है,
मेरी जिंदगी,
मैं अक्सर सोचता हूँ ......

अक्सर चाय पीते हुए ये पंक्तियां मेरे मन में कौंधती हैं , पहले भी शायद कही थी ......आज फ़िर चाय पी ...तो फ़िर कहने का मन किया ............और आपका ...??
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