प्रचार खिडकी

शनिवार, 21 मई 2011

सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ......




कवि जी पुराने ही हैं ..



बारूद की स्याही से , नया इंकलाब लिखने बैठा हूं मैं , 
सियासतदानों , तुम्हारा ही तो हिसाब लिखने बैठा हूं मैं 


बहुत लिख लिया , शब्दों को सुंदर बना बना के , 
कसम से तुम्हारे लिए तो बहुत , खराब लिखने बैठा हूं मैं 


टलता ही रहा है अब तक , आमना सामना हमारा ,
लेके सवालों की तुम्हारी सूची, जवाब लिखने बैठा हूं मैं 


सपने देखूं , फ़िर साकार करूं उसे , इतनी फ़ुर्सत कहां ,
खुली आंखों से ही इक , ख्वाब लिखने बैठा हूं मैं ......


मुझे पता था कि बेईमानी कर ही बैठूंगा मैं ,अकेले में,
सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ...


जबसे सुना है कि उन्हें फ़ूलों से मुहब्बत है , 
खत के कोने पे रख के ,गुलाब , लिखने बैठा हूं मैं 



शुक्रवार, 20 मई 2011

अब, खतों का मेरे , कोई जवाब नहीं देता.....


कवि जी , इन कविताई पोज़



हां ,बदल ही गया होगा दस्तूर जमाने का ,
अब ,खतों का मेरे , कोई जवाब नहीं देता ॥


सयाने हुए हैं सारे , अब जरूरत नहीं होती,
यही वजह है कि , तोहफ़े मे अब कोई किताब नहीं देता ॥


अब कहां , कशिश बची है मोहब्बत की ,
किताबों में रखने को , कोई अब गुलाब नहीं देता ॥


दूसरों की खामियां देखते , उम्र गुजर जाती है ,
अपने गुनाहों का , खुद कोई क्यों हिसाब नहीं देता ॥


दुश्मन ही है वो , कैसी पडोसी मान लें ,
जो होता पडोसी , तो हर साल एक नया "कसाब " नहीं देता ॥


हर कोई दिखाता है रुतबा अपनी पहचान और ओहदे का
 सच्चा और ईमानदार ही बस , अपना रुआब नहीं देता ॥


मंगलवार, 17 मई 2011

सॉरी ! नो क्वेश्चन ऑफ़ इकोनोमिक्स प्लीज़


पापा जी इकोनोमिक्स वाले






खबरी लाल : पीएम साहब ! पेट्रोल की कीमत फ़िर बढा दी है सरकार ने , क्या आपको अब भी नहीं लगता कि महंगाई आसमान छू रही है । जनता त्रस्त से पस्त वाली स्थिति की ओर अग्रस है और आप शाश्वत रूप से मस्त वाली कटेगरी में फ़िट हो गए हैं ..इस बार पेट्रोल की कीमत आपने पांच रुपए बढा दी , सर जी ..पिछले कुछ महीनों में आपने छब्बीस रुपए तक बढा दिया है ..आपको पता है ..

पापा जी इकोनोमिक्स वाले : सॉरी ! नो क्वेश्चन ऑफ़ इकोनोमिक्स प्लीज़
खबरी लाल : अच्छा सर , किसानों की समस्या तो सुना है कि आप तक पहुंच गई , जी..नहीं नहीं सर किसान की समस्या ..कसाब की समस्या नहीं ..किसान की समस्या ..देश के किसान की समस्या तो आप तक पहुंच गई है न ..जी हां हां कसाब को तो आपकी सरकार समस्या मानती ही नहीं है ..सर अभी भट्टा परसौल में ..इतने किसानों की जानें चली गई ...बाबा ......नहीं सर ..बाबा से मेरा तात्पर्य बाबा रामदेव नहीं है ...सर बाबा बोले तो राहुल बाबा ..तो खुद फ़टाक से फ़टफ़टिया पर लिफ़्ट लेकर पहुंच गए ..भट्टा में बहिन जी का भट्टा बैठाने के लिए किंतु बहिन जी दन्न से बरेली का बांस कर दिया ..बाबा निकल लिए .तो सर आपको पता है कि किसानों के मरने का आंकडा हर साल उन्नीस प्रतिशत बढ

पापा जी इकोनिमिक्स वाले : सॉरी ! नो क्वेश्चन ऑफ़ इकोनोमिक्स प्लीज़

खबरी लाल : लानत है , अब इसमें भी इकोनोमिक्स ही था ..अच्छा चलिए इसको भी जाने दीजीए ..सर राष्ट्रमंडल  खेल को अब लोग भ्रष्टमंडल खेल कहने लगे हैं ..सर उसमें तो सुना है कि कलमाडी जी ने उतना कमा लिया जितना कि ललित मोदी भी न कमा सके थे ..क्रिकेट प्लेयर्स को चीयर लीडर्स में बदल कर ...आखिर सच क्या है सर ..सुना है कि कलमाडी का काला मुंह जनता के सामने सिर्फ़ इस लिए आ गया क्योंकि उन्होंने किसी के साथ मुंह काला नहीं किया और खुद ही सारी रकम डकार ली ..सर सुप्रीम कोर्ट तक इतने  जारे जीरो एक ही नीरो के कब्जे में देख कर चकित हो गई ..तो सर उस घोटाले में तो अलग अलग सैक्शन बनाए जा सकते हैं ...एक में नौ सौ करोड ......दूसरे मे पांच हजार करोड ..सर सर ..

पापा जी इकोनिमिक्स वाले : सॉरी ! नो क्वेश्चन ऑफ़ इकोनोमिक्स प्लीज़

खबरी लाल :आयं , ये भी इकोनोमिक्स से ही रिलेटेड था सर ...अच्छा सर चलिए इन सबसे दूर हट कर कोई अलग सवाल लेते हैं ....सर कहा जा रहा है ..आपकी पार्टी के युवराज   बहुत ज्यादा एज़ के हो रहे हैं ..शादी वैगेरह का कोई चक्कर ही नहीं चल रहा है ..अब देश भी एक युवराज का शाही शादी देखने के लिए बेताब है सर ...उनकी उम्र भी तो अब हो गई है .,.....

पापा जी इकोनिमिक्स वाले : सॉरी ! नो क्वेश्चन ऑफ़ इकोनोमिक्स प्लीज़ ..

खबरी लाल : सत्यानाश , सब कुछ इकोनोमिक्स ही है ..ओह अब तो कुछ पूछते भी डर लगता है ..अच्छा सर आप अपने पीएम बनने के सफ़र को कैसे देखते हैं ...हे भगवान अब इसमें भी इकोनोमिक्स न निकल जाए

पापा जी इकोनिमिक्स वाले : हे हे हे हे ..फ़ायनली यू आस्कड मी ए माई लाईक क्वेश्चन ....सी मैडम के त्याग के बारे में ..आई नैवर फ़ील सॉरी ...एक्चुअली ..

खबरी लाल : ....बस बस बस बस ..सर टाईम खत्म ..बीच में ..ये तो बडा टोइंग है .....के विज्ञापन भी आने हैं ....


रविवार, 8 मई 2011

जिसे किसी ने कभी मां न कहा ........रद्दी की टोकरी से





तू खुद ही उजाड ले , कायनात अपनी ओ खुदा ,
खुद इंसान भी तो है , इसी ज़िद पर तुला ....


हवा बदली ,फ़िज़ा बदली , यूं तो मुहब्बत भी रोज बदलती रही ,
बस न बदला तो वो समाज जो हमेशा बेवफ़ा ही रहा .......


आजा माता का दिन है , तो है संतान का भी , पर ,
कोई ऐसा भी है जिसे किसी ने कभी मां न कहा ........


ये जरूरी नहीं कि आग मजबूत हो , दे जला दे पूरा ,
बस जलनी और जलती रहनी है जरूरी , तू जला , तू जला


दस्तूर कब और ये जाने क्योंकर बना ,अजनबी नहीं ,
सबको हर बार किसी दोस्त ने ही दी  है   दगा


मौत देते हो खुद तुम हाथों से अपने ..
कभी मिठाई तो कभी कह के दवा


अन्याय के साथ ही चलता न्याय का सिलसिला ,
कब हो फ़ैसला , बस ये नहीं हो रहा फ़ैसला .....


कौन कहता है मुझसे तेरा दिल न मिला , न तू खुद तो नहीं ,
है जिसको ये शक , बस इक बार गले से लगा ले ज़रा ....



मुझे शायरी नहीं आती , गज़ल का मतलब मुझे पता ही नहीं , मितले और मिसरे का समझ का तो सवाल ही नहीं , ..बस दिल जो लिखाता है..वो यहां आ जाता है ...मिलता हूं ..अगली पोस्ट के साथ

रविवार, 1 मई 2011

पहले बनाते हैं , बाद में चलाते हैं .......सुना आज मजदूर दिवस है




मजदूर दिवस को ,
फ़िर आज ,
मनाने की ,
जोरदार थी तैयारी ....

मीडिया की ,
फ़िर मंत्री जी की ,
और टाटा-बिडला की भी ,
आज आनी थी बारी ,

सबने की घोषणा ,
अबकि इसे,
मजदूरों के बीच ही ,
जाकर मनाया जाएगा

कितनी चिंता है ,
आज हमें, कामगारों की ,
उन्हें साथ बिठाकर
ये बताया जाएगा

शहर के छोर की ,
गंदी झुग्गी बस्ती के ,
एक कोने की ,
कराई गई सफ़ाई

टेंट लगे और ,
बडे से भोंपू , ताकि ,
जो बोलें मंत्री जी ,
वो सबको दे सुनाई

नेताजी आए , थोडा
अचकचाए फ़िर सकपकाए,
अरे ! अब आ गए हम हैं ,काहे का गम है ,
लेकिन आपकी संख्या थोडी कम है ??

पीए ने कान में बताया ,
फ़ुसफ़ुसा के समझाया ,
नेताजी जल्दी से कुछ भी ,
बोले के , फ़ौरन जाईये निकल,

अभी अभी पता चला है कि ,
इस बस्ती के ,दस मजदूर ,
कल लगी तो जो आग ,
उसमें जिंदा गए थे जल

आयं ! काहे की ,फ़ैक्ट्री थी ,
कौन सा था वो कारखाना
अबे जब ऐसा था तो ,
तुम्हें ये पहले ही था बताना

सर, जूतों का था वो कारखाना,
जहां कल लगी थी आग ,
मालिक ने जड दिया था ताला ,
अंदर दस जिंदगियां राख

नेताजी चौंके, नीचे उतर आए ,
चलो फ़िर मंत्रालय में ही मजदूर दिवस मनाते हैं ,
अच्छा हुआ जूते जल गए , और मजदूर भी ,
पहले जूते बनाते हैं , बाद में जूते चलाते हैं



सुना है कि सरकार ने आज उन अभागे मजदूरों के परिवार वालों को दो दो लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है ...काश कि इस या इससे ज्यादा मुआवजे में ..मजदूरों को भी कभी ...एक फ़ैक्ट्री मालिक , एक नेता या मंत्री जिंदा जलाने को मिल जाता

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

जालियांवाला बाग में बिताए कुछ घंटे .....


कल देर रात को अनुज समान मित्र शिवम मिश्रा जी का फ़ोन आया । उन्होंने याद दिलाया कि आज यानि तेरह अप्रैल वही दिन है जब जालियांवाला बाग नरसंहार हुआ था और चूंकि मैं हाल ही में वहां सपरिवार गया हुआ था इसलिए अपने अनुभव को साझा करने के लिए आज के दिन से उपयुक्त और क्या हो सकता है । मैंने उन्हें ये कहते हुए धन्यवाद दिया कि हिंदी ब्लॉगजगत को इस बात के लिए अवश्य ही गर्व होगा कि वे ऐसे कुछ गिने चुने ब्लॉगरों में से एक हैं जो हमेशा ही अपने विचारों , अपने लेखों और पोस्टों से न सिर्फ़ देशभक्ति का जज़्बा जगाए रखते हैं बल्कि मुझ जैसे बहुत से ब्लॉगर मित्रों /सखाओं को आज के दिन भी कृतघ्न बने रहने से बचा लेते हैं । 


जालियांवाला बाग से मेरा परिचय इतना पुराना है कि बस एक धुंधली सी याद ही थी । पिताजी की फ़ौज की नौकरी के दौरान फ़िरोज़पुर में नियुक्ति के समय ही हम सपरिवार जालियांवाला बाग गए थे । मुझे सिर्फ़ एक ही चीज़ याद थी और वो था , शहीदी कुंआं जो तब सिर्फ़ एक कुंआ ही था , बिल्कुल खुला और कुंए जैसा । इसलिए पिछले वर्ष जब  अमृतसर का कार्यक्रम बना तो मैं ये सोच के रोमांचित और उत्तेजित हो गया कि इतिहास एक बार अपने आपको फ़िर से दोहरा रहा था शायद । मेरा पुत्र भी लगभग उसी समय उस पावन स्थल के दर्शन करने जा रहा था जिसके मैंने शायद इसी उम्र में किए थे । पत्नी का गृह राज्य पंजाब होने के बावजूद अभी तक वो भी इसे देखने से वंचित थी सो ये और भी पक्का हो गया । 

इससे पहले कि जालियांवाला बाग में प्रवेश करूं कुछ बातें जो तब और अब भी मेरे दिमाग में घूम रही थीं वो कुछ इस तरह की थीं । हमें अपने देश पर बलिदान होने वालों को अपनी स्मृति में बसाए रखने , ताउम्र उनकी कृतज्ञता  मानने और इस तरह की तमाम भावनाओं को नि:संदेह पश्चिमी देशों से सीखना चाहिए तो आज भी इन मामलों में हमसे कहीं आगे और अनुकरणीय हैं । आज देश के कर्णधारों और निर्लज्जता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुके उन तमाम राजनेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है जो सुना है कि भगत सिंह , सुखदेव को भी आज की जाति धर्म , भाषा की छिछली राजनीति में घसीटने में लगे हैं । 


मुझे जालियांवाला बाग के अंदर जाते समय एक बात और जो ध्यान आई वो ये कि ब्रितानी सरकार जो पूरे विश्व को सभ्यता और संस्कार उसकी महारानी सालों के बाद भी जब उस जालियांवाला बाग में आती है या उस साम्राज्य का युवराज उस स्थल को देखने आता है तो शर्मिंदगी और माफ़ी की जगह पर यदि ये कह कर निकल जाता है कि वहां उस दिन नरसंहार में मरने और घायल लोगों की संख्या को बढा चढा कर बताया दिखाया गया है तो या तो तो भारत सरकार को उसे धक्के मार के निकाल देना चाहिए थी या खुद भी उस दिन शर्म से डूब मरना चाहिए था । लेकिन सरकार तो राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के बहाने अब भी उनके तलुवे चाटने का कोई मौका नहीं चूकती । ऐसी स्थिति में तो यही विकल्प बचता है कि अगर हम वाकई चाहते हैं कि हमारी आने वाली नस्लें भी इतनी ही संवेदनहीन न हो जाएं तो यकीनन उन्हें ये बताते रहना होगा कि ये और देश भर में इन जैसे तमाम स्थलों का भारत को ऋणी रहना चाहिए चिर काल तक क्योंकि ये आजादी उन्हीं के बलिदानों के कारण मिली है । 

 कुछ यादों के पन्ने से ..................


मुख्य द्वार 

सूचना पट्टिकाएं 

अंदर घुसते ही सामने बना हुआ छोटा सा आश्रय स्थल 

भीतर का अहाता जिसे अब सीमेंटेड कर दिया गया है 

जालियां वाला बाग द्वार के साथ ही बना संग्राहलय 



अमर ज्योति 

शहीदों को समर्पित ज्योति की लौ 

अंखंड अमर ज्योति 

अमर ज्योति के नीचे शिलापट्ट

 विश्राम स्थल 

दूर चमकता शहीद स्तंभ 

शहीद स्तंभ 

जालियांवाला बाग ....का बाग 

बाग का मनोहारी दृश्य 



संग्रहालय से लेकर शहीदी कुएं तक जाने के लिए बना आकर्षक कॉरीडोर 

संग्रहालय में लगे चित्र जिनके लिए लिखा था कि चित्र खींचना मना है मगर जब तक मुझे टोका गया तक मोबाईल अपनी आदत के अनुसार काम कर चुका था


हालांकि मुझे तब और तब से लेकर अब तक ये नहीं समझ में आया कि आखिर किस वजह से या किन वजहों से ऐसा कहा गया कि हमें अपने ही शहीदों और उनकी तस्वीरों , उनसे जुडी जानकारियों समाचार पत्रों की छवियों की तस्वीर खींचने से रोका गया , हो सकता है कि कुछ विशिष्ट कारण रहे हों । 

सुदूर दक्षिण राज्यों से आया हुआ बच्चों का एक दल जिन्हें विशेष रूप से जालियांवाला बाग घुमाने के लिए लाया गया था 

बाग के अंदर घूमते विभिन्न प्रांतों से आए हुए लोग 

संग्राहलय के अंदर बना हुआ विशालकाय चित्र जो उस दिन हुए नरसंहार को प्रतिबिंबित कर रहा है 

इस चित्र के आगे खडे होकर आप एक पल के लिए उस दिन को अनुभव कर सकते हैं और यकीनन ये आपको सिहरा के रख देगा 

शहीदी कुंआं , जिसे अब एक स्मारक का रूप दे दिया गया है 

कुंए के भीतर झांकते गोलू जी और पुत्री बुलबुल अपनी मां के साथ 

कुंए को चारों तरफ़ से जाल लगा के बंद कर दिया गया है अब 

कुंए के अंदर का एक दृश्य 


इस कुंएं में झांकते हुए जब मैंने श्रीमती जी को पूरा बात बताई तो वे सिहर उठीं थीं और उनकी आंखों के कोर से ढुलकता आक्रोश बहुत कुछ कह गया था । सच कहूं तो मुझे अच्छा लगा था कि वे भी ठीक वैसा ही महसूस करती हैं जैसा कि मैं । 
ये वही जगह है जहां खडे होकर जनरल डायर ने बाग में मौजूद हजारों निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाईं थीं 

पुत्र आयुष गौर से पढते हुए 
 पुत्र आयुष और साथ में ही घूमने आया  साढू साहब के साहबजादे जॉनी , ने उन चार घंटों में लगातार एक के बाद एक प्रश्नों की झडी लगाकर मुझे इतिहास के उन पन्नों को फ़िर से पढने और याद करने पर मजबूर कर दिया जिन्हें कभी स्कूल कॉलेज में पढकर हम उत्तेजित हो जाया करते थे । मैंने उन्हें एक एक बात जो मुझे उस समय याद थी सब सुनाई और बताई उधम सिंह तक 
द्वार पर स्थित अहाता 



उस दिन शहीद हो उन तमाम आत्माओं को नमन कि आज हम चैन की सांस ले पा रहे हैं । आजाद सोच  के साथ जी पा रहे हैं , लिख पा रहे हैं , पढ पा रहे हैं ....उन्हें शत शत नमन 

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अनशन खत्म : आंदोलन शुरू ....अन्ना का आह्वान ..तैयार हैं न आप ?

आंदोलन का जयघोष



आज अन्ना हज़ारे का आमरण अनशन समाप्त हो गया है और उनके साथ ही पिछले पांच दिनों से भूखे प्यासे बैठे तीन से चार सौ आम लोगों ने भी अन्न और जल ग्रहण कर लिया । इससे पहले कि इस जनांदोलन पर कुछ बात की जाए , यहां उन लोगों के लिए कुछ कहना चाहूंगा जो न सिर्फ़ अब इस आंदोलन पर सवाल उठा रहे हैं और उनके लिए भी जिन्हें लग रहा है कि इस आंदोलन को अभी और परवान चढने देना चाहिए था और इसे इतनी जल्दी खत्म नहीं होने देना चाहिए था ।

सबसे पहले तो ये स्पष्ट कर देना उचित होगा कि ये आंदोलन न तो सत्ता के खिलाफ़ था न ही सरकार के ,न ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई थी न ही व्यवस्था को उखाड फ़ेंकने जैसा कोई प्रयास । इस आंदोलन का एक मकसद था । पिछले बहुत समय से सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक को पारित नहीं करवाया जा सका था बावजूद इसके कि अब तक आठ बार इसकी कोशिश की गई । इससे अहम बात ये कि जिन लोगों पर इस लोकपाल विधेयक के मसौदे को तैयार करने का भार डाला गया था और जैसा मसौदा प्रस्तावित था उससे उसका वैसा ही हश्र होने वाला था जैसा कि आज भ्रष्टाचार से लडने के मौजूद कानूनों और संस्थाओं का है आपके सामने मुख्य सतर्कता आयोग  का उदाहरण है ही ।

इसलिए जब इस प्रस्तावित मसौदे को जांचा परखा गया तो सिविल सिटिजन के रूप में सजग और कार्यरत कर्मवीर सूचना के अधिकार की लडाई को लड कर जीतने वाले अरविंद केजरीवाल , अन्ना हज़ारे , किरन बेदी , प्रख्यात कानूनविद प्रशांत भूषण , शांति भूषण  जैसे लोगों ने कमर कस ली कि अबकि बार सरकार की मनमानी नहीं चलने देंगें । समाजसेवी आंदोलनकारी अन्ना हज़ारे ने बरसों पुराने और आज़माए अचूक नुस्खे को फ़िर से आज़माया और इस मांग के साथ बैठ गए । जो लोग इसे जल्दी खत्म हुआ मान रहे हैं या ये कह रहे हैं कि अन्ना को अभी इसे ज़ारी रखना चाहिए था उन्हें दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए थीं । जनता का हुज़ूम और उसका जोश जिस तरह से पल प्रतिपल बढता जा रहा था वो अगर इसी तरह बढता रहता तो बहुत जल्दी ही वो समय भी आ जाता कि जब आम आदमी शायद वो सारी सीमाएं पार कर जाता जो इस आंदोलन के लिए सोचा भी नहीं गया था । हालात तभी तक काबू में थे जब तक कि अन्ना की तबियत ठीक थी .सरकार को ये भलीभांति अंदाज़ा हो गया था कि अगर जरा सी भी चूक हुई तो ये आत्मघाती साबित होगी ।


ये अनशन तो कल रात ही समाप्त हो जाता क्योंकि कल रात दस बजे हुए समझौते में ही सरकार ने अन्ना की सारी मांगे मान ली थीं लेकिन कुछ खास कारणों से अन्ना ने आज सुबह तक का इंतज़ार किया । एक तो थी सरकारी घोषणा यानि नोटिफ़िकेशन की प्रतीक्षा जिसे सरकार ने बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से चौंकाते हुए सीधा राजपत्र ही ज़ारी कर दिया और स्पष्टत: बता दिया कि कमेटी का गठन कैसे किया जाएगा और कौन कौन लोग होंगें । अन्ना एक और खास वजह से रुके हुए थे ..आज सुबह अन्ना ने अपने अनशन को और इस आंदोलन को समाप्त करने से पहले ये जता और बता दिया कि अभी सिर्फ़ ये अनशन समाप्त हुआ है और सच कहें तो उसे एक तात्कालिक स्थगन मात्र दिया गया है ।


अन्ना ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पंद्रह अगस्त तक सरकार ने इस विधेयक को पारित नहीं किया तो फ़िर वही जंतर और फ़िर वही मंतर । अन्ना ने आज दिए गए अपने संदेश में ये भी बता दिया कि अब तो सही मायने में ये आंदोलन शुरू हुआ है इस आंदोलन की अलख अब पूरे देश में जगानी होगी और वे खुद इसमें भागीदारी करेंगे । अन्ना ने युवाओं को मीडिया को और आम अवाम को संदेश देते हुए सरकार को ये ईशारा कर दिया है कि उनके निशाने पर अब कौन कौन से एजेंडे रहेंगे , चाहे वो वोटिंग मशीन हो या चुनाव प्रणाली , प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार हो या सत्ता का विकेंद्रीकरण उन्होंने भविष्य के लिए उद्देश्य भी तय कर दिए हैं और तरीका भी । 


सबसे बडी बात जो इस पूरे प्रकरण से निकल कर आई है वो ये कि न सिर्फ़ आम जनता को उसकी ताकत का एहसास करा दिया उन्होंने बल्कि सरकार को भी बता दिया है कि बेशक वे जनप्रतिनिधि हैं और जनता ने हैं और जनता ने ही उन्हें चुन के भेजा है लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि वे मनमानी करेंगे और अब ये कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि सिर्फ़ पांच सवा पांच सौ लोग पूरे सवा अरब की जनसंख्या को दिनरात बेवकूफ़ बनाकर बेखौफ़ घूमते रहेंगें । तो ये समय वो समय है कि जब सही मायने में नागरिक आंदोलन की शुरूआत हो गई है जिसका एक ही उद्देश्य है नागरिक राज की बहाली , जनता का राज जो वो खुद करते हुए महसूस कर सके , जब जिससे उकताए उसे निकाल के बाहर कर सके , जो भी दोषी हो उसे दंड दे सके , अब आप खुद तय करिए कि इस आंदोलन में आपकी भूमिका क्या होने वाली है क्योंकि आपको एक तरफ़ तो होना ही होगा या तो उन हाथों के साथ आइए और उस लायक खुद को बनाइए कि ये जो सोटे तैयार किए जा रहे हैं उन्हें चलाने की ताकत आपमें खुद आ जाए नहीं तो फ़िर अपनी पीठ को इस बात के लिए तैयार रखिए क्योंकि देर सवेर ये आप पर भी पडने ही वाला है ...ये फ़ैसले का समय है इसलिए जागिए ...और जुडिए ..
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