प्रचार खिडकी

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

उसको कहां खुद से अलग देखा

होगा कई,
शहरों -कस्बों ,
मैदानों-सड़कों,
का मालिक,
फ़िर भी,
चला वो,
सड़क किनारे,
नहीं बीच में,
चलते देखा॥

कहते होंगे,
उसे सभी , वो,
है बड़े,
दिल का मालिक,
पर वो तो,
हाथ मिलाता सबसे,
कभी किसी से,
नहीं गले मिलते देखा॥

मुझको लगता था,
मैं ऐसा हूँ,
दोस्तों से भी,
चिढ जाता हूँ,
पर उसको भी,
अक्सर,
यारों की,
कामयाबी पर,
जलते देखा॥

सूखी ही सही,
रोटी ही सही,
पर माँ , मुझको,
ख़ुद देती है,
उसके बच्चों ,
को तो ,
आया के हाथों,
पलते देखा॥

मुझको लगा की,
कमजोरी ने,
मुझको बूढा बना दिया,
देखा तो,
कुछ,
झुर्रियां ही,
थोड़ी कम थी,
उम्र के उस मोड़ पर,
उसको भी,
ढलते देखा॥

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?


सड़क पर,
हादसे देखता हूँ,
और पड़ोस में,
हैवानियत।

कूड़े में अपनी,
किस्मत तलाशते बच्चे,
कहीं प्यार, अपनापन,
और आश्रय तलाशते बड़े (बुजुर्ग) ।

सूखी तपती धरती,
लूटते- मरते किसान,
कच्ची मोहब्बत में,
कई दे रहे अपनी जान।

व्यस्त मगर,
बेहद छोटी जिंदगी,
चुपके से , कभी अचानक ,
आती मौत।

और भी,
कई मंजर ,
देखती हैं,
मेरी आंखें .

मगर मौन,
हैं , मन भी,
और नयन भी,


क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?

शनिवार, 30 जनवरी 2010

कोशिशें अक्सर, मेरी, नाकामियां बन जाती हैं

मैं जो करता हूँ,
सब वो,मेरी ,
गलतियां कहलाती हैं।

कोशिशें अक्सर,
मेरी,
नाकामियां बन जाती हैं॥

जब भी थामता हूँ,
हाथ किसी का, उसकी,
दुश्वारियाँ बढ़ जाती हैं॥

जब बांटता हूँ,
दर्द किसी का,
रुस्वाइयां बन जाती हैं॥

मगर मैं फ़िर भी चलता रहता हूँ.

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

भीड़ से भरी ये दुनिया,
फ़िर भी है जल्दी में दुनिया,
बेचैनी सी छाई ,
संसार में है,
मैं क्यों रहूँ,
परेशान,
कि जानता हूँ,
आज हर आदमी,
कतार में है॥

कोई खुशी -गम के,
कोई सुख-दुःख,
कोई लड़ रहा है,
जिंदगी से,
कोई मौत के,
इंतज़ार में है॥

कोई धारा के बीच,
कोई तूफानों में,
किसी को मिला,
मांझी का साथ,
किसी के सिर्फ़,
पतवार है हाथ,
सच है तो इतना,
हर कोई मंझधार में है॥

सबकी सीरत एक सी,
और सूरत पे,
अलग-अलग,
चढा हुआ नकाब है,
किसी एक की बात,
क्यों करें, जब,
पूरी कौम ही ख़राब है।
फर्क है तो ,
सिर्फ़ इतना कि,
कोई विपक्ष में है बैठा,
कोई सरकार में है॥

हर कोई आज किसी न किसी कतार में है , क्यों है न ????

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

और वे अब भी लड़ रहे हैं........

सफर दर,
सफर,
रास्ते,ह
कटते गए॥

छोड़ दी,
जबसे,
शिकायत की आदत,
फासले ,
मिटते गए॥

मैंने तो ,
बस,
संजोई थी,
चाँद यादें,
घड़ी भर को,
बंद की पलकें,
सपने,
सजते गए॥

चला था जब ,
तनहा था,
और कभी,
किसी को,
पुकारा भी नहीं,
पर बन गया,
काफिला जब,
मुझ संग,
सभी अकेले,
जुड़ते गए॥

हादसा कुछ,
यूं हुआ,
हमें, लड़खाते देख,
उन्होंने सम्भाला,
हम होश में आए,
सँभलते गए,
मगर वो,
गिरते गए॥

कुछ लोगों ने,
सबसे कहा,
तुम क्यों साथ-साथ,
रहते हो,
जीते हो, मरते हो,
तुम सब ,
अलग हो,
बस फ़िर,
सब आपस में,
लड़ते गए॥

और वे अब भी लड़ रहे हैं........

खुद को ढोता ....आदमी

ताउम्र यूं,
खुद ही,
अपने को ,
ढोता रहा आदमी।

जब भी दिए,
जख्म औरों को,
खुद ही,
रोता रहा आदमी॥

पैशाचिक दावानल में,
कई नस्लें हुई ख़ाक,
लकिन बेफिक्र,
सोता रहा आदमी॥

जानवर से इंसान,फिर ,
इंसान से हैवान,ना जाने,
क्या से क्या,
होता रहा आदमी॥

ज्यों,ज्यों, बहुत बड़ा, बहुत तेज़,
बहुत आधुनिक बना,
अपना ही आदमीपन,
खोता रह आदमी॥

हाँ आज सचमुच ही मुझे इस भीड़ में कोई आदमी नहीं मिलता.


सोमवार, 25 जनवरी 2010

पिछली रात, शहर की, हर आँख, रोई है

इतने निष्ठुर,
इतने निर्मम,
ये बच्चे,
अपने से नहीं लगते,
फ़िर किसने ,
ये नस्लें ,
बोई हैं॥

किस किस के ,
दर्द का,
करें हिसाब,
लगता है,
पिछली रात,
शहर की,
हर आँख,
रोई है॥

सपनो का,
पता नहीं,
मगर नींद तो,
उन्हें भी,
आती है,
जो ओढ़ते हैं,
चीथरे, या ,
जिनके जिस्म पर
रेशम की,
लोई है॥

क्या क्या,
तलाशूं , इस,
शहर में अपना,
मेरी मासूमियत,
मेरी फुरसत,
मेरी आदतें,
सपने तो सपने,
मेरी नींद भी,
इसी शहर में,
खोई है॥

ये तो ,
अपना अपना,
मुकद्दर है, यारों,
उन्होंने , सम्भाला है,
हर खंजर अपना ,
हमने उनकी,
दी हुई,
हर चोट,
संजोई है..
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