प्रचार खिडकी

बुधवार, 5 मई 2010

सिलिगुडी की यात्रा , गुलाबी चाय और बैंकिंग परीक्षा (यात्रा संस्मरण )




कल की पोस्ट में जब कहा कि केले खाने का मन नहीं था , तो उसके पीछे कोई विशेष कारण नहीं था बल्कि ,केले खाने का मन इसलिए नहीं था क्योंकि उस गर्मी में पौलोथिन में शायद उतनी बुरी हालत उनकी भी होती जितनी कि हम दोनों जन के बीच में पिस जाने से हुई अब इस हालत में उन केलों को उन्हीं जाम में बाहर सडक किनारे विसर्जन करना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होती , और हमने भी दे ही दी बस मजे में टनटना कर रुक गई थी और सवारियां भी बाहर निकलने के लिए बेताब थीं हमने भी कौन सा सुरक्षा पेटियां बांधी हुई थीं सो हम भी बाहर को निकल लिए

वाह क्या नजारा था , ऐसा लग रहा था मानो बौर्डर पर लगे जाम को फ़ुल्ल्म फ़ुल इंज्वाय किया जा रहा था पुलिस अपने काम में मशगूल थी जैसे तैसे आढे टेढे करके ट्रकों को टोल टैक्स लेकर , और शायद कुछ अपना टैक्स लेकर भी, निकलने की जगह दी जा रही थी वहां लगने और लगाए जाने वाले नियमित जाम का ही असर था ये शायद कि वहां पर बहुत बडी तादाद में खाने पीने के चीज़ें बेचने वाले खडे थे हम दोनों भी बस में लग रही उमस से बचने और कुछ पेट पूजा के जुगाड में नीचे उतरे और कुछ ऐसा ही मोबाईल खाद्य पदार्थ ले लिया थोडी देर सभी सवारियां सडक किनारे खडी होकर हाथ पांव सीधी करती रहीं तभी कंडक्टर ने ईशारा किया चलिए अंदर सब थोडी देर के बाद बस सरकने लगी और आधे घंटे में हम जाम के बाहर थे मौसम में बढती उमस ने बता दिया था कि बहुत जल्द ही तेज़ बारिश हो सकती है , और हुआ भी वही थोडा सा आगे बढने पर तेज़ तूफ़ानी अंधड चलने का एहसास हुआ बस की स्पीड अपने आप कम हो गई ।इसके बाद झमाझम बारिश बारिश इतनी तेज़ थी कि ड्राईवर को चाहते हुए भी एक जगह पर साईड करके बस को रोक कर खडा होना पडा

बारिश की रफ़्तार थोडी कम हुई तो बस ने धीरे धीरे अपनी रफ़्तार बढानी शुरू की आगे जाकर बारिश बंद हो गई थी और ठंडी हवाएं तन मन को सुकून पहुंचा रही थीं आगे बैठे हुए कडंक्टर को बता दिया गया था कि हमें कहां उतरना है वो शायद किसी चाय बागान का पता था जो कि सिलिगुडी शहर से थोडा पहले पडता था , हम बता कर चुपचाप फ़िर झपकी मारने लगे नींद तब खुली जब कंडक्टर ने बाकायदा झंझोड के उठाया और बताया कि बाबूजी उठिए , आपका स्टौप आने वाला है मेरी तो आंखें खुलते ही जो नज़ारा मुझे दिखाई दिया उसने देखने की शक्ति को दोगुना और सुनने की शक्ति को आधा कर दिया गुलाब जी उससे पूरी जानकारी ले रहे थे और हम खिडकी पर मौजूद होने का पूरा फ़ायदा उठाते हुए मीलों तक फ़ैली हुई हरियाली को निहार कर तरे जा रहे थे समझ रहे थे कि अगले तीन चार दिन आंखों के लिए बडे ही अनमोल रहने वाले हैं

बस में से देखा कि दोनों तरफ़ चाय बागानों की हरियाली फ़ैली हुई थी ऐसा लग रहा था जैसे पहाडियों ने हरी चादर ओढ रखी है , नहीं चादर नहीं शायद लहर दार दुशाला , बारिश में धुल कर चाय के पौधों की पत्तियां यूं चमक रही थीं , मानों कह रही हों ये है धरती का असली रंग सडक बिल्कुल सपाट और सीधी सुबह लगभग साढे नौ बजे हम एक चाय बागान के स्टौप पर उतर गए गुलाब जी को मोहन जी ने बता दिया था सारा पता सो उन्हीं के निर्देशों का पालन करते हुए हम लोग वहां उतर गए थे उतर के देखा तो मोहन जी भी मजे में वहीं हमारा इंतज़ार कर रहे थे गुलाब जी का वहां पर रुकना पहले से तय था मगर हमारी कुछ टालमटोल थी , सो हमें भी साथ आया देख मोहन नी प्रसन्न हो उठे , आखिर कल होने वाली बैंकिंग परीक्षा के टिप्स भी तो हमारे साथ ही थे

रात को वहां भी बारिश हुई थी , मगर पहाडों की यही तो खासियत होती है कि बारिश के बाद पानी ठहरने , कीचड कादो होने की कोई गुंजाईश नहीं होती हम सब उस छोटी छोटी बजरीली भूमि के कच्चे मगर चौडे चढाईनुमा रास्ते पर बढते जा रहे थे मैं कब से चाय के पौधों को एक बार छूना चाहता था , सो सबसे पहला काम तो वही किया कि के पौधे पर हाथ फ़ेरा मेरी आशा के विपरीत उन पौधों की पत्तियां कडी थीं , बहुत ही सख्त हां ऊपर की छोटी छोटी नई पत्तियां जरूर कोमल थीं मोहन जी , जो चार दिन पहले से डटे हुए थे उनसे कुछ जानना चाहा तो उन्होंने कहा , यार चाचा जी से ही पूछना कुछ भी हम तो बस पढाई में व्यस्त रहे हमें बाद में जाकर पता चला कि वे अपने चाचाजी के पडोस में स्थित एक घर में रह रहे परिवार में एक जबरन बनाए हुए एक भैय्या और भौजाई के यहां भौजाई की छोटी बहिन जी के साथ पढाई कर रहे थे वहां उन्हें भरपूर आदर सत्कार के साथ उदर संतुष्टि भी इसलिए मिल रही थी ,क्योंकि भौजाई को पता चला था कि मोहन जी जल्द ही बैंक में बडे अफ़सर लगने वाले हैं , और उन्हें ये भी पता था कि बैंक में काम करने वालों को पैसे को कोई कमी नहीं रहती , सारा पैसा उनका अपना होता है खैर , एक और चीज़ जो मुझे आकर्षित कर रही थी वो थी वहां के बांस ऐसे बांस मैंने पहली बार देखे थे

आम तौर पर मिलने वाले बांसों से बिल्कुल ही अलग , हल्के हरे रंग के , लंबे कम मगर मोटाई चौडाई बहुत ज्यादा देखने पर लग रहा था जैसे पोपले से हों , मगर खासे मजबूत इसका अंदाज़ा भी इस बात से हुआ कि आगे जाकर देखा तो वहां लोगों ने अपने घर झोपडियां बनाने में उसका भरपूर उपयोग किया हुआ था पक्के मकान के नाम पर अब तक जो दिखा था वो मोहन जी के चाचा जी वाला स्कूल था हम लोग शायद एक किलोमीटर चल चुके थे , मगर पता ही नहीं चल रहा था , चढाई होने के बावजूद सुबह की चमकीली धूप और ठंडी हवा , कुल मिला के कौकटेल का मजा दे रहे थे , और चखना के रूप में चारों ओर फ़ैली हरियाली थी ही थोडी देर में चाचाजी के घर पहुंच चुके थे वहां ज्यादा आबादी नहीं थी चाचाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर सभी स्थानीय लोग ही थे यहां तो टाटा साहब के अन्य संस्थानों , मसलन वहां स्थित स्कूल, अस्पताल आदि में कार्यरत कर्मचारी लोग ही थे कोई जगह की कमी नहीं , जिसको जहां मन था घर बना लिया गया था , वही बांस वाला

चाचीजी हम लोगों को देख कर बहुत ही खुश थीं हमें वो नहीं पहचानती थीं , मगर बाबूजी को जरूर जानती थीं सो जान गईं कि हम आखिर हैं कौन जाते ही गर्मागर्म चाय मिली मगर ये क्या गुलाबी रंग की चाय उस चाय से खुशबू भी एकदम अलग सी रही थी मैंने अचंभित होकर थोडा सा झिझकते हुए चाची की तरफ़ देखा तो वे बोलीं बेटा ये चाय सीधा चाय के पौधों से तोडी गई कोमल पत्तियों की है , हम यहां यही चाय पीते हैं , तुम्हें अच्छी लगेगी यकीन मानिए मैंने अब तक कुछ यादगार प्यालियां सुडकी हैं चाय की उनमें से एक ये भी थी ठंडे ठंडे पानी से नहा धो कर हम थोडा सा तैयार शैयार हुए परीक्षा कल थी , गुलाब और मोहन जी की पहली पाली में तो मेरी दूसरी पाली में चाची ने कहा कि हम थक कर आए होंगे इसलिए हमें थोडा आराम कर लेना चाहिए मगर मन कहां मानने वाला था सो हमने सबने तय किया कि अभी थोडी देर में नाश्ता वैगेरह करके आसपास ही घूमा जाए

चाची ने गर्मा गर्म रोटियां बनाई , और वो भी सफ़ेद उजली बिल्कुल झक , खाया तो पता चला कि चावल के पिसे हुए आटे की थीं , साथ में अपनी गैया का गर्मा गर्म दूध और गुड ओह ये वो रेसिपि है जो दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकता ही किसी खाने खजाने में वो स्वाद मिल सकता था हमने फ़टाफ़ट वो उडा कर बाहर का रुख किया साथ में चाचा जी का बडा बालक राम , जो खुद भारतीय नेवी में जाने की तैयारी कर रहा था , हमारे साथ हो लिया हमने राम से कहा कि हमें बागान और उसके आसपास की जगह घुमाए राम ने बिल्कुल मंझे हुए गाईड की तरह हमें घुमाया मीलों तक फ़ैले चाय के बागान , और चाय के पौधों , उनके रखरखाव , उनकी देखभाल , उनमें से पत्तियों का तोडा जाना , जैसी बहुत सी जानकारियां उसने दीं राम ने बताया कि चाय का पौधा बहुत ही मजबूत होता है , इतना कि उसकी जडें और शाखें , टेबल और फ़ैसी फ़र्निचर के पाए बनाने के काम भी आते हैं बरसात के बाद जब नई नई कोपलें और कोमल पत्तियां निकलती हैं तो वे ही चाय पत्ती बनाने के लिए तोडी जाती हैं पुरानी पत्तियों को वैसे ही छोड दिया जाता है समय समय पर उनमें खाद वैगेरह भी डाली जाती है

ओह .............ये प्रवास तो तीन चार दिनों का था सो आज भी सब कुछ नहीं कहा जा सकता .........तो फ़िर कल मिलते हैं चाय के बागानों के बीच

सोमवार, 3 मई 2010

बैंकिंग की परीक्षा और सिलिगुडी की यात्रा (यात्रा संस्मरण )



मुझे कभी नहीं पता था कि यात्रा संस्मरण कैसे लिखा जाता है , और क्या क्या लिखा जाता है , या कि क्या नहीं लिखा जाता है । जीवन में इतनी यात्राएं की हैं कि यदि उन्हें लिख कर सहेज न पाता तो अफ़सोस ही रहता । इसकी शुरूआत जाने क्या सोच कर कर गया , पिछली इस पोस्ट और इस पोस्ट में जब मैंने सीधा सीधा जो याद था वो सब जस का तस लिख कर रख दिया , आपने पसंद किया तो मेरा भी उत्साह बढ गया । जैसा कि पहले ही कहा था कि इन यादों में छुपे हुए पन्नों को लिखने में मुझे खुद ही इतना आनंद आया कि लगा कि इसे आगे बढाता चलूं । कई मित्रों ने मुस्कुराते हुए कहा कि , मैं इतने पहले की गई यात्राओं को कैसे याद रख गया तो क्या कहूं जी , किताबों में से कभी कुछ याद रख नहीं पाता था सो दिमाग में जो खाली जगह बची हुई थी उनमें ये यादें बखूबी सिमट जाती थीं । बस उन यादों को गर्म पानी में उबाल कर तरोताज़ा करके आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूं । एक बात और बाबूजी की फ़ौज की नौकरी ने पूरे परिवार को हिंदुस्तान के कई शहरों के दर्शन करा दिए थे और जो कसर रह गई थी या जो भटकना और लिखा था वो सब हमारी परीक्षाओं ने पूरी कर दी थी । बैंकिंग की दी गई ढेर सारी परीक्षाएं उन्हीं का एक हिस्सा था । तो आज फ़िर से आपको एक ऐसी ही यात्रा पर लिए चलता हूं ।



कोलकाता बैंकिंग की हमारी परीक्षा का केंद्र इस बार हमने चुना था सिलिगुडी । नहीं जी इस बार एक नई जगह देखने और घूमना नहीं था सिर्फ़ इसका कारण । इसकी पहली वजह थी कि ये बस मार्ग से जुडा हुआ था , मतलब सबसे नजदीक परीक्षा केंद्रों में से एक इसलिए स्वाभाविक से रूप से हमारा पहला विकल्प । दूसरा और ज्यादा दमदार ये कि हमारा ही एक साथी छात्र , जो खुद इस प्रतियोगिता परीक्षा में भाग लेने के लिए तैयार बैठा था उसके चाचाजी , वहीं सिलिगुडी की किसी चाय बागान के स्कूल में हेडमास्टर थे । यानि वहां रहने खाने पीने की टेंशन खत्म । यही वजह थी कि वो महाशय मोहन झा जी हमसे चार दिन पहले ही निकल कर अपना डेरा जमा चुके थे सिलिगुडी में । मैं और एक और साथी गुलाब झा जी , हम दोनों भी इस बार परीक्षा से एक दिन पहले ही रवानगी की तैयारी कर चुके । दरभंगा से सिलिगुडी के लिए सीधी बस सेवा थी , शायद एतियाना ट्रेवेल्स के नाम से प्रसिद्ध बस सेवा थी वो उस रूट की जिसका संचालन बीच में पडने वाले पूर्णिया से किया जाता था । बस दरभंगा से शाम को छ: या साढे छ; बजे रवाना होती थी और सुबह आठ या नौ बजे तक सिलिगुडी पहुंचा देती थी । हम तो हमेशा की तरह ही तैयार थे ।


बात शायद १९९२ जुलाई की है , बरसात ने अपनी एंट्री मार ली थी, मगर अभी टाप गियर में नहीं पहुंची थी । हम दोनों दिन में ११ बजे अपने गांव से निकले । साथ में वही एयर बैग जिसमें कुछ किताबें और कपडों के अलावा एक गर्म शौल भी रख लिया गया था एहतियातन , हालांकि इस बार थोडे आश्वस्त थे कि घर जैसा ही होगा तो फ़िर चिंता किस बात की है , आखिर मोहन जी गए किसलिए हैं आगे आगे ।
हम दोनों लगभग ढाई बजे तक दरभंगा बस स्टैंड पहुंच कर बस आदि का पता करके उसके समय वगैरह की पूरी तहकीकात करके आराम से सीट लेकर बैठ भी गए । एक से दो भले क्यों कहा जाता है ये ऐसे मौकों पर ठीक ठीक पता चल जाता है । समय था , सो उतर कर कुछ केले वैगेरह भी समेट लिए गए , आखिर बस में कौन सा स्टेशन बार बार आना था जो आगे खरीद पाते , फ़िर पेट और भूख को भी कहां पता होता है बस और रेल यात्रा का अंतर । बस हमारे अंदाज़े से उलटा समय पर चल दी ।


हम लोग भी थोडे से थक से गए थे बैठे बैठे इसलिए बस के चलते ही हवा के थपेडों ने कब झपकी दिला दी पता ही नहीं चला । वैसे हमारे सो जाने का एक कारण और ये भी था कि बाहर अंधेरा हो चुका था और कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था सिवाय इसके कि बादल घिर रहे थे । बस कितनी देर चलती रही और कहां कहां से गुजरी हमें कुछ भी पता नहीं चला ।


जब हमारी आंखें खुली तो घडी पर नजर गई तो देखा कि ११ बज रहे थे । हमें लगा कि शायद खाने वाने के लिए रोका होगा ड्राईवर ने । बारिश तो नहीं हुई थी अलबत्ता उमस के कारण घबराहट महसूस हो रही थी । थोडी देर में पता लगा कि ये तो सीमा जो शायद बिहार और बंगाल राज्यों के बीच की सीमा थी , पर लगने वाला ये वो जाम है जो रोज ही लगता है । दिन भर रुके हुए ट्रक शाम होते ही एक साथ चल पडते हैं जिससे ये जाम कभी न लगे तो न लगे , वर्ना रोज की बात है । कंडक्टर ने बताया कि एक आध घंटे में रास्ता साफ़ हो जाएगा ।


हमें जोरों की भूख लगी थी मगर केला खाने का मन भी नहीं था ................. तो फ़िर खाया क्या और ..........अरे रे रे ...आज ही नहीं सब कुछ .कल भी तो है न

रविवार, 2 मई 2010

"ब्लोग बातें " का पहला अंक प्रकाशित होकर आया ...





जैसा कि आप लोगों को मैंने सूचित किया था कि ब्लोग पोस्टों पर आधारित एक नया स्तंभ मैं समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए शुरू करने जा रहा हूं ।और अब जबकि इसका पहला अंक प्रकाशित होकर आया है तो सोचा आपको दिखाता चलूं हालांकि ये अंक अब तक दस समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुका है मगर फ़िलहाल जो छवि प्रति आपके सामने रख रहा हूं वो समाचार पत्र ने आलेख के रूप में प्रकाशित की है फ़िर भी आप देखिए
इसे पढने के लिए इस पर चटका लगाएं और जो छवि खुले उसे फ़िर चटका दें । छवि आराम से पढी जा सकेगी ।

अब नियमित रूप से इसके अंक छपने के लिए जा रहे हैं । अभी प्रयोग के तौर पर सिर्फ़ चार पांच उन ब्लोग पोस्टों का जिक्र किया जा रहा है जो सामयिक विषय पर लिखे गए हैं । मगर जल्दी ही इनमें और भी प्रयोग किए जाएंगे । उम्मीद है कि आपको ये प्रयास भी पसंद आएगा ॥

एक आग्रह है आप सबसे कि ब्लोग बातें के लिए मुझे विषय और उन पर लिखी गई पोस्टें सुझाने में मदद करें तो और भी आनंद आएगा ।
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